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सरकारी उदासीनता से ऊनी वस्त्र उद्योग संकट में
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सरकारी उदासीनता के कारण मोरी प्रखंड के दूरस्थ गांवों में ऊनी वस्त्र उद्योग पर टिकी ग्रामीणों की आजीविका पर संकट मंडराने लगा है। पहले ही युवा पीढ़ी इस व्यवसाय से दूर होती जा रही है और ग्रामीणों को दिया जाने वाला खड्डी कताई बुनाई प्रशिक्षण बीते एक साल से ठप है।
मोरी प्रखंड के दूरस्थ गांवों में ग्रामीणों की आजीविका भेड़ बकरी पालन पर टिकी है। क्षेत्र में हर साल हजारों क्विंटल ऊन का उत्पादन होता है। प्रशिक्षित ग्रामीण ऊन से अपनी जरूरत के साथ ही बाजार में बेचने के लिए ऊनी वस्त्र तैयार करते हैं। ग्रामीणों द्वारा ऊन से तैयार चोला, कोटी, पंखी, मफलर, टोपी आदि ऊनी वस्त्रों की बाजार में काफी डिमांड है और ग्रामीणों को इसकी अच्छी कीमत भी मिल जाती है। बीते सालों में इस पारंपरिक व्यवसाय से दूर होती जा रही युवा पीढ़ी को ऊनी वस्त्र उद्योग से जोड़ने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार की ओर से प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे थे।
फिताड़ी गांव निवासी हरिराम सिंह राणा बताते हैं कि वे गांव-गांव जाकर ग्रामीणों को खड्डी कताई बुनाई का प्रशिक्षण देते थे। मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए उन्हें राजकीय पॉलीटेक्निक से प्रतिमाह पांच हजार मानदेय मिलता था। क्षेत्र में चार दर्जन से अधिक कताई बुनाई केंद्र चल रहे हैं। वर्ष 2018-19 में यह योजना कौशल विकास मंत्रालय को हस्तांतरित कर दी गई। तब से बजट नहीं मिलने के कारण उनका मानदेय भी बंद हो गया और खड्डी कताई बुनाई प्रशिक्षण भी ठप पड़ गए हैं। क्षेत्र में ऊनी वस्त्र उद्योग पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने भी प्रशिक्षण कार्यक्रम पुन: शुरू कराने की मांग की है।
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मोरी प्रखंड के दूरस्थ गांवों में ग्रामीणों की आजीविका भेड़ बकरी पालन पर टिकी है। क्षेत्र में हर साल हजारों क्विंटल ऊन का उत्पादन होता है। प्रशिक्षित ग्रामीण ऊन से अपनी जरूरत के साथ ही बाजार में बेचने के लिए ऊनी वस्त्र तैयार करते हैं। ग्रामीणों द्वारा ऊन से तैयार चोला, कोटी, पंखी, मफलर, टोपी आदि ऊनी वस्त्रों की बाजार में काफी डिमांड है और ग्रामीणों को इसकी अच्छी कीमत भी मिल जाती है। बीते सालों में इस पारंपरिक व्यवसाय से दूर होती जा रही युवा पीढ़ी को ऊनी वस्त्र उद्योग से जोड़ने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय भारत सरकार की ओर से प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे थे।
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फिताड़ी गांव निवासी हरिराम सिंह राणा बताते हैं कि वे गांव-गांव जाकर ग्रामीणों को खड्डी कताई बुनाई का प्रशिक्षण देते थे। मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए उन्हें राजकीय पॉलीटेक्निक से प्रतिमाह पांच हजार मानदेय मिलता था। क्षेत्र में चार दर्जन से अधिक कताई बुनाई केंद्र चल रहे हैं। वर्ष 2018-19 में यह योजना कौशल विकास मंत्रालय को हस्तांतरित कर दी गई। तब से बजट नहीं मिलने के कारण उनका मानदेय भी बंद हो गया और खड्डी कताई बुनाई प्रशिक्षण भी ठप पड़ गए हैं। क्षेत्र में ऊनी वस्त्र उद्योग पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने भी प्रशिक्षण कार्यक्रम पुन: शुरू कराने की मांग की है।
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