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विश्लेषण: इतिहासकार और लेखक एंटोन जैगर ने बताया, एक दशक में अति-राजनीति ने समाज पर क्या असर डाला?
Sat, 12 Sep 2026 05:44 AM IST
निर्मल कांत
द न्यूयॉर्क टाइम्स, न्यूयॉर्क।
द न्यूयॉर्क टाइम्स, न्यूयॉर्क।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sat, 12 Sep 2026 05:44 AM IST
सार
राजनीतिक बहस और विरोध बढ़े हैं, लेकिन उनका असर लंबे समय तक नहीं टिक रहा। इतिहासकार एंटोन जैगर के मुताबिक, अति-राजनीति और सोशल मीडिया ने राजनीति को सिर्फ शोर तक सीमित कर दिया है। पढ़िए रिपोर्ट-
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राजनीतिक इतिहासकार एंटोन जैगर
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विस्तार
दुनिया का कोई भी लोकतंत्र हो, राजनीतिक मोर्चे पर बहस न केवल बढ़ी है बल्कि काफी आक्रामक भी हो गई है। राजनीतिक दल हों या आम मतदाता हर छोटे-बड़े मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखते हैं। समस्याओं को सुलझाने के लिए बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन भी होते हैं। जब कोई मुद्दा उभरता है तो ऐसा लगता है कि तीखी राजनीतिक बहस इसे किसी न किसी अंजाम पर पहुंचा कर ही दम लेगी। लेकिन आमतौर पर ऐसा नहीं हो पाता है। पूरे शोरशराबे के बावजूद जमीनी स्तर पर बदलाव नजर नहीं आता।
राजनीतिक इतिहासकार एंटोन जैगर का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण पिछले एक दशक में अति-राजनीति का हावी होना है। इससे मौजूदा राजनीति सिर्फ एक पल का शोर बनकर रह गई है, जिसका कोई स्थायी परिणाम नहीं निकलता। एंटोन जैगर ने हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स के द एज्रा क्लेन शो में विस्तार से बताया कि अति-राजनीति समाज को कैसे प्रभावित कर रही है। उनकी राय है कि राजनीतिक संस्कृति में एक अजीब विरोधाभास पैदा हो गया है। एक तरफ मतदान, रैलियों, विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक हिंसा के स्तर पर लोगों की सक्रियता बहुत बढ़ गई है। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों, ट्रेड यूनियनों और नागरिक समाज संगठनों जैसी पारंपरिक संस्थाएं लगातार कमजोर या खत्म हो रही हैं।
एक मुद्दे पर ज्यादा समय टिके रहने का सब्र नहीं बचा
मौजूदा राजनीतिक विमर्श में अल्पकालिकता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। किसी मजबूत संस्थान या प्रतिनिधि तंत्र के अभाव में लोग कुछ हफ्तों तक किसी मुद्दे पर अत्यधिक रुचि दिखाते हैं। इस पर जोर-शोर से बहस होती हैं और फिर इसमें रुचि कम होते ही अगला मुद्दा गूंजने लगता है, जिससे किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाता।
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ये भी पढ़ें: 9/11 की 25वीं बरसी: सीआईए ने जारी कीं गोपनीय रिपोर्ट, बिन लादेन का जिक्र; क्या पहले ही हमले की भनक लग चुकी थी?
