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Myanmar: म्यांमार के सैनिक शासन को तगड़ा झटका, विदेशी कंपनियों ने मुंह मोड़ा
Thu, 02 Mar 2023 08:36 PM IST
रोहित राज
इंटरनेशनल डेस्क, अमर उजाला, यंगून
इंटरनेशनल डेस्क, अमर उजाला, यंगून
Published by: रोहित राज
Updated Thu, 02 Mar 2023 08:36 PM IST
सार
म्यांमार की सेना ने एक फरवरी 2021 को निर्वाचित प्रतिनिधियों को जेल में डाल कर सत्ता पर कब्जा जमा लिया था। तब से देश में गृह युद्ध जैसी हालत है। इस दौरान सेना पर बड़े पैमाने पर मानव अधिकारों का हनन करने के आरोप लगे हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
म्यांमार सरकार के राजस्व में भारी गिरावट आने की आशंका है। हाल में कई विदेशी ऊर्जा कंपनियों ने देश में प्राकृतिक गैस का कारोबार रोक दिया है। इससे म्यांमार के लिए विदेशी मुद्रा का एक बड़ा स्रोत खत्म हो गया है।
वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम में छपी एक खबर के मुताबिक थाईलैंड की सरकारी ऊर्जा कंपनी पीटीटी की म्यांमार शाखा पीटीटी एक्सप्लोरेशन एंड प्रोडक्शन (पीटीटीईपी) ने अपना प्रोजेक्ट रोक दिया है। इस परियोजना के तहत ये कंपनी म्यांमार में दो बिलियन डॉलर का निवेश करने वाली थी। उधर अमेरिकी कंपनी शेवरॉन म्यांमार में अपने कारोबार को लगभग समेट चुकी है। समझा जाता है कि म्यांमार में मानव अधिकारों के हनन को लेकर दुनिया भर में चले अभियान के दबाव में इन कंपनियों को ऐसे फैसले लेने पड़े हैं।
म्यांमार की सेना ने एक फरवरी 2021 को निर्वाचित प्रतिनिधियों को जेल में डाल कर सत्ता पर कब्जा जमा लिया था। तब से देश में गृह युद्ध जैसी हालत है। इस दौरान सेना पर बड़े पैमाने पर मानव अधिकारों का हनन करने के आरोप लगे हैं।
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पीटीटीईपी एम-3 ब्लॉक नाम से चर्चित क्षेत्र में जमीन के अंदर गैस निकालने की परियोजना पर काम कर रही थी। इस परियोजना के लिए सहमति पत्र पर दस्तखत म्यांमार में सैनिक तख्ता पलट के पहले हुए थे। इस परियोजना के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में गैस पहुंचाने के लिए पाइपलाइन बिछाने और एक ताप बिजली परियोजना लगाने का काम भी होना था। पीटीटीईपी ने हाल में अपने निवेशकों को एक पत्र भेजा, जिसमें कहा गया है कि ‘म्यांमार में स्थानीय स्थिति के कारण’ परियोजना में देर होगी। इसके पहले ये कंपनी पिछले दिसंबर में यह एलान कर चुकी थी कि वह म्यांमार में गैस स्टेशन चलाने के अपने कारोबार को रोक रही है। पीटीटी में थाईलैंड सरकार की 51 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
शेवरॉन कंपनी म्यांमार में यादाना ऑफशोर नेचुरल गैस फील्ड प्रोजेक्ट में अपना पूरा हिस्सा बेचने का एलान कर चुकी है। इस परियोजना में शेवरॉन की 41.1 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। कंपनी ने कहा है कि वह म्यांमार से व्यवस्थित ढंग से बाहर निकलेगी, ताकि उसके कर्मचारियों के हित प्रभावित ना हों। यादाना प्रोजेक्ट में एक और प्रमुख निवेशक फ्रांस की कंपनी टोटल एनर्जी रही है। वह भी इसमें अपनी हिस्सेदारी बेचने का फैसला कर चुकी है।
जानकारों के मुताबिक, पश्चिमी कंपनियां म्यांमार में कारोबार समेटने का इरादा पहले दिखा चुकी थीं। उसके बाद पीटीटीईपी और दक्षिण कोरिया की पोस्को इंटरनेशनल ही दो बड़ी विदेशी कंपनियां थीं, जो अपने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रही थीं। विश्लेषकों ने कहा है कि विदेशी कंपनियों के देश से निकलने के बाद म्यांमार सरकार के लिए विदेशी पूंजी और मुद्रा के सबसे बड़े स्रोत सूख जाएंगे। सैनिक तख्ता पलट के बाद से देश की मुद्रा के भाव वैसे भी काफी गिरावट आ चुकी है। म्यांमार की मुद्रा की कीमत गिरने से आयात बेहद महंगे हो गए हैं। इस कारण भी कंपनियों के लिए यहां कारोबार करना लाभदायक नहीं रह गया है।
