यूरोप में चीन की पैठ : हंगरी में खुलेगा प्रतिष्ठित फुदान यूनिवर्सिटी का कैंपस, 2024 से होगी पढ़ाई
चीन की फुदान यूनिवर्सिटी विश्व की टॉप-100 यूनिवर्सिटी में से एक है। इससे हंगरी में शिक्षा का स्तर बढ़ेगा तो चीन में ईयू में प्रभाव बढ़ाने में मदद मिलेगी।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
यूरोप में अपनी पैठ बनाने की कोशिशों में जुटे चीन को एक नई कामयाबी मिली है। हंगरी के साथ उसका एक समझौता हुआ है, जिसके तहत चीन की फुदान यूनिवर्सिटी का कैंपस राजधानी बुडापेस्ट में खोला जाएगा। ये कैंपस 2024 तक काम करने लगेगा। इस तरह शंघाई स्थित फुदान यूनिवर्सिटी चीन का ऐसा पहला विश्वविद्यालय बनेगा, जिसका कैंपस यूरोपियन यूनियन (ईयू) के सदस्य किसी देश में होगा।
हंगरी के अधिकारियों ने कहा है कि फुदान यूनिवर्सिटी दुनिया के टॉप 100 विश्वविद्यालयों में है। उसका कैंपस यहां खुलने से हंगरी के उच्च शिक्षा स्तर को बढ़ाने में मदद मिलगी। इससे चीन के निवेश और रिसर्च की सुविधाएं हंगरी को हासिल होंगी।
विरोध के बावजूद ऑर्बन सरकार ने दी मंजूरी
टीवी चैनल यूरो न्यूज ने ध्यान दिलाया है कि हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन की सरकार ने देश के अंदर इस योजना के हो रहे भारी विरोध के बावजूद ये करार किया है। आलोचकों का कहना है कि इससे हंगरी के करदाताओं पर अनुचित बोझ पड़ेगा। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री ऑर्बन ऐसे पहलुओं को नजरअंदाज कर लगातार रूस और चीन के साथ हंगरी के संबंधों को मजबूत बना रहे हैं।
बुडापेस्ट के मेयर ने कहा: हंगरी की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा
बुडापेस्ट के मेयर ग्रेगली कराक्सोनी ने यूरो न्यूज से कहा-'सरकार यहां एक विश्वविद्यालय लाना चाहती है, जो सचमुच एक गंभीर और अंतरराष्ट्रीय स्तर की यूनिवर्सिटी है, लेकिन उसके चार्टर से जाहिर है कि वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नजरिए की नुमाइंदगी करती है।' कराक्सोनी ने कहा कि इस चीनी निवेश से हंगरी की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
1.8 अरब डॉलर का आएगा खर्च, 80 फीसदी चीन देगा
यूनिवर्सिटी का कैंपस 64 एकड़ के इलाके में बनेगा। इस पर 1.8 अरब डॉलर का खर्च आएगा। विश्लेषकों का कहना है कि ये रकम 2019 में हंगरी में उच्चतर शिक्षा पर खर्च हुए कुल बजट से भी ज्यादा है। कैंपस बनाने का 20 फीसदी खर्च हंगरी सरकार उठाएगी। बाकी डेढ़ अरब डॉलर की रकम एक चीनी बैंक बतौर कर्ज देगा। कैंपस का निर्माण मुख्य रूप से चीन से आई सामग्रियों और मजदूरों के जरिए पूरा किया जाएगा।
हंगरी का ईयू से बढ़ रहा टकराव
गौरतलब है कि हंगरी का ईयू के साथ हाल में टकराव बढ़ता गया है। ईयू ऑर्बन सरकार की 'ईस्टर्न ओपनिंग' (पूर्व की तरफ रुख) नीति का सख्त विरोधी रहा है। ईस्टर्न ओपनिंग नीति के तहत हंगरी ने चीन, रूस, टर्की और दूसरे मध्य एशियाई देशों के साथ अपने संबंध मजबूत बनाए हैं। कराक्सोनी ने कहा कि ऑर्बन सरकार की नीतियों के कारण हंगरी ईयू के भीतर 'पूरब की बड़ी ताकतों' का अड्डा बन गया है।
पिछले साल चीन ने बुडापेस्ट से सर्बिया की राजधानी बेलग्रेड तक रेल मार्ग बनाने के लिए हंगरी को दो अरब डॉलर का कर्ज दिया था। ये रेल मार्ग चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत बन रहा है। हंगरी चीन की दूरसंचार कंपनी हुवावे के उपकरण भी आयात करता है। साथ ही वह ईयू का अकेला सदस्य देश है, जिसने चीन में बने कोरोना वैक्सीन को अपने यहां मंजूरी दी है।
यूनिवर्सिटी के जरिए सॉफ्ट पॉवर को आगे बढ़ाने की मंशा
बुडापेस्ट स्थित थिंक टैंक पॉलिटिकल कैपिटल के निदेशक पीटर क्रेको के मुताबिक फुदान यूनिवर्सिटी का कैंपस खोलने की योजना चीन के शिक्षा कार्यक्रमों और निवेश के जरिए ईयू क्षेत्र में अपने सॉफ्ट पॉवर को आगे बढ़ाने की मंशा का हिस्सा है। उन्होंने कराक्सोनी की इस राय से सहमति जताई कि यूनिवर्सिटी कैंपस योजना से चीनी जासूसी का रास्ता खुल सकता है।
अमेरिकी दूतावास ने विरोध किया
बुडापेस्ट स्थित अमेरिकी दूतावास ने पिछले हफ्ते ही एक बयान जारी कर हंगरी में चीनी विश्वविद्यालय खोलने की योजना का विरोध किया था। उसने कहा था कि चीन शैक्षिक संस्थानों का इस्तेमाल अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने और बौद्धिक स्वतंत्रता का गला घोंटने के लिए करता है। हंगरी सरकार के प्रवक्ता या यूनिवर्सिटी कैंपस योजना से संबंधित मंत्रालय ने इस बारे में अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है।
जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि 2018 में जब उच्च शिक्षा संबंधी एक कानून पास किया, तो उसके विरोध में सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी ने यहां अपना कैंपस बंद कर दिया था। अब हंगरी सरकार चीन की यूनिवर्सिटी का कैंपस यहां लाकर उसकी भरपाई करने की कोशिश कर रही है।