बाइडन-शी शिखर वार्ता: बिना जीते अपनी जीत का दावा क्यों कर रहा है चीन?
अमेरिकी पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस शिखर वार्ता से दोनों देशों में माहौल सुधरा है। चीन ने इसके बाद कई अमेरिकी मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को अपने यहां लौटने की इजाजत दी है। लेकिन ताइवान के मामले में बाइडन ने वही कहा, जो अमेरिका की चार दशक से नीति रही है...
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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच मंगलवार (भारतीय समय के मुताबिक) को हुई शिखर वार्ता में किसी पक्ष को कोई खास सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद चीन में अपनी जीत का दावा किया गया है। वहां के अखबारों में इस बात को खास तवज्जो दी गई कि बाइडन ने ताइवान की आजादी का समर्थन नहीं किया। इसको लेकर चीन की ट्विटर जैसी माइक्रो ब्लॉगिंग साइट विबो पर एक हैशटैग वायरल हो गया। बुधवार तक इस हैशटैग पर 20 करोड़ से अधिक चीनी आ चुके थे।
अमेरिकी मीडिया को दी बीजिंग लौटने की इजाजत
अमेरिकी पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस शिखर वार्ता से दोनों देशों में माहौल सुधरा है। चीन ने इसके बाद कई अमेरिकी मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को अपने यहां लौटने की इजाजत दी है। लेकिन ताइवान के मामले में बाइडन ने वही कहा, जो अमेरिका की चार दशक से नीति रही है। उन्होंने वन चाइना पॉलिसी को दोहराया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अगर ताइवान की मौजूदा स्थिति को बदलने की कोशिश की गई, तो अमेरिका उसका पुरजोर विरोध करेगा।
बल्कि शिखर वार्ता के कुछ घंटों के बाद जो बाइडन ने इस बारे में एक स्पष्टीकरण जारी किया। उसमें उन्होंने लिखा- ‘मैंने कहा कि चीन को यह फैसला करना है कि वह हमें चाहता है या ताइवान को। ताइवान आजादी का एलान करे, इसे हम प्रोत्साहित नहीं कर रहे हैं। लेकिन मैंने साफ कहा कि हम ताइवान एक्ट का समर्थन करते हैं।’ अमेरिका के ताइवान कानून के तहत अगर ताइवान पर हमला हुआ, तो उसकी रक्षा करने के लिए अमेरिका वचनबद्ध है।
अपनी जनता के सामने पीट रहा जीत का ढिंढोरा
उधर शिखर वार्ता के बारे में चीन के विदेश मंत्रालय ने 3,900 शब्दों का विस्तृत बयान जारी किया। उसमें कहा गया कि अमेरिका ताइवान की आजादी का समर्थन नहीं करता है। लेकिन उसमें इस बात का जिक्र नहीं था कि ताइवान की स्थिति को एकतरफा ढंग से बदलने की कोशिश का अमेरिका विरोध करेगा। इसके विपरीत इसमें शी ने जो चेतावनी दी, उसका विस्तार से जिक्र किया गया। शी ने कहा था कि कुछ अमेरिकी ताइवान का इस्तेमाल चीन को घेरने के लिए करना चाहते हैँ। उन्होंने कहा कि ऐसी कोशिशें खतरनाक और आग से खेलने जैसी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी विदेश मंत्रालय ने इस बयान को चीन के घरेलू जनमत को ध्यान में रख कर प्रचारित किया है। ऐसी एकतरफा जानकारी देने की वजह से ही चीन में लोगों की धारणा बनी है कि बातचीत में जीत चीन की हुई। हांगकांग बैपटिस्ट यूनिवर्सिटी में चीन विशेषज्ञ ज्यां-पियरे केबेस्तेन ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘बेशक चीन में यह दावा किया गया है कि जीत चीन की हुई। इसीलिए वहां बाइडन की इस टिप्पणी को दोहराया गया है कि अमेरिका ताइवान की आजादी का समर्थन नहीं करता।’
बीजिंग स्थित थिंक टैंक कारनेगी-सिगहुआ सेंटर फॉर ग्लोबल पॉलिसी के निदेशक पॉल हायनले ने सीएनएन से कहा- ‘राजनीतिक लिहाज से राष्ट्रपति शी एक महत्त्वपूर्ण साल में प्रवेश कर रहे हैं। वे राष्ट्रपति के रूप में तीसरा कार्यकाल पाने की कोशिश में हैँ।’ पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसके बीच ऐसा लगता है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें मजबूत नेता बताने का अभियान छेड़ दिया है। बिना जीते जीत का दावा करना उसी का हिस्सा है।