संस्थाएं कमजोर होने से हल नहीं हो पातीं समस्याएं
जैगर के मुताबिक, 20वीं सदी के मध्य में जन-राजनीति का जो दौर था, उसमें राजनीति अत्यधिक सक्रिय होने के साथ-साथ गहरी संस्थागत भी थी। उस समय किसी राजनीतिक दल या संगठन से जुड़ना जीवनभर का हिस्सा होता था, जिससे एक मजबूत सामूहिक शक्ति पैदा होती थी। इसके विपरीत, आज राजनीतिक निष्ठा जैसी कोई चीज नाममात्र की ही बची है। सामूहिक शक्ति न होने से भी समस्याओं का कोई ठोस नतीजा नहीं मिल पाता है।
डिजिटल दौर भी अति-राजनीति का बड़ा कारण
स्मार्टफोन स्क्रीन और सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने सूचनाओं को इतना तीव्र कर दिया है कि लोग कुछ हफ्तों के लिए किसी मुद्दे में पूरी तरह डूब जाते हैं। जैगर इसे एक राजनीतिक बाजार करार देते हैं, जहां लोग अपनी राय के शेयर खरीदते-बेचते हैं। कोई वैचारिक ढांचा मौजूद नहीं होने से आंदोलन बस एक हवा का झोंका बनकर रह जाते हैं। लोग प्रतिक्रिया स्वरूप केवल पोस्ट करना या लाइक करना जानते हैं। इससे वास्तविक प्रभाव नगण्य ही होता है।
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राजनीतिक इतिहासकार एंटोन जैगर का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण पिछले एक दशक में अति-राजनीति का हावी होना है। इससे मौजूदा राजनीति सिर्फ एक पल का शोर बनकर रह गई है, जिसका कोई स्थायी परिणाम नहीं निकलता। एंटोन जैगर ने हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स के द एज्रा क्लेन शो में विस्तार से बताया कि अति-राजनीति समाज को कैसे प्रभावित कर रही है। उनकी राय है कि राजनीतिक संस्कृति में एक अजीब विरोधाभास पैदा हो गया है। एक तरफ मतदान, रैलियों, विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक हिंसा के स्तर पर लोगों की सक्रियता बहुत बढ़ गई है। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों, ट्रेड यूनियनों और नागरिक समाज संगठनों जैसी पारंपरिक संस्थाएं लगातार कमजोर या खत्म हो रही हैं।
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एक मुद्दे पर ज्यादा समय टिके रहने का सब्र नहीं बचा
मौजूदा राजनीतिक विमर्श में अल्पकालिकता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। किसी मजबूत संस्थान या प्रतिनिधि तंत्र के अभाव में लोग कुछ हफ्तों तक किसी मुद्दे पर अत्यधिक रुचि दिखाते हैं। इस पर जोर-शोर से बहस होती हैं और फिर इसमें रुचि कम होते ही अगला मुद्दा गूंजने लगता है, जिससे किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाता।
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संस्थाएं कमजोर होने से हल नहीं हो पातीं समस्याएं
जैगर के मुताबिक, 20वीं सदी के मध्य में जन-राजनीति का जो दौर था, उसमें राजनीति अत्यधिक सक्रिय होने के साथ-साथ गहरी संस्थागत भी थी। उस समय किसी राजनीतिक दल या संगठन से जुड़ना जीवनभर का हिस्सा होता था, जिससे एक मजबूत सामूहिक शक्ति पैदा होती थी। इसके विपरीत, आज राजनीतिक निष्ठा जैसी कोई चीज नाममात्र की ही बची है। सामूहिक शक्ति न होने से भी समस्याओं का कोई ठोस नतीजा नहीं मिल पाता है।
डिजिटल दौर भी अति-राजनीति का बड़ा कारण
स्मार्टफोन स्क्रीन और सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने सूचनाओं को इतना तीव्र कर दिया है कि लोग कुछ हफ्तों के लिए किसी मुद्दे में पूरी तरह डूब जाते हैं। जैगर इसे एक राजनीतिक बाजार करार देते हैं, जहां लोग अपनी राय के शेयर खरीदते-बेचते हैं। कोई वैचारिक ढांचा मौजूद नहीं होने से आंदोलन बस एक हवा का झोंका बनकर रह जाते हैं। लोग प्रतिक्रिया स्वरूप केवल पोस्ट करना या लाइक करना जानते हैं। इससे वास्तविक प्रभाव नगण्य ही होता है।