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हिमाचल के नाम से बिक रहा उपला टकनौर का सेब
Updated Mon, 01 Oct 2018 10:45 PM IST
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उत्तरकाशी। सेब उत्पादन में उत्तराखंड में अव्वल होने के बावजूद हर्षिल उपला टकनौर क्षेत्र का सेब हिमाचल ब्रांड के नाम से मंडियों में बिक रहा है। सेब खरीद के लिए बाहर से पहुंच रहे कारोबारी हिमाचल ब्रांड की पेटियों में सेब ले जा रहे हैं। उद्यान विभाग की ओर से समय पर उत्तराखंड ब्रांड की पेटियां उपलब्ध नहीं कराने और सब्सिडी पर मिलने वाली पेटियों की खराब गुणवत्ता के कारण यह स्थिति आ रही है। साथ ही जानकार इसके लिए देश की प्रतिष्ठित मंडियों में उत्तराखंड ब्रांड पंजीकृत नहीं होने को भी इसका कारण मान रहे हैं।
बीते कई दशकों से उत्तरकाशी के उपला टकनौर, स्योरी नौगांव एवं मोरी के आराकोट बंगाण क्षेत्र में सेब के बागीचे लहलहा रहे हैं। सालाना करीब बीस हजार मीट्रिक टन सेब उत्पादन कर जनपद प्रदेश में अव्वल है। जनपद में लंबे समय से सेब का व्यवसायिक उत्पादन हो रहा है, लेकिन अभी तक यहां के सेब को अपनी अलग पहचान नहीं मिल पायी है। अब भी बाहरी क्षेत्रों से आने वाले कारोबारी हिमाचल ब्रांड की पेटियों में सेब पैक कर ले जा रहे हैं। यूं तो उद्यान विभाग द्वारा कुछ सालों से सब्सिडी पर उत्तराखंड ब्रांड की पेटियां सेब काश्तकारों को मुहैया करायी जा रही है, लेकिन समय पर पेटियां उपलब्ध नहीं होने और पेटियों की गुणवत्ता खराब होने के कारण इनका प्रचलन नहीं बढ़ पा रहा है।
कुछ सेब कारोबारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दिल्ली, मुंबई आदि बड़ी मंडियों में उत्तराखंड ब्रांड पंजीकृत नहीं होने से अच्छे दाम नहीं मिल पाते। इसके मुकाबले हिमाचल ब्रांड को ज्यादा दाम मिल जाते हैं। इसी कारण कारोबारी हिमाचल ब्रांड के नाम से कारोबार कर रहे हैं। सुक्की के सेब किसान मोहन सिंह राणा, धराली के जयभगवान पंवार आदि का कहना है कि सरकार बड़ी मंडियों में उत्तराखंड के सेब आदि उत्पादों को बेचने के लिए पंजीकरण एवं स्थान की व्यवस्था करें, तो स्थानीय सेब काश्तकारों को ज्यादा मुनाफा मिलेगा। साथ ही उन्होंने उद्यान विभाग के माध्यम से समय पर अच्छी गुणवत्ता की सेब पेटियां उपलब्ध कराने की मांग की है।
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कोट.........
अभी हाल ही में उपला टकनौर क्षेत्र में सेब किसानों को सब्सिडी पर करीब 40 रुपये प्रति पेटी की दर से उत्तराखंड ब्रांड की सेब की दस हजार पेटियां मुहैया कराई गई हैं। इनकी गुणवत्ता में कोई कमी नहीं है। मंडियों में नफा नुकसान को देखकर ही कारोबारी ब्रांड नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं।
एनके सिंह, सहायक उद्यान अधिकारी उत्तरकाशी।
पर्यटकों को भा रहे हर्षिल के सेब
उत्तरकाशी। उपला टकनौर क्षेत्र में आजकल हर तरफ सेबों की लाली और खुशबू बिखरी हुई है। बाहर से आए कारोबारियों के साथ ही गंगोत्री धाम की यात्रा पर आ रहे तीर्थयात्री एवं पर्यटक भी यहां से सेब खरीद कर ले जा रहे हैं। लोगों को क्षेत्र के रसीले सेबों का स्वाद खूब भा रहा है। साथ ही सेब काश्तकारों के चेहरे भी खिले हुए हैं।
गंगोत्री हाईवे से लगे जिले के उपला टकनौर क्षेत्र के सुक्की, झाला, हर्षिल, धराली आदि गांवों में आजकल हर तरफ सेब ही सेब नजर आ रहा है। लाल सेबों से लदे सेब के बागीचे और सड़क किनारे क्रेटों में रखकर बिक रहे सेब लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। बड़ी संख्या में बाहर से आए सेब कारोबारी यहां सेब की खरीद में जुटे हुए हैं। हर्षिल और धराली में ग्रेडिंग मशीन लगाकर सेब की ग्रेडिंग और पैकिंग की जा रही है, जबकि अधिकांश बागीचों में हाथ से ही सेब की ग्रेडिंग की जा रही है। यहां से रोजाना चार से पांच ट्रक बाहरी मंडियों में बिकने जा रहे हैं। गंगोत्री धाम की यात्रा पर आ रहे तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को भी बागीचों से ताजा तोड़कर बेचे जा रहे सेबों का स्वाद खूब भा रहा है। यात्री धराली, हर्षिल आदि स्थानों पर अपने वाहन रोक कर यहां से सेब खरीद कर ले जा रहे हैं।
