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आखिर फ्रांस को ये कौन-सी बीमारी हो गई है, क्या है ये ‘एटमोस्फेरिक लेपेनिज्म’?

Fri, 18 Jun 2021 06:10 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, पेरिस Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 18 Jun 2021 06:10 PM IST
सार

विश्लेषकों का कहना है कि 2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद से मैक्रों ऐसा कोई पॉलिटिकल नैरेटिव पेश करने में विफल रहे हैं, जिससे उनकी सरकार लोगों को किसी बड़े मकसद के लिए काम करती आए। इस बीच वे वामपंथ और दक्षिणपंथ दोनों तरफ की पार्टियों की आलोचना का निशाना बने रहे हैं...

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According to psychologst Gilles Keppel, France is currently suffering from Atmospheric Lepenism disease
ली पेन और मैक्रोन - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

फ्रांस में सामाजिक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ जाइल्स केपेल के मुताबिक फ्रांस इस वक्त ‘एटमोस्फेरिक लेपेनिज्म’ रोग से पीड़ित हो गया है। उनके मुताबिक ये वो अवस्था है, जब देश में बहुत से लोग धुर दक्षिणपंथी नेता मेरी ली पेन की बढ़ रही लोकप्रियता के कारण गहरी चिंता से ग्रस्त हैं। केपेल ने कुछ वर्ष ‘एटमोस्फेरिक जिहादिज्म’ शब्द ईजाद किया था। तब उन्होंने इसकी परिभाषा ऐसी अवस्था के रूप में की थी, जब किसी समाज में लोग इस्लामी चरमपंथी हिंसा करने के लिए प्रेरित होने लगते हैँ। ये शब्द तब से काफी चर्चित रहा है। इसीलिए जब उन्होंने एटमोस्फेरिक लेपेनिज्म शब्द का इस्तेमाल किया, तो यह भी फ्रांस में बहुचर्चित हो गया है।

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आमतौर पर फ्रांस के लोगों की राय है कि आज समाज में जिस तरह का भावावेश है, वैसा दशकों में कभी नहीं देखा गया। इसी का परिणाम राजनेताओं पर हमलों के रूप में सामने आ रहा है। अब रविवार को फ्रांस में क्षेत्रीय चुनाव होने हैं। लोगों को चिंता इस बात की है कि अगर इसमें धुर दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी को अधिक सफलता मिली, तो उसका मतलब यह माना जाएगा कि इस पार्टी की नेता ली पेन का कारवां तेजी से राष्ट्रपति भवन की तरफ बढ़ रहा है।
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राजनीति शास्त्रियों का कहना है कि नेशनल रैली पार्टी और उसके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर झूठ और नफरत फैलाने का अभियान तेज कर रखा है। इसका भावावेश का माहौल बनाने में बड़ी भूमिका है। ऐसे माहौल का सीधा फायदा ली पेन को मिल रहा है। इस बीच राहत की बात सिर्फ यह समझी जा रही है कि हाल के जनमत सर्वेक्षणों में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की एप्रूवल रेटिंग (उनके काम को सही मानने वालों की संख्या) ऊंची रही है। लेकिन ऐसे लोगों की भी बड़ी संख्या है, जो कोरोना महामारी के दौरान मैक्रों सरकार की भूमिका के कड़े आलोचक हैं।
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विश्लेषकों का कहना है कि 2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद से मैक्रों ऐसा कोई पॉलिटिकल नैरेटिव पेश करने में विफल रहे हैं, जिससे उनकी सरकार लोगों को किसी बड़े मकसद के लिए काम करती आए। इस बीच वे वामपंथ और दक्षिणपंथ दोनों तरफ की पार्टियों की आलोचना का निशाना बने रहे हैं। राष्ट्रपति और उनकी ला रिपब्लिके एन मार्श पार्टी की नीतियां मध्यमार्गी हैं। लेकिन इन नीतियों को लेकर आज फ्रांस में गहरा असंतोष देखने को मिल रहा है। इसका कितना चुनावी असर हुआ है, इसका संकेत रविवार को होने वाले क्षेत्रीय चुनावों से मिलेगा। ऐसे अनुमान लगाए गए हैं कि देश के किसी क्षेत्र में इस बार ला रिपब्लिके एन मार्श के पहले नंबर पर रहने की संभावना नहीं है। कई क्षेत्रों में ऐसा हो सकता है कि वह तीसरे या चौथे नंबर पर रहे।


ऐसी संभावना जताई गई है कि नीस-मार्से-एविगनन क्षेत्र में ली पेन की नेशनल रैली पार्टी विजयी रहेगी। विश्लेषकों का कहना है कि सचमुच ऐसा होता है, तो उसे फ्रांस की राजनीति में एक भूकंप समझा जाएगा। उससे ये धारणा गहरी हो जाएगी कि अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ली पेन के सचमुच जीत जाने की संभावना अब ठोस रूप ले रही है। फ्रांस के क्षेत्रीय चुनावों में कई पार्टियां भाग लेती हैं। ऐसे में 35 से 40 फीसदी वोट लाने वाली पार्टी के जीत जाने की संभावना रहती है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में नेशनल रैली को इतना समर्थन मिलता बताया गया है। यह सचमुच हुआ तो उसका मतलब होगा ली पेन की साख का बढ़ना। उस हाल में बहुत से लोगों पर ‘एटमोस्फेरिक लेपिनिज्म’ की गिरफ्त और कस जाएगी।

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