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चीन की चाल: पाकिस्तान-नेपाल-श्रीलंका और भूटान के बाद अब बांग्लादेश पर नजर, जानें भारत पर इसका असर
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भारत के पड़ोसी देशों के साथ चीन अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है।
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विस्तार
बांग्लादेश में चीन ने प्रस्तावित बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट का काम तेजी से शुरू कर दिया है। इस प्रोजेक्ट के तहत चीन ने बांग्लादेश में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रदर्शनी केंद्र बनाया है। शुक्रवार को प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इसका शुभारंभ किया था। बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट के तहत बांग्लादेश के कई जिलों में सड़कें और पुल बनना है।इस प्रोजेक्ट में चीन ने अरबों का निवेश किया है। चीन के विशेषज्ञ ही इसका निर्माण करवा रहे हैं। ये पहली बार नहीं है जब चीन ने भारत के पड़ोसी देशों से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश की है। नेपाल, श्रीलंका और भूटान के करीब आने के लिए चीन पहले ही चाल चल चुका है। पाकिस्तान तो शुरू से चीन के कर्ज तले दबा हुआ है। वहीं, दूसरी ओर चीन और भारत के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। पहले गलवान और फिर डोकलाम। सीमा पर लगातार टकराव की स्थिति कायम है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत से टकराव और पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार और अब बांग्लादेश से चीन की बढ़ती नजदीकियों के क्या मायने हैं? पड़ोसी देशों से चीन के मजबूत होते रिश्तों का भारत पर क्या असर पड़ेगा? पढ़िए पूरी रिपोर्ट...
बांग्लादेश में क्या कर रहा है चीन?
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग।
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बांग्लादेश की ज्यादातर सीमाएं भारत से सटी हुई है। कुछ हिस्सा म्यांमार की तरफ भी है। यही कारण है कि यहां चीन की मौजूदगी भारत के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है। रक्षा विशेषज्ञ और चीफ वाइस एयर मार्शल (रिटायर्ड) आरसी वाजपेयी बताते हैं कि चीन ने बांग्लादेश के कई शहरों में सड़कें और पुल निर्माण कराने की जिम्मेदारी ली है। एक तरह से चीन के लोग बांग्लादेश में घुस चुके हैं।
कई सड़कें भारतीय सीमा से सटे इलाकों में भी बनने हैं। संभव है कि चीन भारत पर नजर रखने के लिए ऐसा कर रहा हो। चीन की नजर पहले से ही भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर है। अगर चीन और बांग्लादेश के रिश्ते यूं ही मजबूत होते रहे तो ये आने वाले दिनों में भारत के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। चीन हमेशा से दूसरे देशों को कर्ज और इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट के नाम पर अपनी मुट्ठी में करने की कोशिश करता है। बांग्लादेश के साथ भी चीन की यही चाल है।
कई सड़कें भारतीय सीमा से सटे इलाकों में भी बनने हैं। संभव है कि चीन भारत पर नजर रखने के लिए ऐसा कर रहा हो। चीन की नजर पहले से ही भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर है। अगर चीन और बांग्लादेश के रिश्ते यूं ही मजबूत होते रहे तो ये आने वाले दिनों में भारत के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। चीन हमेशा से दूसरे देशों को कर्ज और इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट के नाम पर अपनी मुट्ठी में करने की कोशिश करता है। बांग्लादेश के साथ भी चीन की यही चाल है।
भूटान के साथ चीन के कैसे संबंध?
चीन ने भूटान के साथ सीमा विवाद सुलझाने की कोशिश शुरू की है।
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रक्षा विशेषज्ञ कर्नल (रिटायर्ड) जाहिद सिद्दीकी बताते हैं कि चीन और भूटान की सीमाएं करीब 470 किलोमीटर तक जुड़ी हुई हैं। दो इलाकों में दोनों देशों के बीच सबसे ज्यादा विवाद है। पहला भारत-चीन-भूटान ट्राइजंक्शन के पास जो 269 वर्ग किलोमीटर का इलाका है और दूसरा भूटान के उत्तर दिशा में जकारलुंग और पासमलुंग के पास 495 वर्ग किलोमीटर का इलाका है।
चीन की कोशिश है कि वो किसी तरह भारत-चीन और भूटान की सीमाओं से लगने वाले 269 वर्ग किलोमीटर के विवादित इलाके को अपने कब्जे में ले ले। यहां चुंबी घाटी है और इसी के नजदीक डोकलाम में भारत और चीनी सेनाओं के बीच झड़प हुई थी। चीन हमेशा से इस इलाके पर अपना दावा करता है और भारत भूटान का साथ देकर इस इलाके से चीन को दूर रखने की कोशिश करता है।
