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अपनों में ही सिमटी हैं सिसकियां...
देहरादून/वेद विलास उनियाल
Updated Mon, 08 Jul 2013 01:56 PM IST
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आपदा में चंद्रापुरी से लगभग सात किलोमीटर दूर बसे धार तोंदला चढ़ारबंडी गांव अलग-थलग पड़ गया है। गांव तक पहुंचने के सभी रास्ते आपदा की भेंट चढ़ गए हैं। यहां पहुंचने के लिए जंगल के कठिन रास्ते ही एकमात्र सहारा बचे हैं।
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इन कठिन रास्तों के जानकार ही यहां तक पहुंच पा रहे हैं। सरकार और उसके नुमाइंदों की नजर यहां के पीड़ितों पर नहीं पड़ी है। गांव के पांच स्कूली बच्चों समेत नौ लोग केदारनाथ में आपदा के दिन वहीं थे। गांव के लोग अब एक दूसरे को दिलासा दे रहे हैं।
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एक ही गांव के नौ परिवार तबाह
धार तोंदला चढ़ारबंगी का रणवीर रावत अगर जंगली रास्तों से होकर रुद्रप्रयाग तक नहीं आता तो यह पता भी नहीं चलता कि किस तरह आपदा ने एक ही गांव के नौ परिवारों को रुला दिया है। नौ परिवारों की इस दशा में समूचा आसपास का क्षेत्र स्तब्ध है।
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चार घरों में खाने कमाने के लिए निकला पति वापस नहीं लौटा। और पांच बच्चे हर बार की तरह छुट्टियों में कुछ काम करने, घूमने केदारनाथ क्या गए, उन घरों में मातम छाया हुआ है।
यह करीब तीन सौ परिवारों का गांव है। थोड़ी बहुत खेती। मगर अगस्त्यमुनि और चंद्रापुरी के बाजारों से ही राशन पानी आता है। इन घरों में जीविका का आधार घोड़े भी थे। लोग काम करके ही घरों को चलाते थे। यात्रा सीजन में केदारनाथ धाम से जमकर काम करने के बाद घर चलाने लायक थोड़ा पैसा आ जाता था।
बह गई रोजी-रोटी
वर्षों से गांव की और लोगों की यही नियति बनी हुई थी। उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड बनने की खुशी इस गांव तक नहीं पहुंची। उनका अपना जीवन पहले की तरह से ही चलता रहा। इस गांव से सटे और आठ नौ गांव हैं। सबकी जीने की शैली एक ही तरह की। लेकिन इस बार धार तोंदला गांव से निकलने वाले नौ लोग लौटे नहीं।
केदारनाथ में पानी की प्रचंड लहरों में शायद वो सब समा गए। इंसान ही नहीं, गांव की जीविका का आधार घोड़े भी बह गए। गांव की विपदा इतनी भर नहीं। यहां लोगों के पास खाने के लिए अब कुछ बचा नहीं। थोड़ा पक्का बना हुआ रास्ता ही मिट गया तो पुरानी पगडंडी का क्या कहें।
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जगोठ कमसाल होते हुए लगभग पच्चीस किमी चलकर गांव के कुछ लोग अब अगस्त्यमुनि तक आए हैं। चंद्रापुरी का बाजार बह गया है। लिहाजा अगस्त्यमुनि आना ही पड़ेगा। कठिन रास्ते को देखते हुए लौटते समय हाथ में पांच छह किलो से ज्यादा राशन ले जाने का साहस कोई नहीं करता।
बस किसी तरह गांव में थोड़ी बहुत राशन पहुंची है। रणवीर बताता है कि उसके गांव में कोई नहीं पहुंचा। राहत क्या बंटी और कैसी बंटी इसका गांव वालों को कुछ पता नहीं, जो घर से डब्बों में बंद था, अब तक उसे ही खाया। रास्ता बनना अभी इतना आसान नहीं।
गांव तक पहुंचने वाला सड़क का रास्ता कई जगह बुरी तरह ध्वस्त है। वह कहता है कि आज से भी काम शुरू हो, तो चार महीने से पहले ठीक नहीं होती मेरे गांव की सड़क। धारतोंदला की तरह कई गांव रो रहे हैं। सिसक रहे हैं। पर उन्हें सांत्वना देने वाला कोई नहीं।
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