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सवाल: चीन में बनी कोरोना वैक्सीन असरदार हैं या नहीं? दुनिया में इस पर जारी है बहस

Sat, 03 Jul 2021 08:04 PM IST
कुमार संभव डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, हांगकांग
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, हांगकांग Published by: कुमार संभव Updated Sat, 03 Jul 2021 08:04 PM IST
सार

दुनिया के कई विशेषज्ञों ने चीनी वैक्सीन के असर पर सवाल उठाए। पूछा यह जा रहा है कि क्या चीनी वैक्सीन प्रभावी नहीं हैं? यह सवाल दुनिया के लिए बेहद अहम है और चीन के लिए भी।

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China made corona vaccine cyanovac and sinoform effective or not use in mongolia seychelles and chile
कोरोना वैक्सीन - फोटो : पीटीआई

विस्तार

मंगोलिया, सेशेल्स और चिली में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले हाल में तेजी से बढ़े हैं। इन तीनों देशों का संबंध यह है कि वहां चीन में बनी कोरोना वैक्सीन लोगों को लगाई गईं। इन वैक्सीन से तीनों देश में 50 फीसदी से ज्यादा आबादी का टीकाकरण हो चुका है। ऐसे में दुनिया के कई विशेषज्ञों ने चीनी वैक्सीन के असर पर सवाल उठाए। पूछा यह जा रहा है कि क्या चीनी वैक्सीन प्रभावी नहीं हैं? यह सवाल दुनिया के लिए बेहद अहम है और चीन के लिए भी। दुनिया के कई देशों में मुख्य रूप से चीनी वैक्सीन ही लगी हैं या लगाई जा रही हैं। इन टीकों के साथ चीन की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। 

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चीन के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, जून में चीन ने 80 से ज्यादा देशों को कोरोना वैक्सीन के 35 करोड़ डोज की सप्लाई की। पश्चिमी देश अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं कर पाए हैं, इसलिए ज्यादातर गरीब और विकासशील देशों के लिए चीनी वैक्सीन ही मुख्य सहारा बनी हुई हैं। बता दें कि चीन ने साइनोवैक और साइनोफॉर्म नाम की वैक्सीन की सप्लाई की। इनके असर पर उठ रहे सवालों के बीच चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर इन वैक्सीन की आलोचना को दुर्भावना से प्रेरित बताया। उधर, अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन की वेबसाइट पर प्रकाशित रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया कि चीनी वैक्सीन भले उतनी प्रभावी न हों, लेकिन वे असफल नहीं हैं।
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कुछ विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया कि कोई भी वैक्सीन कोरोना संक्रमण से 100 फीसदी बचाव देने में सक्षम नहीं है। विशेषज्ञों की राय है कि कोरोना वैक्सीन का मकसद मृत्यु और अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आने से बचाना है। उनसे कोविड-19 के संक्रमण के मामले शून्य हो जाएंगे, यह अपेक्षा अभी किसी को नहीं है। चीन में बनी दोनों वैक्सीन साइनोफार्म और साइनोवैक को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने मंजूरी दी है। दोनों वैक्सीन टीका बनाने के परंपरागत तरीके से बनाई गई हैं। यानी इनके जरिए निष्क्रिय वायरस को मनुष्य के शरीर में पहुंचाकर उससे प्रतिरक्षण क्षमता (इम्युनिटी) विकसित की जाती है। वहीं, अमेरिकी कंपनियों फाइजर और मॉडर्ना ने नई तकनीक से वैक्सीन बनाई हैं, जिसे एमआरएनए कहा जाता है। इस तकनीक के तहत शरीर के अंदर कोरोना वायरस प्रोटीन विकसित किया जाता है, जो वायरस के बाहरी आक्रमण से बचाव करता है।
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अभी तक के अध्ययनों में देखा गया है कि साइनोफार्म और साइनोवैक की प्रभावशीलता एमआरएनए तकनीक से बने वैक्सीन से कम है। इसके बावजूद चीनी वैक्सीन बिल्कुल बेअसर नहीं हैं। हांगकांग यूनिवर्सिटी में मॉलिकुलर वायरोलॉजी के प्रोफेसर जिन दोंग यान ने सीएनएन से कहा कि अगर हम कोरोना संक्रमण के गंभीर मामलों और मृत्यु की संख्या को कम करना चाहते हैं, तो साइनोफार्म और साइनोवैक से उसमें मदद मिलती है। इसी यूनिवर्सिटी में संक्रामक रोग विज्ञान के प्रोफेसर बेन काउलिंग ने कहा कि मेरी राय में चीनी वैक्सीन कारगर हैं। उनकी वजह से बहुत से लोगों की जान बच रही है।


विशेषज्ञों के मुताबिक, चिली और सेशल्स में संक्रमण के नए मामलों में देखा गया है कि जो लोग संक्रमित हुए, उनमें तकरीबन 70 फीसदी ऐसे हैं, जिन्होंने टीका नहीं लगवाया था। उन्होंने ध्यान दिलाया कि कोरोना संक्रमण के नए मामले ब्रिटेन और इजराइल जैसे देशों में भी बढ़े हैं, जहां एस्ट्राजेनिका या दूसरी कंपनियों में तैयार वैक्सीन आधी से ज्यादा आबादी को लगाई जा चुकी है।

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