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मध्यस्थता: क्या इमैनुएल मैक्रों के पास यूक्रेन विवाद पर तनाव घटाने का स्थायी फॉर्मूला भी है?

Mon, 21 Feb 2022 05:35 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, मास्को Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 21 Feb 2022 05:35 PM IST
सार

जर्मनी में जनमत भी नाटो के विस्तार के खिलाफ हो गया है। एक ताजा जनमत सर्वे में 53 फीसदी लोगों ने नाटो में यूक्रेन को शामिल करने का विरोध किया। जानकारों का कहना है कि जर्मन सरकार और वहां के लोग यूक्रेन के मुद्दे पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डालने के पक्ष में नहीं हैं...

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big achievement of Emmanuel Macron to persuade US President Joe Biden and Russian President Vladimir Putin for direct talks on the ukraine crisis
यूक्रेन संकट: मैक्रों का रूस दौरा - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

यूक्रेन विवाद में अब सारा ध्यान फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मध्यस्थता पर आ टिका है। शुरुआती तौर पर मैक्रों की कोशिश कामयाब होती दिख रही है। रविवार को इस मुद्दे पर सीधी बातचीत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को राजी कर लेना मैक्रों की एक खास उपलब्धि मानी जा रही है। अमेरिका ने शर्त लगाई है कि ये सीधी वार्ता तभी होगी, अगर तब तक रूस यूक्रेन पर हमला नहीं करेगा। समझा जा रहा है कि इस पर पुतिन की सहमति लेने के बाद ही फ्रांस ने प्रस्तावित वार्ता के कार्यक्रम की घोषणा की।

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फिलहाल के लिए खतरा टला

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन के बीच सीधी बातचीत 24 फरवरी को होने वाली है। बताया गया है कि उसके बाद दोनों देशों के बीच शिखर वार्ता होगी। अनुमान लगाया गया है कि कम से कम शिखर वार्ता होने तक यूक्रेन पर हमले का खतरा टल गया है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगर आगे तनाव घटाने का रास्ता निकलता है, तो उससे अंतरराष्ट्रीय मामलों में मैक्रों की प्रोफाइल ऊंची होगी।

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विश्लेषकों की राय है कि हाल में एक दस्तावेज के सामने आने और कुछ पूर्व अमेरिकी राजनयिकों के सार्वजनिक बयान देने से अमेरिका के लिए असहज स्थिति पैदा हुई है। इससे यूरोप में रूस के साथ तनाव बढ़ाने के खिलाफ जनमत भी बना है। जर्मन अखबार डेर स्पिगेल ने 1991 का एक दस्तावेज प्रकाशित किया है। उसके मुताबित उस वर्ष छह मार्च को अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, और जर्मनी के अधिकारियों की बैठक तत्कालीन सोवियत संघ के अधिकारियों के साथ हुई थी। उसमें चारों पश्चिमी देशों ने सोवियत संघ को आश्वासन दिया था कि पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण के बाद नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) का एक इंच भी विस्तार नहीं किया जाएगा।
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उस बैठक में शामिल हुए जर्मन राजनयिक जुर्गन च्रोबॉग ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में उस बैठक में रूस को दिए गए आश्वासन की पुष्टि की है। यही बात उस दौर में सोवियत संघ में अमेरिका के राजदूत रहे जैक मैटलॉक ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में भी कही है। ताजा विवाद में पुतिन लगातार पश्चिमी देशों पर नाटो के विस्तार के मामले में वादाखिलाफी का आरोप लगा रहे हैं।

रूस के खिलाफ एकजुट नहीं हैं पश्चिमी देश

इस बीच जर्मनी में जनमत भी नाटो के विस्तार के खिलाफ हो गया है। एक ताजा जनमत सर्वे में 53 फीसदी लोगों ने नाटो में यूक्रेन को शामिल करने का विरोध किया। जानकारों का कहना है कि जर्मन सरकार और वहां के लोग यूक्रेन के मुद्दे पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डालने के पक्ष में नहीं हैं। रूस जर्मनी और कई अन्य यूरोपीय देशों के लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का प्रमुख स्रोत है। फ्रांस में भी अमेरिकी योजना को लेकर जनता में उत्साह नहीं है। बताया जाता है कि इन वजहों से पश्चिमी देश रूस के खिलाफ एकजुट मोर्चा खोलने में नाकाम हो रहे हैं।



इसी पृष्ठभूमि में मैक्रों ने रविवार को तूफानी रफ्तार से कूटनीति की। उन्होंने बाइडन और पुतिन के अलावा यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदीमीर जेलेन्स्की से भी बात की। उनके इन प्रयासों का शुरुआती असर हुआ है। अब पर्यवेक्षकों की निगाह इस पर है कि क्या वे सचमुच कोई ऐसा फॉर्मूला पेश करेंगे, जिससे ये तनाव स्थायी रूप से घट जाए।

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