ऊर्जा संकट: जलवायु और भविष्य की अनदेखी कर रही है दुनिया, चुकानी पड़ेगी महंगी कीमत
वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर साल 2100 तक धरती के तापमान में वृद्धि को 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस तक रोकना है, तो कार्बन उत्सर्जन को इस सदी के मध्य तक शून्य करना होगा। अगर धरती के तापमान में अनियंत्रित बढ़ोतरी होती रही, तो जलवायु पर उसके खतरनाक परिणाम होंगे...
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ऊर्जा संकट के बीच विभिन्न देशों में जलवायु परिवर्तन रोकने के उपायों के प्रति कमजोर पड़ती निष्ठा की दुनिया को महंगी कीमत चुकानी पड़ सकती है। मौजूदा ऊर्जा संकट के बीच उन देशों ने भी भविष्य और जलवायु की चिंता छोड़ कर कोयले का इस्तेमाल बढ़ा दिया है, जिन्हें इस मामले में ज्यादा संवेदनशील समझा जाता है। इन देशों ने कच्चे तेल के नए स्रोतों की खोज भी तेज कर दी है।
इससे चिंतित अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने गंभीर चेतावनी जारी की है। उसने अपने ताजा वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक में आगाह किया है कि 2050 तक उत्सर्जन घटाने के जो लक्ष्य रखा गया है, मुमकिन है कि उनमें 60 फीसदी की कमी रह जाए। लक्ष्य 2050 तक कार्बन उत्सर्जन शून्य करने का लक्ष्य है। आईईए ने अपनी रिपोर्ट अगले महीने स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होने वाले संयुक्त राष्ट्र के कॉप-26 (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज का 26वां सम्मेलन) के मद्देनजर जारी की है।
दुनिया भर के जलवायु विशेषज्ञ दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में दिख रहे मौजूदा ट्रेंड से चिंतित हैं। इस सिलसिले में एक ताजा खबर यह है कि चीन ने अब अधिक संख्या में कोयला से चलने वाले बिजली संयंत्र बनाने का फैसला किया है। चीन के राष्ट्रीय ऊर्जा आयोग की एक बैठक में प्रधानमंत्री ली किछियांग ने कहा कि बिजली की नियमित सप्लाई चीन सरकार की पहली प्राथमिकता है। गौरतलब है कि चीन ने इसके पहले ये एलान किया था कि उसके यहां कार्बन उत्सर्जन 2030 तक चरम बिंदु पर पहुंच जाएगा। उसके बाद इसमें गिरावट शुरू होगी। इस कार्यक्रम के मुताबिक 2060 तक चीन अपने कार्बन उत्सर्जन को शून्य कर देगा।
लेकिन जानकारों का कहना है कि अब अगर चीन कोयला से चलने वाले नए बिजली प्लांट लगाएगा, तो ये लक्ष्य हासिल होना नामुमकिन हो जाएगा। चीन जैसे ही ट्रेंड यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन और अमेरिका में देखने को मिल रहे हैं। आईईए ने कहा है कि अब जो हालत हैं, उसे देखते हुए यह लगता है कि दुनिया में 2050 को कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने का लक्ष्य 40 फीसदी ही हासिल हो पाएगा।
आईईए ने कहा है कि लक्ष्य और हकीकत के बीच फर्क बहुत चौड़ा हो चुका है। ये खाई तभी भर सकती है, जब दुनिया भर के देश ग्रीन एनर्जी को अपनाने के लिए चार ट्रिलियन डॉलर अगले एक दशक में खर्च करेँ। आईईए के कार्यकारी निदेशक फतीह बिरोल ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन से कहा कि कोविड-19 महामारी से उबर रहे बड़े देश ग्रीन एनर्जी की दिशा में जाने का एक बड़ा अवसर गंवा रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने कहा है कि अगर साल 2100 तक धरती के तापमान में वृद्धि को 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस तक रोकना है, तो कार्बन उत्सर्जन को इस सदी के मध्य तक शून्य करना होगा। अगर धरती के तापमान में अनियंत्रित बढ़ोतरी होती रही, तो जलवायु पर उसके खतरनाक परिणाम होंगे।
आईईए ने कहा है कि कार्बन शून्यता का लक्ष्य पाने के लिए चार ट्रिलिटन डॉलर की जिस रकम की जरूरत है, उसका 70 फीसदी हिस्सा उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों को देना होगा। फतीह बिरोल ने कहा कि मौजूदा ऊर्जा संकट ने यह साफ कर दिया है कि अभी दुनिया की बड़ी निर्भरता जीवाश्म ऊर्जा (पेट्रोलियम, गैस, कोयला) पर बनी हुई है। यानी इसका उपयोग कम कर अक्षय ऊर्जा के स्रोतों की तरफ बढ़ने का काम बहुत कम हुआ है।