त्रिगुट बनाने का फैसला: अमेरिका-ब्रिटेन से पनडुब्बी करार कर मुसीबत मोल ली है ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने?
फ्रांस ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया सरकार का ताजा फैसला फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के बीच पहले हो चुके समझौता का खुला उल्लंघन है। ऑस्ट्रेलिया के भीतर टीकाकारों ने ध्यान दिलाया है कि आठ पनडुब्बियों के निर्माण पर ऑस्ट्रेलियाई करदाताओं के अरबों डॉलर खर्च होंगे...
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अमेरिका और ब्रिटेन के साथ त्रिगुट बनाने के ऑस्ट्रेलिया के ताजा फैसले को लेकर ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ रही है। इस त्रिगुट को अउकुस (ऑस्ट्रेलिया-यूनाइटेड किंगडम-यूनाइटेड स्टेट्सः एयूकेयूएस) नाम दिया गया है। इसके तहत अमेरिका और ब्रिटेन के सहयोग से ऑस्ट्रेलिया आठ परमाणु अस्त्र क्षमता से लैस पनडुब्बियां बनाएगा।
लेकिन उसके इस फैसले से फ्रांस के नाराज हो गया है। इस नए करार के बाद अब फ्रांस के साथ ऑस्ट्रेलिया का पहले हुआ 90 अरब डॉलर का पनडुब्बी निर्माण समझौता अधर में लटक गया है। उधर न्यूजीलैंड ने अपनी परमाणु विरोधी नीति पर चलते हुए तुरंत यह एलान कर दिया कि वह ऑस्ट्रेलियाई पनडुब्बियों को अपने जल क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने देगा।
फ्रांस ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया सरकार का ताजा फैसला फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के बीच पहले हो चुके समझौता का खुला उल्लंघन है। ऑस्ट्रेलिया के भीतर टीकाकारों ने ध्यान दिलाया है कि आठ पनडुब्बियों के निर्माण पर ऑस्ट्रेलियाई करदाताओं के अरबों डॉलर खर्च होंगे। अउकुस समझौते के तहत अमेरिका और ब्रिटेन पहली बार अपनी परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बी निर्माण की तकनीक किसी देश को देने पर राजी हुए हैं।
लेकिन ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्षी लेबर पार्टी के नेता पॉल कीटिंग ने कहा है- ‘इस समझौते के कारण ऑस्ट्रेलिया की संप्रभुता की और क्षति होगी और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बारे में स्वतंत्र निर्णय लेने की ऑस्ट्रेलिया की क्षमता बाधित हो जाएगी। वह इस मामले में अमेरिका पर और ज्यादा निर्भर हो जाएगा।’ अखबार सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड के मुताबिक कीटिंग ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया को अपने देश में बनी परंपरागत पुनडुब्बियों का संचालन करने में भी भारी दिक्कत आती थी। इससे ये कल्पना की जा सकती है कि हाई टेक पनडुब्बियों का रखरखाव और उनका संचालन कितना पेचीदा होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बियों के निर्माण का फैसला इसलिए किया गया, क्योंकि वे अधिक तेजी से चलती हैं और ज्यादातर देर तक पानी के अंदर रह सकती हैं। उनके बारे में सुराग लगना मुश्किल बना रहता है। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मॉरीसन ने इस समझौते को 1951 में हुई सुरक्षा संधि के बाद ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी सबसे बड़ी पहल बताया है। 1951 की संधि में ऑस्ट्रेलिया के अलावा न्यूजीलैंड और अमेरिका शामिल हुए थे।
जानकारों के मुताबिक नई पनडुब्बियां बन कर तैयार होने में 15 से 18 साल तक का वक्त लगेगा। जबकि ऑस्ट्रेलिया के सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया के पास अपनी सुरक्षा तैयारी करने के लिए इतना अधिक समय उपलब्ध नहीं है। लेबर पार्टी के मौजूदा नेता एंथनी अल्बानीज को बुधवार को ताजा करार के बारे में जानकारी दी गई। उन्होंने अभी इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है। लेकिन लेबर पार्टी के कई सांसदों ने इसको लेकर संदेह जताया है। पार्टी के सांसद जोश बर्न्स ने कहा है कि स्कॉट मॉरीसन कोविड-सेफ एप का ठीक से संचालन सुनिश्चित नहीं कर पाए। इसके बावजूद लोग अपेक्षा कर रहे हैं कि वे परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बियां तैयार करवा लेंगे।
ग्रीन पार्टी के नेता एडम बैंड्ट ने इस पहल को खतरनाक बताते हुए कहा है कि ऑस्ट्रेलिया अपने लिए समुद्र में तैरता चेर्नोबिल तैयार करवाने जा रहा है। चेर्नोबिल सोवियत संघ का परमाणु संयंत्र था, जो हादसे का शिकार हो गया था।