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भयावह: कोरोना से हुई तबाही की भरपाई में और अधिक होगा कार्बन उत्सर्जन, 2023 तक अपने रिकॉर्ड स्तर पर होगा उत्पादन
Tue, 20 Jul 2021 03:01 PM IST
प्रियंका तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
Published by: प्रियंका तिवारी
Updated Tue, 20 Jul 2021 03:01 PM IST
सार
कोरोना महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन और यात्रा प्रतिबंधों के चलते पिछले साल कार्बन प्रदूषण में कुछ समय के लिए गिरावट देखी गई, लेकिन पृथ्वी के वायुमंडल में ग्लोबल वार्मिंग गैसों की मात्रा बढ़ रही है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : iStock
विस्तार
कोरोना महामारी और जलवायु परिवर्तन को लेकर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने मंगलवार (20 जुलाई) को एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है। एजेंसी ने कहा है कि यदि भविष्य में दुनिया के सभी देशों ने कोरोना काल में हुई तबाही की भरपाई के लिए बनाई गई अपनी-अपनी योजनाओं को साकार कर लिया तो इस प्रक्रिया में कार्बन गैस का उत्सर्जन साल 2023 तक अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगा। अपनी रिपोर्ट में एजेंसी ने आगे बताया कि आने वाले वर्षों में भी कॉर्बन उत्सर्जन की यह वृद्धि जारी रहेगी। रिपोर्ट के अनुसार आने वाले समय में कार्बन प्रदूषण पेरिस जलवायु समझौते में तय किए गए मानक से साढ़े तीन अरब टन अधिक होगा।
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महामारी के दौरान 16 ट्रिलियन डॉलर से अधिक राजकोषीय धन खर्च
आईईए ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि दुनियाभर के देशों ने कोविड-19 महामारी के दौरान 16 ट्रिलियन डॉलर से अधिक राजकोषीय धन खर्च किया है। यह खर्च आपातकालीन तौर पर वित्तीय सहायता के रूप में ज्यादातर श्रमिकों और व्यवसायों के लिए जारी किया गया। एजेंसी के सस्टेनेबल रिकवरी ट्रैकर ने पाया कि इस कुल खर्च में से केवल 380 बिलियन डॉलर धन स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के लिए जारी किया गया।
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आईईए के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान कई सरकारों ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने की बात की, लेकिन अभी तक कई देशों ने अपना पैसा खर्च नहीं किया है। संयुक्त राष्ट्र का इस मामले में कहना है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान लक्ष्य को बनाए रखने के लिए, साल 2030 तक कॉर्बन गैस का उत्सर्जन औसतन सालाना सात प्रतिशत से नीचे लाना होगा। हालांकि, महामारी के दौरान लॉकडाउन और यात्रा प्रतिबंधों की वजह से पिछले साल कार्बन प्रदूषण में कुछ समय के लिए गिरावट देखी गई, लेकिन पृथ्वी के वायुमंडल में ग्लोबल वार्मिंग गैसों की मात्रा बढ़ रही है।
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एजेंसी ने कहा है कि जी- 20 देशों के बीच घोषित निवेश 60 प्रतिशत तक पूरा करने की उम्मीद थी, लेकिन महामारी की वजह से विकासशील देशों में (स्थायी निवेश और आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च होने की वजह से) यह खर्च केवल 20 प्रतिशत रह गया। सरकारों को 2015 में पेरिस में की गई प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए खर्च और नीतिगत कार्रवाई में तेजी से वृद्धि करने की आवश्यकता है।
नवंबर में ग्लासगो में हुए जलवायु शिखर सम्मेलन में कहा गया कि अधिक कॉर्बन उत्सर्जन करने वाले देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को तेजी से डीकार्बोनाइज करें जबकि दूसरों को भी ऐसा करने में मदद करें। आईईए ने भी कहा कि सभी देश निजी और सार्वजनिक धन को हरित परियोजनाओं की ओर मोड़ने का अवसर खो रहे हैं। यह अवसर जलवायु, स्वास्थ्य और आर्थिक क्षेत्र में लाभ प्रदान करेंगे।