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UAE: 'विदेश में कम भारतीयों वाले कॉलेज चुनें', दुबई में भारतीय मूल के सीईओ के सुझाव, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
Thu, 16 May 2024 10:53 AM IST
श्वेता महतो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दुबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दुबई
Published by: श्वेता महतो
Updated Thu, 16 May 2024 10:53 AM IST
सार
दुबई में भारतीय मूल के सीईओ श्रेया पत्तर के इस पोस्ट को आठ लाख से भी ज्यादा लोगों ने देखा। इस पर यूजर्स ने प्रतिक्रिया भी दी। कुछ इससे सहमत हुए, जबकि कुछ ने आलोचना भी की।
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भारतीय छात्र (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दुबई में भारतीय मूल की सीईओ ने छात्रों से कम भारतीयों वाला कॉलेज चुनने का सुझाव दिया। उनके इस सुझाव ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया। श्रेया पत्तर वेंचर्स की सीईओ श्रेया पत्तर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट कर यह बयान दिया। उन्होंने कहा कि विदेशों में पढ़ने के लिए आने वाले भारतीय छात्र घरेलू भावना के साथ नहीं आते, बल्कि एक विषैले भारतीय पैटर्न के साथ आते हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए श्रेया पत्तर ने कहा, "अगर कोई भी भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश में जाने की सोच रहे हैं तो उन्हें यह जांचना चाहिए कि उस यूनिवर्सिटी में कितने भारतीय छात्र हैं। जिस यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्रों की संख्या जितनी अधिक होगी, आपकी सूची में उसका स्थान उतना ही नीचे होना चाहिए।"
उन्होंने आगे कहा, "छात्रों का एक बड़ा भारतीय समुदाय विदेशों में घरेलू भावना के साथ नहीं आते, बल्कि एक विषैले भारतीय पैटर्न के साथ आते हैं। उनमें बहुत ड्रामा होता है, इसके अलावा व्यावसायिकता की कमी, अच्छे रोल मॉडल न होना, अपने जूनियर्स के प्रति जिम्मेदारी न होना, पीठ पीछे बुराई करना, भविष्य के प्रति कोई गंभीरता नहीं होना भी शामिल हैं।"
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श्रेया पत्तर ने कहा, "अगर आप देश के बाहर जाने की सोच रहे हैं तो यह सुनिश्चित करें कि आप इन लोगों की मानसिकता, दृष्टिकोण और ऐसे लोगों से दूर रहेंगे। आपको अपने आस-पास ऐसे लोगों की जरूरत नहीं होनी चाहिए, जो घर जैसा महसूस करें। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप विदेश न जाए।"
श्रेया पत्तर के बयान पर यूजर्स ने दी प्रतिक्रिया
श्रेया पत्तर के इस पोस्ट को आठ लाख से भी ज्यादा लोगों ने देखा। इस पर यूजर्स ने प्रतिक्रिया भी दी। कुछ इससे सहमत हुए, जबकि कुछ ने आलोचना भी की। यूजर ने कहा, "मैं आपसे पूरी तरह से सहमत नहीं हूं। मैं 2011 में एक अस्पताल में काम करने के लिए ऑस्ट्रेलिया गया था। वहां सबसे ज्यादा ईर्ष्यालु लोग भारतीय ही थे। वहां पहुंचने पर यह मेरे लिए एक सदमा था और ऑस्ट्रेलिया छोड़ने तक मैं इससे उबर नहीं पाया था।"
एक दूसरे यूजर ने कहा, "हर देश के अपने जहरीले पैटर्न होने चाहिए। आपने विदेश में पढ़ाई की है। ये जहरीले पैटर्न क्या हैं जो आपने दूसरे देशों के छात्रों में देखे हैं? " वहीं एक अन्य यूजर ने कहा, "अगर आप केवल अपने लोगों के बीच में ही घूमते हैं, तो आपका विदेश जाने का क्या मतलब।"
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सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए श्रेया पत्तर ने कहा, "अगर कोई भी भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश में जाने की सोच रहे हैं तो उन्हें यह जांचना चाहिए कि उस यूनिवर्सिटी में कितने भारतीय छात्र हैं। जिस यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्रों की संख्या जितनी अधिक होगी, आपकी सूची में उसका स्थान उतना ही नीचे होना चाहिए।"
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उन्होंने आगे कहा, "छात्रों का एक बड़ा भारतीय समुदाय विदेशों में घरेलू भावना के साथ नहीं आते, बल्कि एक विषैले भारतीय पैटर्न के साथ आते हैं। उनमें बहुत ड्रामा होता है, इसके अलावा व्यावसायिकता की कमी, अच्छे रोल मॉडल न होना, अपने जूनियर्स के प्रति जिम्मेदारी न होना, पीठ पीछे बुराई करना, भविष्य के प्रति कोई गंभीरता नहीं होना भी शामिल हैं।"
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श्रेया पत्तर ने कहा, "अगर आप देश के बाहर जाने की सोच रहे हैं तो यह सुनिश्चित करें कि आप इन लोगों की मानसिकता, दृष्टिकोण और ऐसे लोगों से दूर रहेंगे। आपको अपने आस-पास ऐसे लोगों की जरूरत नहीं होनी चाहिए, जो घर जैसा महसूस करें। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप विदेश न जाए।"
श्रेया पत्तर के बयान पर यूजर्स ने दी प्रतिक्रिया
श्रेया पत्तर के इस पोस्ट को आठ लाख से भी ज्यादा लोगों ने देखा। इस पर यूजर्स ने प्रतिक्रिया भी दी। कुछ इससे सहमत हुए, जबकि कुछ ने आलोचना भी की। यूजर ने कहा, "मैं आपसे पूरी तरह से सहमत नहीं हूं। मैं 2011 में एक अस्पताल में काम करने के लिए ऑस्ट्रेलिया गया था। वहां सबसे ज्यादा ईर्ष्यालु लोग भारतीय ही थे। वहां पहुंचने पर यह मेरे लिए एक सदमा था और ऑस्ट्रेलिया छोड़ने तक मैं इससे उबर नहीं पाया था।"
एक दूसरे यूजर ने कहा, "हर देश के अपने जहरीले पैटर्न होने चाहिए। आपने विदेश में पढ़ाई की है। ये जहरीले पैटर्न क्या हैं जो आपने दूसरे देशों के छात्रों में देखे हैं? " वहीं एक अन्य यूजर ने कहा, "अगर आप केवल अपने लोगों के बीच में ही घूमते हैं, तो आपका विदेश जाने का क्या मतलब।"