इस इलाके के सबसे करीब सिलिगुड़ी कॉरिडोर है। मतलब वो रास्ता जिससे भारत और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच कनेक्टिविटी बनी हुई है। ऐसे में अगर चीन सिलिगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक आ जाएगा तो इसका सबसे बड़ा खतरा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर पड़ेगा। खासतौर पर उन इलाकों पर जहां पहले से ही चीन अपना दावा करता आया है। चीन ये इलाका पाने के लिए भूटान को जकारलुंग और पासमलुंग के पास 495 वर्ग किलोमीटर का विवादित हिस्सा भी देने के लिए तैयार है। इसी महीने 14 अक्तूबर को भूटान के साथ बॉर्डर विवाद को जल्द से जल्द सुलझाने के लिए दोनों देशों ने द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किया है। 1984 से दोनों देश सीमा विवाद को सुलझाने के लिए अब तक 24 बार वार्ता कर चुके हैं।
चीन की कोशिश है कि वो किसी तरह भारत-चीन और भूटान की सीमाओं से लगने वाले 269 वर्ग किलोमीटर के विवादित इलाके को अपने कब्जे में ले ले। यहां चुंबी घाटी है और इसी के नजदीक डोकलाम में भारत और चीनी सेनाओं के बीच झड़प हुई थी। चीन हमेशा से इस इलाके पर अपना दावा करता है और भारत भूटान का साथ देकर इस इलाके से चीन को दूर रखने की कोशिश करता है।
इस इलाके के सबसे करीब सिलिगुड़ी कॉरिडोर है। मतलब वो रास्ता जिससे भारत और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच कनेक्टिविटी बनी हुई है। ऐसे में अगर चीन सिलिगुड़ी कॉरिडोर के नजदीक आ जाएगा तो इसका सबसे बड़ा खतरा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर पड़ेगा। खासतौर पर उन इलाकों पर जहां पहले से ही चीन अपना दावा करता आया है। चीन ये इलाका पाने के लिए भूटान को जकारलुंग और पासमलुंग के पास 495 वर्ग किलोमीटर का विवादित हिस्सा भी देने के लिए तैयार है। इसी महीने 14 अक्तूबर को भूटान के साथ बॉर्डर विवाद को जल्द से जल्द सुलझाने के लिए दोनों देशों ने द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किया है। 1984 से दोनों देश सीमा विवाद को सुलझाने के लिए अब तक 24 बार वार्ता कर चुके हैं।
नेपाल से रिश्तों का क्या मतलब?
नेपाल के प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति। (फाइल फोटो)
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भूटान के बाद भारत और चीन के साथ नेपाल की सीमाएं भी जुड़ी हुई हैं। नेपाल और चीन के बीच करीब 1400 किलोमीटर की सीमा लगी हुई है। 1963 में दोनों देशों के बीच सीमाओं के निर्धारण के लिए सर्वे हुआ था और इसमें माउंट एवरेस्ट की चोटी नेपाल के हिस्से में आई, जबकि इसका उत्तरी हिस्सा चीन में आता है।
इसके बाद भी दो बार दोनों के बीच सीमा विवाद को लेकर सर्वे हुआ। तब नेपाल के हिस्से वाले कई गांवों पर चीन ने अपना कब्जा जमा लिया है। नेपाल-भारत और चीनी सीमा से सटे लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी पर नेपाल अपना दावा करता है, जबकि अभी ये इलाका भारत के कब्जे में है। नेपाल ने हाल ही में इसे अपने नक्शे में शामिल करके भारत को चुनौती दी थी। भारत और नेपाल के रिश्ते हमेशा से अच्छे रहे, लेकिन अचानक नेपाल के इस बदले रूख ने काफी अलग नजरिया पेश कर दिया। चीन ने नेपाल में कई डेवलपमेंट प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। हाल के दिनों में नेपाल में हुई राजनीतिक उथल-पुथल में चीन की बड़ी भूमिका देखने को मिली। चीन की राजदूत
मतलब साफ है कि नेपाल में अब चीन का दखल काफी बढ़ गया है। नेपाल के कई गांवों पर चीन ने कब्जा कर लिया है। यहां चीनी शिक्षक नेपाली बच्चों को पढ़ाते हैं, नेपाली कम्यूनिस्ट नेताओं को चीनी कम्युनिस्ट नेता ट्रेनिंग दे रहे हैं। चीन की तरफ से पाकिस्तान, नेपाल, भूटान तक सी-पैक रोड तैयार किया जा रहा है। आने वाले दिनों में इसे अफगानिस्तान तक ले जाने की तैयारी है। इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि चीन चारों तरफ से भारत को घेरने की कोशिश में जुटा है।
इसके बाद भी दो बार दोनों के बीच सीमा विवाद को लेकर सर्वे हुआ। तब नेपाल के हिस्से वाले कई गांवों पर चीन ने अपना कब्जा जमा लिया है। नेपाल-भारत और चीनी सीमा से सटे लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी पर नेपाल अपना दावा करता है, जबकि अभी ये इलाका भारत के कब्जे में है। नेपाल ने हाल ही में इसे अपने नक्शे में शामिल करके भारत को चुनौती दी थी। भारत और नेपाल के रिश्ते हमेशा से अच्छे रहे, लेकिन अचानक नेपाल के इस बदले रूख ने काफी अलग नजरिया पेश कर दिया। चीन ने नेपाल में कई डेवलपमेंट प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। हाल के दिनों में नेपाल में हुई राजनीतिक उथल-पुथल में चीन की बड़ी भूमिका देखने को मिली। चीन की राजदूत
मतलब साफ है कि नेपाल में अब चीन का दखल काफी बढ़ गया है। नेपाल के कई गांवों पर चीन ने कब्जा कर लिया है। यहां चीनी शिक्षक नेपाली बच्चों को पढ़ाते हैं, नेपाली कम्यूनिस्ट नेताओं को चीनी कम्युनिस्ट नेता ट्रेनिंग दे रहे हैं। चीन की तरफ से पाकिस्तान, नेपाल, भूटान तक सी-पैक रोड तैयार किया जा रहा है। आने वाले दिनों में इसे अफगानिस्तान तक ले जाने की तैयारी है। इसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि चीन चारों तरफ से भारत को घेरने की कोशिश में जुटा है।
श्रीलंका और चीन के रिश्तों का क्या?
