डिजिटल करेंसी का कारोबार: विकासशील देश क्यों बन गए हैं क्रिप्टो का सबसे बड़ा बाजार?
क्रिप्टोकरेंसी ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी के संचालित होती है। इस तकनीक के बारे में किताब लिखने वाले पॉल डोमयेन का कहना है कि एल सल्वाडोर के फैसले से बिटकॉइन की विश्व वित्तीय व्यवस्था में स्थिति बदल जाएगी। उससे डिजिटल करेंसियों के बारे में बहस और तेज हो जाएगी...
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क्रिप्टोकरेंसी के ज्यादातर ग्राहक अब विकासशील देशों में हैं। एशिया से अफ्रीका और लैटिन अमेरिका तक में बिटकॉइन समेत तमाम क्रिप्टोकरेंसी का अब ज्यादा कारोबार हो रहा है। ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स के एक विश्लेषण के मुताबिक धनी देशों में क्रिप्टोकरेंसी को आज भी मोटे तौर पर शक की निगाह से देखा जाता है। अमेरिका और यूरोप में विनियामक संस्थाएं क्रिप्टो कारोबार से जुड़े खतरों के बारे में चेतावनी जारी कर चुकी हैं। उसका वहां असर भी देखने को मिला है।
लेकिन विकासशील देशों में कहानी उलटी है। खास कर क्रिप्टोकरेंसी को लोकप्रियता उन देशों में देखने को मिली है, जो वित्तीय अस्थिरता के शिकार रहे हैं या जहां के लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय ट्रांजेक्शन करना मुश्किल बना हुआ है। क्रिप्टोकरेंसी के कारोबार का अध्ययन करने वाली डेटा कंपनी चेनएनालिसिस के निदेशक किम ग्रावर ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘उभरते बाजारों में एक बिल्कुल नई कहानी सामने आ रही है। इन देशों में क्रिप्टोकरेंसी ने अपने पांव जमा लिए हैं।’
चेनएनालिस ने क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल के लिहाज से टॉप 20 देशों की एक लिस्ट बनाई है। उन्हें वियतनाम को सबसे ऊपर रखा गया है। इस सूची में सिर्फ एक विकसित देश का नाम है और वह है अमेरिका। बिटकॉइन में होने वाले लेन-देन पर नजर रखने वाली डेटा कंपनी युजफुलटुलिप्स.कॉम के मुताबिक पिछले कुछ हफ्तों में सब-सहारा अफ्रीका में सबसे ज्यादा क्रिप्टो गतिविधि देखी गई है। इस मामले में इस इलाके ने उत्तरी अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है।
मंगलवार (7 सितंबर) को 64 लाख आबादी वाला एल सल्वाडोर ऐसा पहला देश बनेगा, जहां क्रिप्टोकरेंसी का लीगल टेंडर के रूप में चलन शुरू हो जाएगा। लैटिन अमेरिकी देश एल सल्वाडोर के इस फैसले पर आईएमएफ सहित कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने शक जताया है। क्रिप्टोकरेंसी ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी के संचालित होती है। इस तकनीक के बारे में किताब लिखने वाले पॉल डोमयेन का कहना है कि एल सल्वाडोर के फैसले से बिटकॉइन की विश्व वित्तीय व्यवस्था में स्थिति बदल जाएगी। उससे डिजिटल करेंसियों के बारे में बहस और तेज हो जाएगी।
अफ्रीकी देश नाईजीरिया में क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है कि पैक्सफुल नाम की कंपनी के सीईओ रे यूसुफ ने कहा है कि पश्चिमी देशों के बाशिंदों के लिए उसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। पैक्सफुल क्रिप्टो विनिमय की सेवा देने वाली कंपनी है। ये कंपनी यूजर्स को एक दूसरे सीधे क्रिप्टो कारोबार करने की सुविधा देती है। क्रिप्टोकरेंसी खरीदने के इच्छुक ग्राहक इस प्लेटफॉर्म पर अर्जी देते हैँ। जब तक वे भुगतान नहीं कर देते, ये कंपनी उनके क्रिप्टो सिक्के को अपने खाते में रखती हैं। इस कंपनी के मुताबिक उससे 15 लाख ग्राहक जुड़े हुए हैं। उनमें एक तिहाई अफ्रीका में हैँ। नाईजीरिया उनका सबसे बड़ा बाजार है। बीते जून में पूरा हुए साल में उसके ग्राहकों की संख्या में 83 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
जानकारों का कहना है कि विभिन्न देशों की वित्तीय सेवाओं की अकुशलता ने लोगों को क्रिप्टोकरेंसी की तरफ धकेला है। रे यूसुफ ने कहा- ‘अगर आप किसी अफ्रीकी देश से पड़ोसी देश में पैसा भेजना चाहें, तो एक दुःस्वप्न से गुजरना पड़ता है। अफ्रीका से बाहर कहीं पैसा भेजना तो लगभग असंभव ही साबित होता है।’ विश्व बैंक के मुताबिक 2020 की पहली तिमाही में सब-सहारा अफ्रीका से किसी अन्य देश में 200 डॉलर भेजने पर औसतन उस रकम का नौ फीसदी ट्रांजेक्शन शुल्क के रूप में चला गया। विशेषज्ञों के मुताबिक इस सूरत में इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि उस इलाके के लोग क्रिप्टोकरेंसी की तरफ झुक रहे हैं।
पॉल डोमयेन का कहना है कि एल सल्वाडोर में क्रिप्टोकरेंसी को कानूनी मान्यता देने का प्रयोग सफल होगा या नहीं, यह मालूम नहीं है। लेकिन इस देश के फैसले से क्रिप्टोकरेंसी को लेकर पूरा खेल अब बदल गया है। उसके अनुभव से यह पता चलेगा कि अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल किस ढंग से होगा।