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अमेरिका की बढ़ती मुश्किलें: सुपरपावर समझौते पर उतरा, जानें सीआईए प्रमुख और तालिबानी नेता की मुलाकात के मायने
Wed, 25 Aug 2021 06:10 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Wed, 25 Aug 2021 06:10 PM IST
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जी-7 सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
अफगानिस्तान से हजारों लोगों को निकालने के लिए अमेरिका भारी दबाव महसूस कर रहा है। लोगों को बाहर निकालने के प्रयासों के बीच यूएस सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) के प्रमुख विलियम बर्न्स ने तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर से मुलाकात की। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक बर्न्स ने काबुल में तालिबान के सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के साथ एक गुप्त बैठक की है। विलियम बर्न्स अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के सबसे अनुभवी राजनयिकों में से एक हैं। जबकि कतर में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय का नेतृत्व करने वाला बरादर काबुल में सत्ता संभालने वाले शासन के शीर्ष नेताओं में से एक है।
अमेरिका ने अफगानिस्तान में अस्थायी रूप से तैनात अमेरिकी और ब्रिटेन के हजारों सैनिकों के साथ अन्य लोगों को बाहर निकालने के लिए 31 अगस्त तक की समय सीमा तय की है। लेकिन अमेरिका को लगता है कि इस तारीख तक लोगों को अफगानिस्तान से बाहर निकालना संभव नहीं हो पाएगा। इसलिए जरूरत पड़ने पर वह इस समय-सीमा का विस्तार करना चाहता है। माना जा रहा है कि सीआईए प्रमुख की तालिबान नेता से मुलाकात इसी सिलसिले में हुई।
हालांकि तालिबान के एक प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने एक न्यूज चैनल को बताया कि समूह लोगों को निकालने के लिए किसी भी तरह से समय सीमा को बढ़ाने पर सहमत नहीं होगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुहैल ने कहा कि अगर अमेरिका या ब्रिटेन लोगों को बाहर निकालने के लिए अतिरिक्त समय चाहता है तो इसका जवाब नहीं है।
हर दिन अमेरिकी सैनिकों के लिए जोखिम भरा
तालिबान के कड़े रुख को देखते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि वाशिंगटन 31 अगस्त तक अफगानिस्तान से लोगों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को तेज कर रहा है लेकिन समय सीमा बढ़ाने का फैसला तालिबान शासक के सहयोग पर छोड़ रहा है। बाइडन ने मंगलवार को कहा हम यह काम जितनी जल्दी खत्म कर लें, उतना अच्छा है, क्योंकि ऑपरेशन का हर एक दिन हमारे सैनिकों के लिए अतिरिक्त जोखिम भरा है। अमेरिकी सेना ने 14 अगस्त से अब तक 70,700 लोगों को निकालने में मदद की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाने के मामले में अमेरिका ने जितनी जल्दबाजी की, और जिस तरह से पूरी दुनिया में उसकी किरकिरी हुई, वह लोगों को सुरक्षित अफगानिस्तान से बाहर निकालने के मामले में किसी तरह की गलती नहीं करना चाहता है। इसलिए इस मुद्दे पर वह समझौता करता जा रहा है। बर्न्स और बरादर की मुलाकात इसी समझौतावादी रवैए का नमूना है।
अमेरिका पीछे हटने पर मजबूर-
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल ए के सिवाच (रिटायर्ड) मानते हैं कि अमेरिका ने तालिबान के मुद्दे पर हर तरह से समझौता कर लिया है। तालिबान अड़ा हुआ है कि वह लोगों को बाहर निकालने को लेकर 31 अगस्त के बाद कोई मोहलत नहीं देगा। कहा जा रहा है कि तालिबान नेता से हुई मुलाकात में अमेरिका ने तालिबान को मनाने की कोशिश की लेकिन उसका अड़ियल रवैया देखकर वह पीछे हटने पर मजबूर हुआ है। अब अमेरिका के पास कोई रास्ता नहीं है, उसे बाहर निकलने के लिए इंतजार कर रहे हजारों बेसब्र लोगों को इस समय-सीमा के भीतर बाहर निकालना होगा।
अमेरिका कदम-कदम पर समझौता कर रहा
मेजर जनरल ए जे बी जैनी (सेवानिवृत्त) का भी यही कहना है कि तालिबान के मुद्दे पर अमेरिका शुरू से लेकर अब तक कदम-कदम पर समझौता कर रहा है। पहले अपनी सेना हटा ली, अपना दूतावास बंद कर दिया, वहां के राष्ट्रपति अशरफ गनी को भागने दिया। यह सब उसके समझौते का हिस्सा है। उनका कहना है कि मैं तो यह मानता हूं कि अमेरिका जितने समझौते कर रहा है तालिबान उतनी हेकड़ी दिखा रहा है। तालिबान को यह डर है कि जितनी देर अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में रूकेगी उसके लिए खतरा बना रहेगा और कहीं अमेरिका नॉर्थन अलायंस को सहायता देना ना शुरू कर दे। इसलिए भी वह समय-सीमा बढ़ाने को तैयार नहीं है।
हक्कानी ग्रुप को भी ज्यादा तवज्जो नहीं देने की बात
दूसरी तरफ यह भी माना जा रहा है कि अमेरिका ने तालिबान को अपनी सरकार में हक्कानी ग्रुप को ज्यादा तवज्जो नहीं देने की भी बात भी कही है, क्योंकि उसका झुकाव पाकिस्तान की तरफ है। साथ ही तालिबान से यह भी कहा है कि अफगानिस्तान सरकार के पुराने लोगों को भी शामिल करें क्योंकि तालिबान के पास सरकार चलाने का अनुभव नहीं है।