क्या गुल खिलाएगी चीन-पाक-अफगान विदेश मंत्रियों की बैठक, भारत को ‘चीनी कार्ड’ से ब्लैकमेल का डर
- पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी, अफगान विदेश मंत्री सलाहुद्दीन रब्बानी और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने लिया हिस्सा
- चीन अपने ग्वादर पोर्ट, सीपीईसी और वन बेल्ट वन रोड को लेकर चिंतित
- 'चीन-अफगानिस्तान-पाकिस्तान प्लस' सहयोग पर बातचीत
- पाक और अफगानिस्तान के बीच तनाव को खत्म करना चाहता है चीन
- अमेरिका का अफगानिस्तान से हटना भारत के लिए खतरा
- भारत को सता रहा है ब्लैकमेलिंग का डर
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विस्तार
हाल ही में चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के विदेश मंत्रियों की इस्लामाबाद में बैठक हुई। यह तीनों देशों की तीसरी बैठक थी, इससे पहले दो बैठकें बीजिंग और काबूल में हो चुकी हैं। हालांकि इन बैठकों में संबंधों की मजबूती के साथ आतंकवाद और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी बीआरआई को लेकर चर्चा हुई। वहीं इस बैठक में चीन की मौजूदगी भारत के लिए चिंताजनक है।
तीन देशों के मंत्रियों ने लिया हिस्सा
इस बैठक में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी, अफगानिस्तान के विदेश मंत्री सलाहुद्दीन रब्बानी और चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने हिस्सा लिया। वांग यी का नेपाल यात्रा का भी कार्यक्रम है, जहां चीनी राष्ट्रपति के नेपाल दौरे को अंतिम रूप दिया जाएगा। तीनों देशों के इस बैठक के कई मायने निकाले जा रहे हैं। दरअसल चीन अपने ग्वादर पोर्ट, सीपीईसी और वन बेल्ट वन रोड को लेकर चिंतित है, क्योंकि इससे उसके आर्थिक और भू राजनीतिक हित जुड़े हुए हैं।
'चीन-अफगानिस्तान-पाकिस्तान प्लस' सहयोग पर बातचीत
इससे पहले तीनों देशों की पहली बैठक 2017 में बीजिंग में और दूसरी 18 दिसंबर 2018 में काबुल में आयोजित की गई थी। इस त्रिपक्षीय बैठक में आपसी संबंधों की मजबूती और सहयोग के नए तरीके खोजने को लेकर प्रतिबद्धता दोहराई गई। खास बात यह रही है कि बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) और रीजनल इकोनॉमिक कॉपरेशन पर भी गहराई से चर्चा हुई। इसके अलावा तीनों देशों ने 'चीन-अफगानिस्तान-पाकिस्तान प्लस' सहयोग पर भी बातचीत की ताकि ज्यादा से ज्यादा व्यापार को बढ़ावा दिया जा सके। वहीं अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच संपर्क बढ़ाए जाने को लेकर काबुल-पेशावर मोटरवे के प्रस्ताव पर भी गंभीरता दिखाई।
ग्वादर बंदरगाह को लेकर चीन चिंतित
दरअसल इस बैठक को लेकर तीनों देशों के अपने-अपने हित हैं। अफगानिस्तान को जहां आर्थिक बदहाली से बाहर निकलने और अमेरिका को अपनी जमीन से बाहर करने में चीन का साथ चाहिए, वहीं पाकिस्तान को अफगानिस्तान से अपने संबंध सुधारने हैं, क्योंकि दोनों देशों के बीच ग्वादर बंदरगाह के जरिए होने वाला व्यापार सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। वहीं ग्वादर पोर्ट की हालत भी खस्ता हो चली है, जिसके चलते चीन की शिपिंग कंपनी COSCO ने कराची और ग्वादर के बीच कंटेनर लाइनर सेवाओं को खत्म कर दिया है।
सीपीईसी को चाहता है अफगानिस्तान तक बढ़ाना
वहीं चीन के लिए समस्या यह है कि वह अरबों डॉलर वाले इकोनॉनिक कॉरिडोर यानी ग्वादर से काशगर तक 2442 किमी लंबे आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) को अफगानिस्तान तक बढ़ाना चाहता है। जिसके चलते वह पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव को खत्म करना चाहता है। चीन पहले ही पाकिस्तान को चेता चुका है कि ग्वादर पोर्ट सीपीईसी का ताज है और वहां फैल रही अव्यवस्था चीन के साथ संबंधों में तनाव पैदा कर सकती है।
