Nepal: हिंसक गतिविधियों में शामिल रहे नेताओं को बचाने की कोशिश से नेपाल में विवाद
विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार ने जो संशोधन बिल पेश किया है, उसके जरिए कुल 79 कानूनों के प्रावधान को बदलने की कोशिश जा रही है। यह बिल पेश किए जाने के मौके पर संसद में हंगामा हो गया। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और नेपाल मजदूर किसान पार्टी ने इस बिल की कड़ी आलोचना की...
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नेपाल में पुष्प कमल दहल सरकार की न्यायपालिका के विचाराधीन मामलों को वापस लेने की पहल पर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ऐसे मुकदमों को वापस लेने का अधिकार सरकार को देने के लिए एक विधेयक रविवार को नेपाल की संसद में पेश किया गया। इसके तहत कुछ कानूनों में संशोधन की पहल की गई है।
इस संशोधन बिल में प्रावधान है कि अगर किसी दल या समूह से जुड़े लोगों विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा की हो, तो उससे संबंधित मुकदमों को सरकार वापस ले सकती है। इसमें कहा गया है कि उन समूहों के सदस्यों पर चल रहे मुकदमों को सरकार वापस नहीं ले सकेगी, जो अपनी गतिविधियां शांतिपूर्ण ढंग से नहीं चलाते हैं। इसका मतलब यह है कि संविधान के तहत पंजीकृत सभी दलों और संगठनों के सदस्यों पर चल रहे मुकदमों को सरकार वापस ले सकेगी।
पेश बिल के जरिए संबंधित कानून में एक उपधारा जोड़ी जाएगी, जिसके तहत सरकार न्यायपालिका के किसी भी स्तर पर चल रहे मुकदमों को वापस ले सकेगी। यानी मुकदमा चाहे सुप्रीम कोर्ट में हो या, हाई कोर्ट या जिला कोर्ट में चल रहा हो, सरकार के पास उसे वापस लेने का अधिकार होगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार ने जो संशोधन बिल पेश किया है, उसके जरिए कुल 79 कानूनों के प्रावधान को बदलने की कोशिश जा रही है। यह बिल पेश किए जाने के मौके पर संसद में हंगामा हो गया। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी और नेपाल मजदूर किसान पार्टी ने इस बिल की कड़ी आलोचना की। इन सदस्यों ने एक प्रस्ताव रखा, जिसमें प्रतिनिधि सभा से इस बिल को ठुकरा देने की गुजारिश की गई। लेकिन जब सांसदों के बहुमत ने बिल पेश करने के पक्ष में राय जता दी, तब सरकार की तरफ से इसे सदन के पटल पर रखा गया।
विपक्षी सदस्य खासकर विधेयक की धारा 64 से नाराज हैं, जिसके तहत संहिता बदलने का प्रस्ताव रखा गया है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की सांसद सुषणा श्रेष्ठ ने कहा- ‘धारा 64 न्यायपालिका को राजनीतिक रंग देने और पीड़ित लोगों से न्याय पाने के अधिकार को छीनने की कोशिश है। यह संविधान से न्यायपालिका को अधिकार को उससे छीनने का प्रयास है।’ उन्होंने कहा कि यह बिल उन राजनेताओं को संरक्षण देने के लिए लाया गया है, जो जघन्य अपराध में शामिल रहे हैं। श्रेष्ठ भी उन कई सांसदों में शामिल थीं, जिन्होंने इस बिल को चर्चा से पहले ही ठुकरा देने का प्रस्ताव प्रतिनिधि सभा में रखा था।
जबकि बिल पेश करते हे गृह मंत्री धनराज गुरुंग ने दावा किया कि सरकार ने यह पहल उन राजनीतिक शक्तियों को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने के मकसद से की है, जो पहले हिंसक विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए थे। उन्होंने कहा कि अगर बिल में संशोधन के लिए सांसद उचित प्रस्ताव रखते हैं, तो सरकार उस पर विचार करेगी।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक यह बिल पारित होने से सरकार सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर), मधेश इलाके की पार्टियों, और सीके राउत के नेतृत्व वाली जनमत पार्टी को बड़ी राहत मिलेगी। इन सभी पार्टियों के नेताओं पर हिंसक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में मुकदमे चल रहे हैं।