फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Coronavirus vaccine: Ugur Sahin and Özlem Türeci BioNTech founders cure cancer led first covid-19 vaccine

वैज्ञानिक प्रेमी जोड़े की 30 साल की मेहनत का नतीजा है कोरोना का यह टीका

Fri, 04 Dec 2020 11:57 AM IST
अनवर अंसारी वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बर्लिन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बर्लिन Published by: अनवर अंसारी Updated Fri, 04 Dec 2020 11:57 AM IST
विज्ञापन
Coronavirus vaccine: Ugur Sahin and Özlem Türeci BioNTech founders cure cancer led first covid-19 vaccine
डॉ उगुर साहिन और डॉ ओजलेम टुअर्स (फाइल फोटो) - फोटो : social media

दुनियाभर में कोरोना वायरस ने कहर ढाया हुआ है। इसी बीच ब्रिटेन ने फाइजर-बायोएनटेक वैक्सीन को देश में आपात प्रयोग के लिए मंजूरी दे दी है। वहीं, जिस फाइजर-बायोएनटेक वैक्सीन को पश्चिमी यूरोप में सबसे पहले मंजूरी मिली है, दरअसल उसके पीछे एक लंबी कहानी है। 

विज्ञापन


यह कहानी 30 साल पहले ग्रामीण जर्मनी में शुरू हुई थी, जब तुर्की प्रवासियों के दो बच्चों ने कैंसर के लिए एक नए उपचार का आविष्कार करने का वचन लिया। ये दोनों ही एक-दूसरे से प्रेम करते थे और पेशे से चिकित्सक थे। बता दें कि ब्रिटेन ने जिस फाइजर-बायोएनटेक वैक्सीन को प्रयोग के लिए मंजूरी दी है, उसे तैयार करने में केवल 10 महीने का ही वक्त लगा है। 
विज्ञापन



बायोएनटेक के संस्थापकों ने तीन दशक पहले ही शुरू किया था काम
बायोएनटेक द्वारा तैयार किए गए वैक्सीन को कंपनी के संस्थापक उगुर साहिन और ओजलेम टुअर्स की पति-पत्नी की टीम ने तैयार किया है। हालांकि, यह वैक्सीन भले ही 10 महीने में तैयार हो गई है, लेकिन यह तीन दशकों के काम का नतीजा था, जो कोरोना वायरस के सामने आने से बहुत पहले ही शुरू हुआ था।
विज्ञापन
विज्ञापन







यह भी पढ़ें: ब्रिटेन में आ गई कोरोना वैक्सीन: भारत में मुश्किल है फाइजर के टीके तक पहुंचने की राह, जानिए क्यों

महामारी के फैलने से पहले ही डॉ साहिन ने एमआरएनए, आनुवांशिक निर्देशों के अध्ययन पर वर्षों बिताए थे, जो शरीर में इसे वायरस और अन्य खतरों से बचाने में मदद करने के लिए दिया जा सकता है। जनवरी में, जब यूरोप में पहली बार बीमारी सामने आई। उन्होंने अपने घर के कंप्यूटर पर वैक्सीन के एक संस्करण को डिजाइन करने के लिए इस ज्ञान का उपयोग किया था।

कैंसर रोगियों के लिए कर रहे थे शोध
डॉ साहिन का जन्म 1965 में तुर्की के भूमध्यसागरीय तट पर स्थित इस्केंडरन में हुआ था। वह चार साल बाद जर्मनी चले आए और उन्होंने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए डॉक्टर बनने का फैसला किया।

डॉ साहिन और डॉ टुअर्स ने कहा कि हमारी हताशा कैंसर रोगियों के लिए थी, जिन पर कीमोथेरेपी काम नहीं कर रही थी और अब वे किसी और माध्यम से इलाज नहीं करवा पा रहे थे। इसके पीछे का असल कारण एमआरएनए था। 


यह भी पढ़ें: ब्रिटेन सबसे आगे: फाइजर-बायोएनटेक के कोरोना टीके को मंजूरी देने वाला पहला देश

डॉ टुअर्स ने बताया कि हम दोनों की मुलाकात 1990 में होम्बर्ग विश्वविद्यालय अस्पताल में हुई थी। इस दौरान हमें एहसास हुआ कि मानक थेरेपी के साथ हम जल्दी ही एक ऐसे बिंदु पर आ जाते हैं, जहां हमारे पास कैंसर मरीजों को देने के लिए कुछ भी नहीं होता है। यह एक औपचारिक अनुभव था। 

प्रतिरक्षा प्रणाली पर आधारित उपचारों पर किया शोध
दंपति ने प्रायोगिक थेरेपी पर अपने डॉक्टरेट शोध प्रबंध लिखे। उस समय मायन्ज में गुटेनबर्ग विश्वविद्यालय के हेमेटोलॉजी और ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख और अब बायोएनटेक के गैर कार्यकारी निदेशक क्रिस्टोफ ह्यूबर ने उन्हें अपने फैकल्टी में शामिल होने के लिए राजी किया। 

वहां उन्होंने एक संक्रामक बीमारी की तरह कैंसर को हराने के लिए शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रोग्रामिंग पर आधारित नए उपचारों पर शोध करना शुरू किया। इस शोध के जरिए जाकर आज बायोएनटेक ने कोरोना की वैक्सीन को तैयार किया है। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed