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बूढ़े कंधों पर टिकी जाड समुदाय की हस्तशिल्प कला
Updated Sun, 22 Oct 2017 10:43 PM IST
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उत्तरकाशी। जनपद के सीमांत क्षेत्रों के जाड-भोटिया जनजातियों की हस्तशिल्प कला आज विलुप्ती की कगार में है। इन जनजातियों द्वारा भेड़ के ऊन से बनाए जाने वाले पंखी, दुमकर, पागड़ा आदि वस्त्र आधुनिक कपड़ा बाजार में टिक नहीं पा रहे हैं। हालांकि समुदाय का बुजुर्ग वर्ग इसे बचाने का हरसंभव प्रयास कर रहा है। लेकिन पुरानी तकनीक, सरकारी सहयोग की कमी व नई पीढ़ी में रुचि न होने की वजह से आज इसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है।
उत्तरकाशी महाविद्यालय के प्रोफेसर महेंद्र पाल परमार द्वारा की गई शोध के अनुसार पूर्व में जाड समुदाय का मुख्य कारोबार खेती, भेड़ पालन व तिब्बत से व्यापार था। लेकिन 1962 में बोर्डर में तनाव बढ़ने व नेलांग, जादुंग से इनके विस्थापन के बाद ऊन उद्योग ही इनकी आजीविका का एक मात्र साधन रह गया। समस्या का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस व्यवसाय से जुड़े अधिकतर लोग 40 की उम्र पार कर चुके हैं और युवा पीढ़ी इस घाटे के सौदे का हिस्सा नहीं बनना चाहती है। वहीं पैडल चरखा और खड्डी (हैंडलूम) के जरिए कपड़े बनाने के चलते यह अधिक मात्रा में उत्पादन नहीं कर पाते हैं। जिस वजह से अधिक समय और पैसा खर्च होने के बाद भी न तो फैक्ट्री जैसी गुणवत्ता आ पाती है और न ही मुनाफा होता है। अगर जल्द ही सरकार द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इस कला के विलुप्त होने में देर नहीं लगेगी।
बॉक्स:
ऊन व्यवसाय की प्रमुख समस्याएं
इस कला को जानने वाले अधिकतर लोग 40 की उम्र पार कर चुके हैं। आधुनिक तकनीक का प्रयोग नहीं हो रहा है। युवा पीढ़ी इस कला को छोड़ रही है। ऊन की धुलाई के लिए ठंडे पानी में अधिक रहने से लोगों को जोड़ों की बीमारी हो रही है। ऊन में गुणवत्ता बढ़ाने के लिए लुधियाना व पानीपत की फैक्ट्रियों पर निर्भर होना पड़ा है।
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कोट:
हम शायद इस कला को जानने वाली आखिरी पीढ़ी हों। हमारे बच्चे बेहतर भविष्य की उम्मीद में शहर जा रहे हैं। अगर सरकार आधुनिक मशीनें लगाकर उचित प्रमोशन करे तो शायद यह कला विलुप्त होने से बच सकती है।
- लीला देवी, जाड समुदाय की महिला।
कोट:
विभाग द्वारा ग्रामीणों को व्यवसाय करने के लिए लोन दिया जाता है। डुंडा में एक कार्डिंग मशीन भी लगाई गई है। साथ ही समय-समय पर ट्रेनिंग भी कराई जाती है। - जेपी बहुगुणा, महाप्रबंधक, जिला उद्योग केंद्र।
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उत्तरकाशी महाविद्यालय के प्रोफेसर महेंद्र पाल परमार द्वारा की गई शोध के अनुसार पूर्व में जाड समुदाय का मुख्य कारोबार खेती, भेड़ पालन व तिब्बत से व्यापार था। लेकिन 1962 में बोर्डर में तनाव बढ़ने व नेलांग, जादुंग से इनके विस्थापन के बाद ऊन उद्योग ही इनकी आजीविका का एक मात्र साधन रह गया। समस्या का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस व्यवसाय से जुड़े अधिकतर लोग 40 की उम्र पार कर चुके हैं और युवा पीढ़ी इस घाटे के सौदे का हिस्सा नहीं बनना चाहती है। वहीं पैडल चरखा और खड्डी (हैंडलूम) के जरिए कपड़े बनाने के चलते यह अधिक मात्रा में उत्पादन नहीं कर पाते हैं। जिस वजह से अधिक समय और पैसा खर्च होने के बाद भी न तो फैक्ट्री जैसी गुणवत्ता आ पाती है और न ही मुनाफा होता है। अगर जल्द ही सरकार द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इस कला के विलुप्त होने में देर नहीं लगेगी।
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ऊन व्यवसाय की प्रमुख समस्याएं
इस कला को जानने वाले अधिकतर लोग 40 की उम्र पार कर चुके हैं। आधुनिक तकनीक का प्रयोग नहीं हो रहा है। युवा पीढ़ी इस कला को छोड़ रही है। ऊन की धुलाई के लिए ठंडे पानी में अधिक रहने से लोगों को जोड़ों की बीमारी हो रही है। ऊन में गुणवत्ता बढ़ाने के लिए लुधियाना व पानीपत की फैक्ट्रियों पर निर्भर होना पड़ा है।
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हम शायद इस कला को जानने वाली आखिरी पीढ़ी हों। हमारे बच्चे बेहतर भविष्य की उम्मीद में शहर जा रहे हैं। अगर सरकार आधुनिक मशीनें लगाकर उचित प्रमोशन करे तो शायद यह कला विलुप्त होने से बच सकती है।
- लीला देवी, जाड समुदाय की महिला।
कोट:
विभाग द्वारा ग्रामीणों को व्यवसाय करने के लिए लोन दिया जाता है। डुंडा में एक कार्डिंग मशीन भी लगाई गई है। साथ ही समय-समय पर ट्रेनिंग भी कराई जाती है। - जेपी बहुगुणा, महाप्रबंधक, जिला उद्योग केंद्र।