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उत्तरकाशी: सूख रहे है गाड-गदेरे और पनियारे
ब्यूरो/अमर उजाला उत्तरकाशी
Updated Tue, 03 May 2016 10:08 PM IST
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पानी का अकूत भंडार होने के बावजूद उत्तरकाशी जिले के गांव के प्राकृतिक जलस्रोत, गाड-गदेरे और पनियारे सूखते जा रहे हैं। जनस्वास्थ्य से जुड़े पेयजल प्रबंधन और तकनीकी अपग्रेड नहीं करने से स्थिति यह है कि 686 गांव एवं छह कस्बों की 3.30 लाख आबादी के लिए 1075 पेयजल योजनाएं, 784 हैंडपंप, 925 बेसिक एवं जूनियर स्कूलों के लिए पीने के पानी की लाइन और अब ट्यूबवेल वाली योजनाएं बनने के बावजूद यहां पानी के लिए हाहाकार वाली स्थिति है।
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जिले में 65 प्रतिशत से ज्यादा योजनाओं का वाटर डिस्चार्ज घट गया है। पारंपरिक जलस्रोत सूख रहे हैं। पेयजल किल्लत से पलायन बढ़ रहा है। जिला मुख्यालय के लिए ही सदाबहार जलस्रोत क्वारीगाड, असी गंगा, वरुणा और इंद्रावती नदी से पांच पेयजल योजनाएं बनी हैं।
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बावजूद इसके नगरवासियों को कुछ ही घंटे पानी मिल रहा है। अब एडीबी के 8.53 करोड़ रुपये से ज्ञानसू, रामलीला मैदान और तिलोथ में तीन ट्यूबवेल लगाए गए हैं। बड़कोट, पुरोला, डुंडा एवं चिन्यालीसौड़ कस्बों के लिए भी ट्यूबवेल से पानी की व्यवस्था की तैयारी है।
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ग्रेविटी बेस योजनाओं की स्थिति यह है कि कामरगाड से बाड़ागड्डी के कुरोली, कंकराड़ी, बौंगाड़ी, मस्ताड़ी, थलन और मुस्टिकसौड़ के लिए 3.14 करोड़ की योजना से पानी मुख्य टैंक तक नहीं पहुंचा। यहां पहले भी कुरोली और बौंगाड़ी के लिए बनी पेयजल योजनाओं पर पानी नहीं चल रहा है।
अब यहां भी ट्यूबवेल से पानी पहुंचाने की तैयारी की जा रही है। इन योजनाओं में प्रभावी फिल्टर प्रणाली नहीं होने से दूषित पेयजल आपूर्ति से जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है।
पानी का ग्रिड बनाने की जरूरत
उत्तरकाशी। जानकारों के मुताबिक यहां कभी पानी प्रबंधन और तकनीकी अपग्रेडेशन पर काम ही नहीं हुआ। पेयजल योजनाओं के रखरखाव के लिए विवेचना सेल और अनुसंधान एवं नियोजन के बारे में नहीं सोचा गया।
जब भाखड़ा और यमुना से ज्यादा गंगा भागीरथी का पानी दिल्ली वालों की प्यास बुझाने के लिए पहुंचाया जा सकता है तो फिर गांव, जिला और राज्य स्तर पर बारहमासी जलस्रोतों से पानी का ग्रिड बनाकर प्रदेशवासियों की प्यास क्यों नहीं बुझाई जा सकती।
बोरिंग वाली पेयजल योजनाएं सफल हो रही हैं। इसमें बिजली के अलावा कोई ज्यादा खर्च नहीं है। यह सही है कि बिजली की तरह पेयजल का भी ग्रिड बनना चाहिए। क्योंकि उत्तराखंड के अपर हिमालयी क्षेत्र में पानी का अकूत भंडार है। स्वास्थ्य की तरह ही पेयजल की भी नियमित समीक्षा होनी चाहिए। पानी के अनुसंधन एवं नियोजन पर काम करने की जरूरत है।
- प्रकाश चंद्र किमोठी, महाप्रबंधक उत्तराखंड जल संस्थान।