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महिलाओं ने श्रमदान कर बनाई सड़क
ब्यूरो/अमर उजाला, उत्तरकाशी।
Updated Thu, 02 Mar 2017 10:41 PM IST
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Women engaged in road construction.
- फोटो : Amar Ujala
कहते हैं कि दृढ़ संकल्प ही कामयाबी के शिखर छूती है। जिला मुख्यालय के नजदीकी गांव डांग की ग्रामीण महिलाओं ने पड़ोसी पोखरी गांव के लिए श्रमदान से आधा किमी से अधिक सड़क तैयार कर सरकारी तंत्र को आइना दिखाया। गांव के लोगों ने जंगल बचाने के लिए दूसरी जगह से सड़क बना डाली है।
अब एनआईएम से पोखरी गांव तक स्वीकृत 800 मीटर लंबी सड़क बनाने का विभाग के पास कोई औचित्य ही नहीं रह गया है। यह बात अलग है कि प्रशासन ग्रामीणों की पीठ थपथपाने की बजाय अभी तक ग्रामीणों के जंगल बचाने के उद्देश्य को नहीं समझ पाया और अधिकारी सड़क को स्वीकार करने से कतरा रहे हैं।
वर्ष 2004 में डांग से पोखरी सड़क निर्माण का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ था। एनआईएम बैंड से पोखरी के लिए सड़क निर्माण होना था, लेकिन डांग के ग्रामीणों ने यह कहकर सड़क का विरोध किया कि यहां से उनका जंगल तहस-नहस हो जाएगा। डांग के ग्रामीण वर्ष 1982 से चिपको आंदोलन के दौर से ही यहां पेड़ों पर रक्षासूत्र बांधकर पर्यावरण को बचाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
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सड़क से जंगल नष्ट होने की संभावनाओं के बीच ग्रामीणों ने इसका विरोध किया और बिना किसी सरकारी सपोर्ट के पोखरी गांव के लिए अपने खेतों से श्रमदान के जरिए सड़क बनाने की ठान ली। तीन महीने बाद ग्रामीणों ने पोखरी गांव तक 560 मीटर सड़क तैयार कर दी है।
अब बाकी 150 मीटर हिस्से में पोखरी गांव के खेत आड़े आ रहे हैं। गांव के नागेंद्र जगूड़ी, बच्चन सिंह गुर्साइं का कहना है कि यदि पोखरी गांव के ग्रामीण अपने खेत दे देते हैं, तो सड़क बनकर तैयार है। ग्रामीणों को खुशी इस बात की है कि इसमें उनका जंगल भी बच गया और सरकार का पैसा भी। लेकिन सड़क का फैसला अभी भी प्रशासन के हाथ में बाकी है।
प्रशासन यदि ग्रामीणों की बनाई सड़क से संतुष्ट हुआ, तो डांग गांव के लिए इसे बड़ी उपलब्धि माना जाएगा। प्रभारी डीएम व सीडीओ उदय सिंह राणा का कहना है कि प्रशासन डांग-पोखरी सड़क को लेकर दोनों गांव की आपसी असमंजस की स्थिति का समाधान करने को तैयार है। उनका कहना है कि सड़क को लेकर दोनों गांव के बीच उपजी विवाद की स्थिति को प्रशासन गंभीरता से ले रहा है। ग्रामीणों की ओर से तैयार की गई सड़क सराहनीय प्रयास है।
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अब एनआईएम से पोखरी गांव तक स्वीकृत 800 मीटर लंबी सड़क बनाने का विभाग के पास कोई औचित्य ही नहीं रह गया है। यह बात अलग है कि प्रशासन ग्रामीणों की पीठ थपथपाने की बजाय अभी तक ग्रामीणों के जंगल बचाने के उद्देश्य को नहीं समझ पाया और अधिकारी सड़क को स्वीकार करने से कतरा रहे हैं।
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वर्ष 2004 में डांग से पोखरी सड़क निर्माण का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ था। एनआईएम बैंड से पोखरी के लिए सड़क निर्माण होना था, लेकिन डांग के ग्रामीणों ने यह कहकर सड़क का विरोध किया कि यहां से उनका जंगल तहस-नहस हो जाएगा। डांग के ग्रामीण वर्ष 1982 से चिपको आंदोलन के दौर से ही यहां पेड़ों पर रक्षासूत्र बांधकर पर्यावरण को बचाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
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सड़क से जंगल नष्ट होने की संभावनाओं के बीच ग्रामीणों ने इसका विरोध किया और बिना किसी सरकारी सपोर्ट के पोखरी गांव के लिए अपने खेतों से श्रमदान के जरिए सड़क बनाने की ठान ली। तीन महीने बाद ग्रामीणों ने पोखरी गांव तक 560 मीटर सड़क तैयार कर दी है।
अब बाकी 150 मीटर हिस्से में पोखरी गांव के खेत आड़े आ रहे हैं। गांव के नागेंद्र जगूड़ी, बच्चन सिंह गुर्साइं का कहना है कि यदि पोखरी गांव के ग्रामीण अपने खेत दे देते हैं, तो सड़क बनकर तैयार है। ग्रामीणों को खुशी इस बात की है कि इसमें उनका जंगल भी बच गया और सरकार का पैसा भी। लेकिन सड़क का फैसला अभी भी प्रशासन के हाथ में बाकी है।
प्रशासन यदि ग्रामीणों की बनाई सड़क से संतुष्ट हुआ, तो डांग गांव के लिए इसे बड़ी उपलब्धि माना जाएगा। प्रभारी डीएम व सीडीओ उदय सिंह राणा का कहना है कि प्रशासन डांग-पोखरी सड़क को लेकर दोनों गांव की आपसी असमंजस की स्थिति का समाधान करने को तैयार है। उनका कहना है कि सड़क को लेकर दोनों गांव के बीच उपजी विवाद की स्थिति को प्रशासन गंभीरता से ले रहा है। ग्रामीणों की ओर से तैयार की गई सड़क सराहनीय प्रयास है।