छह देशों के रुख से पूर्वी यूरोप में चीनी महत्वाकांक्षा को तगड़ा झटका
चीन ने 17+1 गुट का गठन पूर्वी यूरोप में अपनी पैठ गहरी करने के लिए किया था। उसने अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत इन देशों में बड़े पैमाने पर निवेश करने का वादा किया है...
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हालांकि चीन के सरकारी मीडिया में राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पूर्व और मध्य यूरोपीय देशों के 17+1 कहे जाने वाले गुट के साथ शिखर बैठक को कामयाब बताया गया, लेकिन असल में ये मौका चीन के लिए एक झटका साबित हुआ है। शी ने इस शिखर बैठक को संबोधित करते हुए चीन के साथ 17+1 देशों के साथ सहयोग की तारीफ की। उन्होंने कहा कि 17+1 असल में 18 से कहीं ज्यादा साबित हो सकता है। लेकिन हकीकत यह रही कि इस बैठक में 17+1 गुट में शामिल सिर्फ 12 देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री शामिल हुए। बाकी छह देशों ने निचले स्तर के प्रतिनिधि भेजकर एक तरह से इस बैठक की अनदेखी कर दी।
चीन ने 17+1 गुट का गठन 2012 में किया था। इसका मकसद 17 मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ चीन के संबंध को मजबूत करना बताया गया था। इस समूह में शामिल 12 देश यूरोपियन यूनियन (ईयू) के भी सदस्य हैं। उनमें से छह के सर्वोच्च नेता मंगलवार को हुई बैठक में हिस्सा लेने नहीं आए। यूरोपीय विश्लेषकों ने इसे शी के लिए कूटनीतिक झटका बताया है। उन्होंने कहा है कि इससे यूरोपीय देशों के बीच चीन की बांटों और राज करो नीति नाकाम हो गई है।
इस बैठक के पहले चीन ने पूर्वी यूरोपीय देशों से खाद्य आयात करने की पेशकश की थी। इसे पूर्वी यूरोप के कृषि क्षेत्र के लिए बड़ा ऑफर माना गया। पूर्वी यूरोपीय देशों में यह पुरानी शिकायत रही है कि पश्चिम यूरोप के विकसित देश अपने कृषि क्षेत्र को संरक्षण देकर पूर्वी यूरोप की अपेक्षाकृत गरीब अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचा रहे हैं। विश्लेषकों का कहना है कि चीन ने उनकी इसी शिकायत का फायदा उठाने की कोशिश की थी।
जानकारों के मुताबिक चीन ने 17+1 गुट का गठन पूर्वी यूरोप में अपनी पैठ गहरी करने के लिए किया था। उसने अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत इन देशों में बड़े पैमाने पर निवेश करने का वादा किया है। इस बार की शिखर बैठक से एक दिन पहले चीन ने खाद्य आयात की पेशकश कर एक और चारा इन देशों के सामने फेंका। इस क्षेत्र दो देशों सर्बिया और हंगरी चीन से कोरोना वायरस के वैक्सीन भी मंगवा रहे हैं। ऐसी संभावना जताई गई है कि कुछ और देश भी चीनी वैक्सीन का आयात कर सकते हैं।
लेकिन मंगलवार की शिखर बैठक से जाहिर हुआ कि इन तमाम लुभावने तोहफों को सामने रखने के बावजूद चीन यूरोप में अपना प्रभाव फैलाने में कामयाब नहीं हुआ है। बुल्गारिया, रोमानिया, स्लोवेनिया, एस्तोनिया, लातविया और लिथुआनिया के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ने शिखर बैठक में भाग नहीं लिया। उनकी तरफ से मंत्रियों ने बैठक में नुमाइंदगी की। जबकि चीन के अधिकारी आरंभ से इस प्रयास में थे कि ये देश उच्च स्तर के प्रतिनिधि बैठक में भेजें। ये सभी देश उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के सदस्य हैं। इस तरह माना जा रहा है कि चीन नाटो में फूट डालने में सफल नहीं हो सका है।
वेबसाइट पोलिटिको.ईयू से बातचीत में एक यूरोपीय राजनयिक ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर कहा कि 17+1 शिखर बैठक में छह देशों ने जिस तरह का रुख दिखाया, वह इसलिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ईयू के सभी 27 देशों ने पिछले दिसंबर में चीन के साथ व्यापक निवेश समझौता करने पर अपनी सहमति दी थी। लातविया की राजधानी रिगा स्थित रिगा स्ट्रैंडिंन्स यूनिवर्सिटी में चाइना स्टडी सेंटर की प्रमुख बर्जीना- सेरेनकोवा के मुताबिक बाल्टिक देश 17+1 गुट से धीरे-धीरे अलग हो रहे हैं। लातविया, लिथुआनिया और एस्तोनिया बाल्टिक देश कहे जाते हैं।
लेकिन इस घटनाक्रम का शी पर कोई असर नहीं देखा गया। शिखर बैठक में उन्होंने कहा कि पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ व्यापार में कस्टम क्लीयरेंस में समन्वय और राय मशविरे के लिए एक नए केंद्र की शुरुआत करेंगे। इसका मकसद चीन-यूरोप भूमि-समुद्री एक्सप्रेस लाइन के निर्माण में सहायता देना होगा। इस परियोजना के तहत बूडापेस्ट से एथेंस के पास मौजूद चीनी स्वामित्व वाले बंदरगाह पिराएस तक सड़क और समुद्री मार्ग का निर्माण किया जाएगा। ये मार्ग हंगरी, सर्बिया, उत्तर मेसिडोनिया और ग्रीस होकर गुजरेगा। इस मार्ग के दायरे में ईयू और गैर-ईयू क्षेत्र आएंगे। इसलिए इस पर परिवहन की स्थितियां जटिल मानी जाती हैं। चीन ने अभी यह साफ नहीं किया है कि उसका ये नया तंत्र कैसे काम करेगा। लेकिन ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोतकीस ने यह जरूर कहा है कि ये मार्ग सहयोग, एकता, समझदारी और पारदर्शिता का प्रतीक होगा।