कॉप-26 की तैयारी: जलवायु वार्ता में खलनायक बन गया है ऑस्ट्रेलिया
पश्चिमी देश कोयला और जीवाश्म ऊर्जा का उपयोग खत्म करने की कार्ययोजना घोषित कर चुके हैं। इस मामले में ऑस्ट्रेलिया की योजना बहुत पिछड़ी हुई है। उसने 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 2005 की तुलना में 26 से 28 फीसदी कटौती का एलान किया है। जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसी साल एलान किया था कि 2030 तक अमेरिका अपने उत्सर्जन में 50 से 52 फीसदी की कसौटी करेगा...
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जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर ऑस्ट्रेलिया के जिद्दी रुख को देखते हुए उसके सहयोगी देश चिंतित हैं। पिछले गुरुवार को ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने इस खबर की पुष्टि कर दी कि उनकी सरकार ने ब्रिटेन पर प्रस्तावित द्वीपक्षीय व्यापार समझौते में से जलवायु परिवर्तन रोकने संबंधी एक महत्वपूर्ण शर्त को हटाने के लिए दबाव डाला था। मॉरीसन ने अपनी सरकार के इस रुख पर कोई पछतावा नहीं दिखाया।
पिछले हफ्ते ही संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ऑस्ट्रेलिया को चेतावनी दी कि अगर उसने जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो यह उसकी अपनी अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी होगा। ऑस्ट्रेलिया के संसाधन मंत्री कीथ पिट ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी को अपने काम से मतलब रखने की सलाह दे दी। ऑस्ट्रेलिया ने 2030 के बाद भी कोयले की खुदाई जारी रखने का फैसला किया है। इससे सारी दुनिया में चिंता है।
पश्चिमी देश कोयला और जीवाश्म ऊर्जा का उपयोग खत्म करने की कार्ययोजना घोषित कर चुके हैं। इस मामले में ऑस्ट्रेलिया की योजना बहुत पिछड़ी हुई है। उसने 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 2005 की तुलना में 26 से 28 फीसदी कटौती का एलान किया है। जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसी साल एलान किया था कि 2030 तक अमेरिका अपने उत्सर्जन में 50 से 52 फीसदी की कसौटी करेगा। ऑस्ट्रेलिया की गैर सरकारी संस्था ऑस्ट्रेलियन क्लाइमेट काउंसिल ने सरकार से आग्रह किया है कि वह 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 75 फीसदी तक की कटौती करे। लेकिन मॉरीसन सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया है।
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की तरफ से आयोजित संबंधित पक्षों की 26वीं बैठक (कॉप-26) इस साल नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होने वाली है। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया का रुख जलवायु वार्ता को सफल बनाने में जुटे अधिकारियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। यूरोपीय संसद के नीदरलैंड्स से निर्वाचित सदस्य बास एइकहाउट ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘सभी विकसित देशों के बीच सबसे कमजोर रुख ऑस्ट्रेलिया का ही है। यह साफ है कि ऑस्ट्रेलिया मूल रूप से जलवायु वार्ताओं से गैर-हाजिर रहेगा।’
द्विपक्षीय व्यापार से समझौते से जलवायु परिवर्तन संबंधी शर्त को हटा देने के लिए ब्रिटेन की भी कई हलकों से आलोचना हो रही है। इस बारे में सफाई देते हुए ब्रिटिश सरकार के एक अधिकारी कहा कि ब्रिटेन ऑस्ट्रेलियाई सरकार से ये कहना जारी रखे हुए है कि वह जलवायु संकट को गंभीरता से ले।
खबरों के मुताबिक ग्लासगो बैठक की तैयारियों से जुड़े अधिकारियों में इस बात को लेकर चिंता गहराती जा रही है कि ऑस्ट्रेलिया कॉप-26 के दौरान प्रमुख मुद्दों पर प्रगति की राह में बाधक बन सकता है। यूरोपीय संसद के जर्मनी से निर्वाचित सदस्य पीटर लीसे ने सीएनएन से कहा- ‘हमें ऑस्ट्रेलिया जैसे अपने सहयोगी देश पर दबाव बढ़ाना होगा। ऑस्ट्रेलिया में किसी महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्य के प्रति को खुद वचनबद्ध करने को लेकर एक आम हिचक है। यह इस देश के लिए शर्मनाक है, क्योंकि खुद उसे भी जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं।’