आतंकियों से सांठगांठ: अफगान के बाद अब पाकिस्तानी तालिबान से भी दोस्ती गांठ रही है इमरान सरकार
टीटीपी ने शांति समझौते पर बातचीत करने के लिए सरकार के सामने तीन मांगें रखी हैं। वह चाहता है कि उसे किसी तीसरे देश में अपना राजनीतिक दफ्तर खोलने दिया जाए, पूर्व संघीय शासित क्षेत्र- एफएटीए के खैबर- पुख्तूनवा प्रांत में हुए विलय को रद्द किया जाए, और पाकिस्तान में शरिया कानून लागू किया जाए....
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पाकिस्तान सरकार का नजरिया अफगानिस्तान के तालिबान और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के प्रति अलग रहा है। अफगान तालिबान को उसका संरक्षण रहा है, जबकि टीटीपी को वह दुश्मन समझती रही है। टीटीपी ने गुजरे वर्षों में पाकिस्तान के अंदर कई भयानक हमले किए हैं। इसीलिए इस खबर को लेकर यहां कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि आखिर क्यों सरकार ने टीटीपी के 100 बंदियों को रिहा करने का फैसला किया? सरकार ने कहा है कि ऐसा उसने सद्भावना दिखाने के लिए किया है।
पाकिस्तान के अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि रिहा किए गए ज्यादातर दहशतगर्द वे हैं, जो सरकार की डि-रैडिकलाइजेशन (उग्रवाद से दूर करने की) प्रक्रिया का हिस्सा थे। लेकिन उनके मामले में छह महीनों की ये प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थी। एक सरकारी अधिकारी ने नाम ना छापने की शर्त पर इस अखबार को बताया- जिन्हें रिहा किया गया है, उनमें से ज्यादातर का डि-रैडिकलाइजेशन का कोर्स पूरा नहीं हुआ था।
युद्धविराम के लिए हुई थी सहमति
कैदियों की रिहाई को इस खबर की पुष्टि के तौर पर देखा गया है कि इमरान खान सरकार और टीपीपी के बीच किसी स्थायी समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। हालांकि सरकार की तरफ से ये सफाई दी गई है कि ये रिहाई टीटीपी की किसी मांग को पूरा करने के लिए नहीं हुई है।
इसके पहले इस महीने की आठ तारीख को टीटीपी ने एलान किया था कि उसकी एक महीने के युद्धविराम के लिए सरकार के साथ सहमति बन गई है। तब टीटीपी ने कहा था कि अगर दोनों पक्ष सहमत हुए तो युद्धविराम की अवधि और बढ़ाई जाएगी। साथ ही उसने जोर दिया था कि एक दूसरे पर हमला ना करने की बनी सहमति दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होगी।
टीटीपी के इस बयान के बाद पाकिस्तान के सूचना मंत्री चौधरी फव्वाद हुसैन ने पुष्टि की थी कि सरकार ने टीटीपी प्रतिनिधियों से बातचीत की है। लेकिन उन्होंने कहा था कि ये बातचीत पूरी तरह देश के संविधान और कानून के दायरे में हुई है। हुसैन ने इस बात की भी पुष्टि की थी कि टीटीपी और पाकिस्तान सरकार के बीच संपर्क बनाने में अफगान तालिबान ने भूमिका निभाई है।
अब ऐसी खबरें आई हैं कि सरकारी और टीटीपी के प्रतिनिधियों के बीच अफगानिस्तान में तीन दौर की बातचीत हुई। उनमें एक दौर की वार्ता काबुल में हुई, जबकि दो दौर की बातचीत खोश्त में हुई। एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने बताया है कि दोनों पक्षों ने ऐसी कई साझा समितियां बनाई हैं, जिनका मकसद युद्धविराम कायम रखते हुए स्थायी शांति समझौते की तरफ बढ़ना होगा।
टीटीपी की तीसरे देश में राजनीतिक दफ्तर खोलने की मांग
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि टीटीपी ने शांति समझौते पर बातचीत करने के लिए सरकार के सामने तीन मांगें रखी हैं। वह चाहता है कि उसे किसी तीसरे देश में अपना राजनीतिक दफ्तर खोलने दिया जाए, पूर्व संघीय शासित क्षेत्र- एफएटीए के खैबर- पुख्तूनवा प्रांत में हुए विलय को रद्द किया जाए, और पाकिस्तान में शरिया कानून लागू किया जाए। बताया जाता है कि पाकिस्तान सरकार ने इन मांगों को मानने से इनकार कर दिया है।
शरिया कानून के बारे में सरकार ने कहा है कि पाकिस्तान इस्लामी गणराज्य है, जहां सारे कानून इस्लाम की शिक्षाओं के मुताबिक बनाए गए हैँ। लेकिन तालिबान की व्याख्या के मुताबिक शरिया कानून पाकिस्तान में लागू करना संभव नहीं है।