बेलगाम महंगाई: यूरोप के माथे पर मंडराने लगा है मंदी का खतरा, ब्याज दर बढ़ाने की तैयारी
कुछ ताजा विश्लेषणों में बताया गया है कि यूरोप के ताजा संकट के पीछे सबसे बड़ा हाथ ऊर्जा की महंगाई का है। प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल का भाव यूक्रेन युद्ध के पहले भी चढ़ रहा था। लेकिन युद्ध ने इस बढ़ोतरी की रफ्तार काफी तेज कर दी...
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यूरो ज़ोन में बेलगाम महंगाई से सरकारों की नींद उड़ रही है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक उपभोक्ता वस्तुओं की महंगाई दर वार्षिक आठ फीसदी से ज्यादा है, जबकि यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) ने मुद्रास्फीति दर को दो फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य तय कर रखा है। लंदन से प्रकाशित पत्रिका द इकोनॉमिस्ट की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक महंगाई दर बेलगाम बने रहने के कारण अब इस बात की पूरी संभावना है कि ईसीबी की गवर्निंग काउंसिल ब्याज दर बढ़ाने का फैसला करेगी। इसकी घोषणा अगले नौ जून को हो सकती है।
जानकारों का कहना है कि ईसीबी के इस फैसले का असर दुनिया भर के बाजारों पर पड़ेगा। ईसीबी की एक दूसरी बड़ी चिंता यूरोपियन यूनियन क्षेत्र में आर्थिक विकास दर के बारे में जताई जा रही आशंकाएं हैं। कुछ आकलनों में कहा गया है कि यूरो ज़ोन मंदी का शिकार होने के कगार पर है। हालांकि द इकोनॉमिस्ट ने कई अर्थशास्त्रियों के हवाले से दावा किया है कि निकट भविष्य में मंदी का अंदेशा नहीं है। इसका कारण कोरोना महामारी के बाद कई क्षेत्रों- खास कर सर्विस सेक्टर में तेज हुई आर्थिक गतिविधियां हैं।
ऊर्जा की महंगाई बड़ी वजह
कुछ ताजा विश्लेषणों में बताया गया है कि यूरोप के ताजा संकट के पीछे सबसे बड़ा हाथ ऊर्जा की महंगाई का है। प्राकृतिक गैस और कच्चे तेल का भाव यूक्रेन युद्ध के पहले भी चढ़ रहा था। लेकिन युद्ध ने इस बढ़ोतरी की रफ्तार काफी तेज कर दी। इन्वेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन शैक्स ने बताया है कि मई में यूरोप में ऊर्जा महंगाई की दर 39 फीसदी रही। इसकी वजह से कुल मुद्रास्फीति में चार प्रतिशत की वृद्धि हुई।
द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट में बताया गया है कि ऊर्जा और खाद्य पदार्थों को छोड़ कर मापे जाने वाले ‘कोर इन्फ्लेशन’ की दर भी मई में तेजी से बढ़ी। जर्मनी में पिछले साल के मई की तुलना में उत्पादक मूल्य (थोक मूल्य) सूचकांक 33.5 प्रतिशत रहा। इसका कारण ऊर्जा के अलावा धातु, कंक्रीट और केमिकल्स के दाम में हुआ तेज इजाफा भी रहा।
महंगाई के अनुपात में नहीं बढ़ रहा वेतन
अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि महंगाई के कारण जहां कारखानों की लागत बढ़ रही है, वहीं आम घरों की क्रय शक्ति गिर रही है। इसे देखते हुए यूरोपियन यूनियन के कई सदस्य देशों ने आम लोगों को राहत पहुंचाने की योजनाएं शुरू की हैं। थिंक टैंक ब्रुएगेल के मुताबिक जर्मनी, फ्रांस और इटली में लोगों को राहत पहुंचाने पर उनके जीडीपी का एक से दो फीसदी हिस्सा खर्च किया जा रहा है। कुछ देशों ने कीमत बढ़ोतरी पर लगाम लगाने वाले कदम उठाए हैं। लेकिन इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसी सब्सिडियों के कुछ लाभ आम लोगों के बजाय ऊर्जा कंपनियां बटोर ले जा रही हैं।
अर्थशास्त्रियों ने चिंता जताई है कि महंगाई का असर घरेलू क्रय शक्ति पर लंबे समय तक बना रहेगा। कर्मचारियों के वेतन महंगाई के अनुपात में नहीं बढ़ रहा है। कुछ कंपनियों ने कर्मचारियों को महंगाई के असर से बचाने के लिए एकमुश्त भुगतान किया है। लेकिन आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण उन्होंने वेतन वृद्धि नहीं की है। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक इस स्थिति का सीधा असर उपभोग स्तर पर पड़ेगा। उससे कंपनियों के उत्पादों की मांग घट जाएगी। ये स्थिति यूरो ज़ोन को मंदी की तरफ ले जा सकती है।