इस्राइल-फिलस्तीनी टकराव: टूट गई है डेमोक्रेटिक पार्टी की परंपरागत आम-सहमति, सैंडर्स ने की फिलस्तीनियों की वकालत!
प्रोग्रेसिव गुट के नेता बर्नी सैंडर्स ने कहा- ‘अगर अमेरिका विश्व मंच पर मानव अधिकारों के पक्ष में विश्वसनीय आवाज बनना चाहता है, तो उसे मानव अधिकार के अंतरराष्ट्रीय मानकों का हर जगह समर्थन करना चाहिए- उस जगह पर भी जहां ऐसा करना राजनीतिक रूप से मुश्किल हो।’
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फिलस्तीनी इलाकों पर जारी इस्राइली हमले को लेकर अमेरिका की डेमोक्रेटिक पर्टी में गहरा मतभेद पैदा हो गया है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस्राइल को समर्थन के सवाल पर अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों में पहले लगभग आम-सहमति रहती थी। लेकिन इस बार डेमोक्रेटिक पार्टी में इस मुद्दे पर जमकर अंदरूनी खींचतान चल रही है। राष्ट्रपति जो बाइडन ने दो रोज पहले कहा था कि इस्राइल को आत्म-रक्षा का अधिकार है। बिना इसका जिक्र किए पार्टी के प्रोग्रेसिव गुट के नेता बर्नी सैंडर्स ने शुक्रवार को न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखे अपने लेख में कहा कि जैसा अधिकार इस्राइल को है, वैसा ही फिलस्तीनियों को भी है।
सैंडर्स ने कहा- ‘अगर अमेरिका विश्व मंच पर मानव अधिकारों के पक्ष में विश्वसनीय आवाज बनना चाहता है, तो उसे मानव अधिकार के अंतरराष्ट्रीय मानकों का हर जगह समर्थन करना चाहिए- उस जगह पर भी जहां ऐसा करना राजनीतिक रूप से मुश्किल हो।’ सैंडर्स ने अपने लेख का अंत यह लिखते हुए किया- ‘फिलस्तीनियों के अधिकार महत्वपूर्ण हैं’ और ‘फिलस्तीनियों की जिंदगी का महत्व है।’
लंदन से प्रकाशित पत्रिका द इकॉनॉमिस्ट ने शुक्रवार को प्रकाशित एक टिप्पणी में कहा है कि इस्राइलियों और फिलस्तीनियों के बीच का टकराव ऐसा विदेश नीति संबंध सवाल बन गया है, जिस पर डेमोक्रेटिक पार्टी में तीखा विभाजन है। जैसे-जैसे उस क्षेत्र में हिंसा और सांप्रदायिक अशांति बढ़ रही है, पार्टी के अंदर मतभेद गहराते जा रहे हैं। इस्राइली हमलों में 130 से ज्यादा फिलस्तीनी मारे जा चुके हैं। सैकड़ों बुरी रह जख्मी हुए हैं। दस हजार फिलस्तीनी बेघर हो चुके हैं। ये संख्याएं बढ़ने के साथ ही डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव धड़े का सब्र टूट गया है। वह अब इस्राइल के लिए समर्थन की पार्टी की नीति की खुली आलोचना करने लगा है।
जो बाइडन के इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बातचीत के बाद व्हाइट हाउस ने एक बयान में पिछले बुधवार को इस्राइल के आत्म-रक्षा के अधिकार पर जोर दिया था। इसके तुरंत बाद हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में डेमोक्रेटिक पार्टी की सदस्य इल्हान उमर ने बाइडेन के इस दावे का मखौल उड़ाया कि वे मानव अधिकारों को अपनी विदेश नीति के केंद्र में रख रहे हैं। इल्हान उमर ने एक ट्विट में कहा- ‘आप मानव अधिकारों को केंद्र में नहीं रख रहे हैं, बल्कि आप (इस्राइल के) दमनकारी कब्जे का साथ दे रहे हैं।’ इसी राय का समर्थन करते हुए हाउस की डेमोक्रेटिक सदस्य एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कॉर्तेज ने इस्राइल पर आतंकवाद फैलाने और नस्लीय संहार करने का आरोप लगाया। द इकॉनॉमिस्ट ने लिखा है कि कुछ वर्ष पहले तक डेमोक्रेटिक पार्टी के किसी नेता से इस्राइल के लिए ऐसे शब्द सुनना हैरत में डालने वाली बात होती।
फिलस्तीन पर हमले बढ़ने के साथ ही डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव नेताओं ने इस्राइल को मिलने वाली अमेरिकी मदद पर शर्तें लगाने की मांग तेज कर दी है। हाउस के सदस्य बैटी मैकलम ने सदन में पूछा- ‘अमेरिकी डॉलरों का इस्तेमाल दमन, हिंसा और फिस्तीनियों के उत्पीड़न में क्यों हो रहा है?’ लेकिन राष्ट्रपति बाइडन ने इस्राइल पर कोई शर्त लगाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। जानकारों के मुताबिक बाइडन अमेरिका में यहूदी मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहते। गौरतलब है कि अमेरिका में मजबूत यहूदी लॉबी है, जो इस्राइल के पक्ष में नीतियां बनाने का दबाव बनाए रखती है। बाइडन की एक मुश्किल यह भी है कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी नीति को लगभग पूरी तरह इस्राइल के पक्ष में झुका दिया था।
कूटनीति के जानकारों के मुताबिक इसके बीच जो बाइडन इस्राइल के प्रति अमेरिकी नीति में बराक ओबामा के दौर जैसा संतुलन कायम करना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने फिलस्तीनियों को मिलने वाली सहायता बहाल कर दी है, जो ट्रंप के दौर में रोक दी गई थी। साथ ही वे इस्राइल के साथ-साथ फिलस्तीनियों का भी देश बनाने की नीति का समर्थन करते हैँ। इस समाधान के लिए वे एक विश्वसनीय मध्यस्थ बनना चाहते हैं।
अमेरिका में आमतौर पर जनमत और मीडिया का रुख इस्राइल के पक्ष में रहता है। जो बाइडन प्रशासन इसके मुताबिक ही नीति अपनाना चाहता है। लेकिन बीते पांच साल में डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर और बाहर प्रोग्रेसिव खेमा एक खास ताकत बन कर उभरा है। उसके रुख ने अमेरिका में इस्राइल के मुद्दे पर हमेशा से चली आ रही आम सहमति को भंग कर दिया है।