म्यांमार में होने वाले कुल गैस उत्पादन के 60 से 70 फीसदी हिस्से का निर्यात थाईलैंड और चीन को पाइपलाइनों के जरिए होता है। इसलिए कंपनियों के हालिया फैसले का असर उन दोनों देशों पर भी पड़ेगा।
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वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम में छपी एक खबर के मुताबिक थाईलैंड की सरकारी ऊर्जा कंपनी पीटीटी की म्यांमार शाखा पीटीटी एक्सप्लोरेशन एंड प्रोडक्शन (पीटीटीईपी) ने अपना प्रोजेक्ट रोक दिया है। इस परियोजना के तहत ये कंपनी म्यांमार में दो बिलियन डॉलर का निवेश करने वाली थी। उधर अमेरिकी कंपनी शेवरॉन म्यांमार में अपने कारोबार को लगभग समेट चुकी है। समझा जाता है कि म्यांमार में मानव अधिकारों के हनन को लेकर दुनिया भर में चले अभियान के दबाव में इन कंपनियों को ऐसे फैसले लेने पड़े हैं।
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म्यांमार की सेना ने एक फरवरी 2021 को निर्वाचित प्रतिनिधियों को जेल में डाल कर सत्ता पर कब्जा जमा लिया था। तब से देश में गृह युद्ध जैसी हालत है। इस दौरान सेना पर बड़े पैमाने पर मानव अधिकारों का हनन करने के आरोप लगे हैं।
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पीटीटीईपी एम-3 ब्लॉक नाम से चर्चित क्षेत्र में जमीन के अंदर गैस निकालने की परियोजना पर काम कर रही थी। इस परियोजना के लिए सहमति पत्र पर दस्तखत म्यांमार में सैनिक तख्ता पलट के पहले हुए थे। इस परियोजना के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में गैस पहुंचाने के लिए पाइपलाइन बिछाने और एक ताप बिजली परियोजना लगाने का काम भी होना था। पीटीटीईपी ने हाल में अपने निवेशकों को एक पत्र भेजा, जिसमें कहा गया है कि ‘म्यांमार में स्थानीय स्थिति के कारण’ परियोजना में देर होगी। इसके पहले ये कंपनी पिछले दिसंबर में यह एलान कर चुकी थी कि वह म्यांमार में गैस स्टेशन चलाने के अपने कारोबार को रोक रही है। पीटीटी में थाईलैंड सरकार की 51 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
शेवरॉन कंपनी म्यांमार में यादाना ऑफशोर नेचुरल गैस फील्ड प्रोजेक्ट में अपना पूरा हिस्सा बेचने का एलान कर चुकी है। इस परियोजना में शेवरॉन की 41.1 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। कंपनी ने कहा है कि वह म्यांमार से व्यवस्थित ढंग से बाहर निकलेगी, ताकि उसके कर्मचारियों के हित प्रभावित ना हों। यादाना प्रोजेक्ट में एक और प्रमुख निवेशक फ्रांस की कंपनी टोटल एनर्जी रही है। वह भी इसमें अपनी हिस्सेदारी बेचने का फैसला कर चुकी है।
जानकारों के मुताबिक, पश्चिमी कंपनियां म्यांमार में कारोबार समेटने का इरादा पहले दिखा चुकी थीं। उसके बाद पीटीटीईपी और दक्षिण कोरिया की पोस्को इंटरनेशनल ही दो बड़ी विदेशी कंपनियां थीं, जो अपने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रही थीं। विश्लेषकों ने कहा है कि विदेशी कंपनियों के देश से निकलने के बाद म्यांमार सरकार के लिए विदेशी पूंजी और मुद्रा के सबसे बड़े स्रोत सूख जाएंगे। सैनिक तख्ता पलट के बाद से देश की मुद्रा के भाव वैसे भी काफी गिरावट आ चुकी है। म्यांमार की मुद्रा की कीमत गिरने से आयात बेहद महंगे हो गए हैं। इस कारण भी कंपनियों के लिए यहां कारोबार करना लाभदायक नहीं रह गया है।
म्यांमार में होने वाले कुल गैस उत्पादन के 60 से 70 फीसदी हिस्से का निर्यात थाईलैंड और चीन को पाइपलाइनों के जरिए होता है। इसलिए कंपनियों के हालिया फैसले का असर उन दोनों देशों पर भी पड़ेगा।