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बीते कई दशकों से उत्तरकाशी के उपला टकनौर, स्योरी नौगांव एवं मोरी के आराकोट बंगाण क्षेत्र में सेब के बागीचे लहलहा रहे हैं। सालाना करीब बीस हजार मीट्रिक टन सेब उत्पादन कर जनपद प्रदेश में अव्वल है। जनपद में लंबे समय से सेब का व्यवसायिक उत्पादन हो रहा है, लेकिन अभी तक यहां के सेब को अपनी अलग पहचान नहीं मिल पायी है। अब भी बाहरी क्षेत्रों से आने वाले कारोबारी हिमाचल ब्रांड की पेटियों में सेब पैक कर ले जा रहे हैं। यूं तो उद्यान विभाग द्वारा कुछ सालों से सब्सिडी पर उत्तराखंड ब्रांड की पेटियां सेब काश्तकारों को मुहैया करायी जा रही है, लेकिन समय पर पेटियां उपलब्ध नहीं होने और पेटियों की गुणवत्ता खराब होने के कारण इनका प्रचलन नहीं बढ़ पा रहा है।
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कुछ सेब कारोबारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दिल्ली, मुंबई आदि बड़ी मंडियों में उत्तराखंड ब्रांड पंजीकृत नहीं होने से अच्छे दाम नहीं मिल पाते। इसके मुकाबले हिमाचल ब्रांड को ज्यादा दाम मिल जाते हैं। इसी कारण कारोबारी हिमाचल ब्रांड के नाम से कारोबार कर रहे हैं। सुक्की के सेब किसान मोहन सिंह राणा, धराली के जयभगवान पंवार आदि का कहना है कि सरकार बड़ी मंडियों में उत्तराखंड के सेब आदि उत्पादों को बेचने के लिए पंजीकरण एवं स्थान की व्यवस्था करें, तो स्थानीय सेब काश्तकारों को ज्यादा मुनाफा मिलेगा। साथ ही उन्होंने उद्यान विभाग के माध्यम से समय पर अच्छी गुणवत्ता की सेब पेटियां उपलब्ध कराने की मांग की है।
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अभी हाल ही में उपला टकनौर क्षेत्र में सेब किसानों को सब्सिडी पर करीब 40 रुपये प्रति पेटी की दर से उत्तराखंड ब्रांड की सेब की दस हजार पेटियां मुहैया कराई गई हैं। इनकी गुणवत्ता में कोई कमी नहीं है। मंडियों में नफा नुकसान को देखकर ही कारोबारी ब्रांड नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं।
एनके सिंह, सहायक उद्यान अधिकारी उत्तरकाशी।
पर्यटकों को भा रहे हर्षिल के सेब
उत्तरकाशी। उपला टकनौर क्षेत्र में आजकल हर तरफ सेबों की लाली और खुशबू बिखरी हुई है। बाहर से आए कारोबारियों के साथ ही गंगोत्री धाम की यात्रा पर आ रहे तीर्थयात्री एवं पर्यटक भी यहां से सेब खरीद कर ले जा रहे हैं। लोगों को क्षेत्र के रसीले सेबों का स्वाद खूब भा रहा है। साथ ही सेब काश्तकारों के चेहरे भी खिले हुए हैं।
गंगोत्री हाईवे से लगे जिले के उपला टकनौर क्षेत्र के सुक्की, झाला, हर्षिल, धराली आदि गांवों में आजकल हर तरफ सेब ही सेब नजर आ रहा है। लाल सेबों से लदे सेब के बागीचे और सड़क किनारे क्रेटों में रखकर बिक रहे सेब लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। बड़ी संख्या में बाहर से आए सेब कारोबारी यहां सेब की खरीद में जुटे हुए हैं। हर्षिल और धराली में ग्रेडिंग मशीन लगाकर सेब की ग्रेडिंग और पैकिंग की जा रही है, जबकि अधिकांश बागीचों में हाथ से ही सेब की ग्रेडिंग की जा रही है। यहां से रोजाना चार से पांच ट्रक बाहरी मंडियों में बिकने जा रहे हैं। गंगोत्री धाम की यात्रा पर आ रहे तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को भी बागीचों से ताजा तोड़कर बेचे जा रहे सेबों का स्वाद खूब भा रहा है। यात्री धराली, हर्षिल आदि स्थानों पर अपने वाहन रोक कर यहां से सेब खरीद कर ले जा रहे हैं।