पाक के नॉन प्रोफेशनल रवैये से चीन नाराज
वहीं चीन चाबहार को लेकर भी चिंताग्रस्त है। ईरान में बने चाबहार पोर्ट के जरिए भारत मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनना चाहता है। चाबहार के लिए भारत ने 78 हजार करोड़ का निवेश किया है और भारत ने पाकिस्तान को बाईपास करते हुए इस पोर्ट से कुछ-कुछ ऑपरेशंस भी शुरू कर दिए हैं। वहीं भारत चाबहार से अफगानिस्तान तक रेल और सड़क संपर्क बढ़ाने पर भी काम कर रहा है और यही बात चीन को रास नहीं आ रही है। क्योंकि पाकिस्तान के अड़ियल और नॉन प्रोफेशनल रवैये से ग्वादर पोर्ट का काम अटका पड़ा है।
अमेरिका का जाना भारत के लिए नुकसानदायक
इसके अलावा चीन इस बात से भी खुश है कि अमेरिका के अफगानिस्तान से हटना उसके लिए काफी फायदेमंद साबित होगा। हालांकि इस बात की संभावना बेहद कम हैं क्योंकि हाल ही में तालिबान की तरफ से हुए हमलों पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अपनी नाराजगी जता चुके हैं, वहीं अमेरिका यहीं से ईरान और पाकिस्तान पर भी नजर रख रहा है। अगर अमेरिका अफगानिस्तान से वापस होता है तो भारत के लिए काफी नुकसानदायक साबित होगा, क्योंकि अफगानिस्तान में भारत की तरफ से चलाए जा रहे विकास कार्यों के साथ चाबहार परियोजना पर भी असर पड़ सकता है।
भारत ने अफगानिस्तान के विकास के लिए 4 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश के साथ अफगान संसद का पुनर्निर्माण, सलमा बांध का निर्माण, जरंज डेलारम सड़क निर्माण, गारलैंड राजमार्ग के निर्माण में सहयोग, बामियान से बंदर-ए-अब्बास तक सड़क निर्माण, काबुल क्रिकेट स्टेडियम के निर्माण के साथ चार मिग-25 अटैक हेलिकॉप्टर भी दिए हैं, साथ ही अफगान रक्षा बलों को ट्रेनिंग भी मुहैया करा रहा है।
भारत को ब्लैकमेल का डर
वहीं चीन तालिबान पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके अफगानिस्तान को वन बेल्ट वन रोड परिजना से जोड़ने की पुरजोर कोशिश करेगा। इसके अलावा अफगानिस्तान में चीन को तांबा खनन का प्रोजेक्ट मिला हुआ है, लेकिन अशांति के चलते यह अटक गया, हालांकि अब भी इस पर चीन का कब्जा है। अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी भारत के चुनौती बन सकती है। खास बात यह है कि अफगानिस्तान और चीन के संबंधों में कोई कड़वाहट नहीं है।
वहीं अफगानिस्तान भी उसी रणनीति पर चल सकता है, जैसे बाकी के पड़ोसी देश, जैसे नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार, मालदीव, बांग्लादेश कर रहे है, यानी कि चीन के इस्तेमाल वे भारत को ब्लैकमेल करने में कर रहे हैं, वहीं अफगानिस्तान भी इसी ढर्रे पर चल सकता है।
अगली बैठक अगले साल बीजिंग में
इस त्रिस्तरीय विदेश मंत्रियों की अगली बैठक अगले साल 2020 में बीजिंग में होनी है। लेकिन इससे पहले तीनों देश संबंधों की मजबूती को लेकर कोई कोरकसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं। तीनों देश न केवल अगले महीने अक्टूबर में जूनियर क्रिकेट टीम का टूर्नामेंट आयोजित करेंगे, साथ ही अक्टूबर में पाकिस्तान में होने वाले जूनियर डिप्लोमेट्स एक्सचेंज प्रोग्राम में भी अपने युवा डिप्लोमेट्स को भेजेंगे। साथ ही पुरात्तवविदों के एक्सचेंज प्रोग्राम के साथ बाकी के क्षेत्रों जैसे मीडिया, थिंकटैंक, स्पोर्ट्स और संयुक्त प्रशिक्षण पर भी जोर देंगे।