ब्लिंकेन को दो टूक: अफगान मुद्दे पर अमेरिका से सहयोग के लिए तैयार नहीं है चीन
ब्लिंकेन ने चीन से अनुरोध किया कि वह अफगानिस्तान से निकलने के इच्छुक शरणार्थियों के एक हिस्से को अपने यहां आने दे। लेकिन वांग ने दो-टूक ये अनुरोध ठुकरा दिया। उधर चीनी मीडिया ने बताया है कि वांग ने अफगानिस्तान में मौजूदा हालात पैदा होने का पूरा दोष अमेरिका पर डाला...
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अफगानिस्तान के मुद्दे पर चीन अमेरिका के साथ कोई सकारात्मक सहयोग करने के मूड में नहीं है। ये बात मंगलवार को उस समय साफ हो गई, जब अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी से फोन पर बातचीत की। ब्लिंकेन ने मंगलवार को भारत, रूस और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों और यूरोपियन यूनियन के विदेश नीति प्रमुख से भी बातचीत की।
अमेरिकी मीडिया की खबरों के मुताबिक ब्लिंकेन ने चीन से अनुरोध किया कि वह अफगानिस्तान से निकलने के इच्छुक शरणार्थियों के एक हिस्से को अपने यहां आने दे। लेकिन वांग ने दो-टूक ये अनुरोध ठुकरा दिया। उधर चीनी मीडिया ने बताया है कि वांग ने अफगानिस्तान में मौजूदा हालात पैदा होने का पूरा दोष अमेरिका पर डाला। उन्होंने कहा कि अनियोजित ढंग से अपनी सेना वापस बुला कर अमेरिका अफगानिस्तान की ताजा स्थिति पैदा करने में सहायक बना है।
चीनी मीडिया में छपे विश्लेषणों में कहा गया है कि चीन तभी अमेरिका से सहयोग करेगा, अगर अमेरिका अपनी गलतियों को सुधारने की दिशा में पर्याप्त गंभीरता दिखाए। चीनी विशेषज्ञों ने कहा है कि आतंकवाद से लड़ाई के मसले पर अमेरिका दोहरे मानदंड अपनाता है। हालांकि इन विशेषज्ञों ने स्वीकार किया है कि अगर अफगानिस्तान में टिकाऊ शांति कायम नहीं हुई, तो वह फिर से आतंकवाद का अड्डा बन सकता है। वहां ऐसे आतंकवादी गुट पैदा हो सकते हैं, जो दुनियाभर में हमले करेंगे।
इस बीच मंगलवार को चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से भी फोन पर बातचीत की। दोनों ने अफगानिस्तान की ताजा स्थिति पर अपने विचार एक दूसरे को बताए। वांग ने कहा कि चीन और रूस को मिल कर तालिबान को आतंकवाद से अलग रहने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। अफगानिस्तान आतंकवादियों और चरमपंथ का अड्डा न बन जाए, इसे सुनिश्चित करने के लिए दोनों देशों को साझा प्रयास करने चाहिए। लावरोव ने कहा कि अफगानिस्तान में आए बदलाव से सारी दुनिया के लिए जटिलताएं पैदा हुई हैं। उन्होंने कहा कि रूस, चीन के साथ मिल कर अफगानिस्तान की घटनाओं पर नजर रखेगा, ताकि दोनों देशों में तालमेल बना रहे।
सिंगहुआ यूनिवर्सिटी में नेशनल स्ट्रेटेजी इंस्टीट्यूट के रिसर्च विभाग के निदेशक चियान फेंग ने चीन के सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स से कहा कि रूस और चीन इस बात पर सहमत हैं कि वे अफगानिस्तान में अपनी फौज नहीं भेजेंगे। रूस को 1979 में तत्कालीन सोवियत संघ के अफगानिस्तान में फौज भेजने से हुए कटु अनुभव याद हैं।
चियान ने चीन की नीति को स्पष्ट करते हुए कहा कि अफगानिस्तान के मामले में अपने प्रभाव के कारण अमेरिका, चीन, रूस और पाकिस्तान मुख्य भूमिका वाले देश हैं। लेकिन उन्होंने कहा-‘अफगान मुद्दे पर बड़ी ताकतों का समन्वय सिर्फ एक बाहरी पहलू है। उससे अफगानिस्तान के भीतर मौजूद समस्याएं और विभिन्न शक्तियों के टकराव का हल नहीं निकाला जा सकता। इसलिए बड़ी ताकतों को अफगानिस्तान के अंदरूनी मामलों में सीधे दखल देकर मालिक की भूमिका नहीं निभानी चाहिए।’
पर्यवेक्षकों ने चीन के सरकारी मीडिया में छपी ऐसी टिप्पणियों को इस बात का संकेत माना है कि चीन तालिबान शासन पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदमों का समर्थन नहीं करेगा। प्रतिबंध का सुझाव ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने दिया है। चीन इसके बजाय तालिबान से संपर्क बनाए रखने के रास्ते पर चलेगा, ताकि वह अपने रणनीतिक हितों को साध सके।