चीन ने श्रीलंका को हाल ही में 2100 करोड़ रुपए का लोन ऑफर किया है।
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पाकिस्तान, नेपाल और भूटान की तरफ से भारत को घेरने के बाद चीन ने श्रीलंका की तरफ कदम बढ़ाया है। श्रीलंका के समुद्री इलाकों में चीन निवेश करके वहां अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह है, जिसे चीन की मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड कंपनी को लीज पर 99 साल के लिए दिया गया है। श्रीलंका भी चीन के कर्ज तले दबा हुआ है।
म्यांमार में भी चीन की दखल
म्यांमार और चीन।
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आर्थिक तौर पर चीन ने म्यांमार को भी बड़े पैमाने पर कर्ज दिया है। म्यांमार में चीन ने खनन, इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट और गैस पाइपलाइन परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश किया है। चीन और म्यांमार के सैन्य शासन के बीच पहले भी अच्छे रिश्ते रहे हैं। आंग सान सू ची के कार्यकाल में भी चीन ने इन रिश्तों को मजबूत बनाए रखा था।
चीन चाहता क्या है?
कर्नल जाहिद कहते हैं, 'चीन की विस्तारवादी नीति किसी से छिपी नहीं है। एशिया में अगर कोई चीन से मुकाबला करने की बात करता है तो वो भारत है। लेकिन भारत के सामने अपनी कई चुनौतियां हैं। अब सही मायनों में देखा जाए तो चीन का टारगेट भारत नहीं है। वो भारत के सहारे पूरी दुनिया में खुद को महाशक्ति साबित करने की कोशिश में जुटा हुआ है। मतलब सीधे तौर पर अमेरिका और रूस चुनौती दे रहा है। इस वक्त चीन ने इकोनॉमी, डिफेंस और डेवलपमेंट में काफी बढ़त हासिल की है। अंतरिक्ष से हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण करना उनमें से एक है। इन सबके जरिए चीन खुद को अमेरिका और रूस से भी बढ़ा दिखाना चाहता है।'
कर्नल जाहिद आगे कहते हैं, 'चीन लड़ाई की बजाय दबाव बनाने की नीति को ज्यादा तवज्जो देता है। समझौता, पैसा, धमकी या डर किसी भी तरह चीन अपनी विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाना चाहता है। हॉन्गकॉन्ग, ताइवान, भूटान, नेपाल और पाकिस्तान इसके अच्छे उदाहरण है। भारत के साथ भी चीन इसी तरह से दबाव बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है।'
कर्नल जाहिद आगे कहते हैं, 'चीन लड़ाई की बजाय दबाव बनाने की नीति को ज्यादा तवज्जो देता है। समझौता, पैसा, धमकी या डर किसी भी तरह चीन अपनी विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ाना चाहता है। हॉन्गकॉन्ग, ताइवान, भूटान, नेपाल और पाकिस्तान इसके अच्छे उदाहरण है। भारत के साथ भी चीन इसी तरह से दबाव बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है।'
भारत को क्या करना चाहिए?
सेना के जवानों से मिलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
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कर्नल जाहिद के मुताबिक, 'भारत इस समय एकसाथ कई चुनौतियों से जूझ रहा है। आंतरिक और बाहरी समस्याओं ने एकसाथ घेर लिया है। ऐसे में भारत को सबसे पहले देश की सीमाओं को सुरक्षित करना चाहिए। जवानों को अत्याधुनिक हथियारों से लैस करके अच्छी ट्रेनिंग देनी चाहिए। दूसरे पड़ाव में देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की जरूरत है। बगैर आर्थिक मजबूती के चीन से मुकाबला कमजोर पड़ जाएगा। हमें पाकिस्तान की बजाय चीन के मुकाबले तैयार होने की जरूरत है।'