{"_id":"59e240f24f1c1b86698b5d0a","slug":"150800005117-utter-kashi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"घटती स्नो लाइन से गंगोत्री ग्लेशियर हो रहा कमजोर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
घटती स्नो लाइन से गंगोत्री ग्लेशियर हो रहा कमजोर
Updated Sat, 14 Oct 2017 10:27 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तरकाशी। जलवायु परिवर्तन का सीधा असर अब उच्च हिमालयी क्षेत्रों में दिखने लगा है। औसत तापमान में बढ़ोतरी के कारण गोमुख के आसपास की स्नो लाइन पीछे खिसकने लगी है। इससे सालभर बर्फ से ढके रहने वाले इलाकों में भी अब पेड़ और झाड़ियां उगने लगी हैं, जिसका असर गंगोत्री ग्लेशियर और वन्य जीवों के व्यवहार पर भी पड़ रहा है। भू-वैज्ञानिकों की मानें तो अगर इसी तरह स्नो लाइन पीछे हटती रही तो गोमुख क्षेत्र का भूगोल बदलने में वक्त नहीं लगेगा।
वाडिया हिमालय भूगर्भ संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी के अनुसार सर्दियों में गिरने वाली ताजा बर्फ गर्मी के मौसम में पिघलकर नदी में समा जाती है, लेकिन स्नो लाइन में जमा स्थायी बर्फ ही गंगोत्री ग्लेशियर को पोषण देकर मजबूत करती है। स्नो लाइन जितनी नीचे होगी ग्लेशियर भी उतने ही मजबूत होंगे। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में औसत तापमान बढ़ने से स्नो लाइन पीछे खिसक गई है। इस वजह से गंगोत्री ग्लेशियर को जरूरत के मुताबिक स्थायी बर्फ नहीं मिल पा रही है। उन्होंने बताया कि मौसम बदलने के कारण क्षेत्र के मौनसून का पैटर्न भी बदल गया है। इससे बर्फबारी कम तथा बारिश अधिक होने लगी है। ऐसे में जिन स्थानों पर जहां पहले स्थायी बर्फ होती थी, वहां आज बुरांश प्रजाति की झाड़ियां और भोज-पत्र के पेड़ उग आए हैं। बर्फ कम होने और बारिश अधिक होने से भूस्खलन की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। इससे गंगोत्री ग्लेशियर को भी नुकसान हुआ है। स्नो लाइन तथा ट्री लाइन में आए बदलावों से उच्च हिमालयी क्षेत्र के वन्य जीवों के वासस्थल को भी नुकसान पहुंचा है।
डॉ. नेगी ने कहा कि गोमुख के पर्यावरण को बचाने के लिए गंगोत्री से उत्तरकाशी तक के क्षेत्र में वनीकरण जैसे कार्यों को बढ़ावा देना होगा। साथ ही दुनिया भर के देशों को जलवायु परिर्वतन को रोकने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी।
विज्ञापन
इनसेट
क्या है स्नो लाइन
स्नो लाइन वो क्षेत्र होता है, जिसके पीछे सालभर स्थायी बर्फ होती है। इसके नीचे के हिस्से से ट्री लाइन शुरू होती है, जहां छोटी झाड़ियां और उसके बाद पेड़ उगते हैं। स्नो लाइन ग्लेशियरों के पोषण के लिए बहुत जरूरी होती है।
विज्ञापन
वाडिया हिमालय भूगर्भ संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी के अनुसार सर्दियों में गिरने वाली ताजा बर्फ गर्मी के मौसम में पिघलकर नदी में समा जाती है, लेकिन स्नो लाइन में जमा स्थायी बर्फ ही गंगोत्री ग्लेशियर को पोषण देकर मजबूत करती है। स्नो लाइन जितनी नीचे होगी ग्लेशियर भी उतने ही मजबूत होंगे। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में औसत तापमान बढ़ने से स्नो लाइन पीछे खिसक गई है। इस वजह से गंगोत्री ग्लेशियर को जरूरत के मुताबिक स्थायी बर्फ नहीं मिल पा रही है। उन्होंने बताया कि मौसम बदलने के कारण क्षेत्र के मौनसून का पैटर्न भी बदल गया है। इससे बर्फबारी कम तथा बारिश अधिक होने लगी है। ऐसे में जिन स्थानों पर जहां पहले स्थायी बर्फ होती थी, वहां आज बुरांश प्रजाति की झाड़ियां और भोज-पत्र के पेड़ उग आए हैं। बर्फ कम होने और बारिश अधिक होने से भूस्खलन की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। इससे गंगोत्री ग्लेशियर को भी नुकसान हुआ है। स्नो लाइन तथा ट्री लाइन में आए बदलावों से उच्च हिमालयी क्षेत्र के वन्य जीवों के वासस्थल को भी नुकसान पहुंचा है।
विज्ञापन
डॉ. नेगी ने कहा कि गोमुख के पर्यावरण को बचाने के लिए गंगोत्री से उत्तरकाशी तक के क्षेत्र में वनीकरण जैसे कार्यों को बढ़ावा देना होगा। साथ ही दुनिया भर के देशों को जलवायु परिर्वतन को रोकने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी।
विज्ञापन
इनसेट
क्या है स्नो लाइन
स्नो लाइन वो क्षेत्र होता है, जिसके पीछे सालभर स्थायी बर्फ होती है। इसके नीचे के हिस्से से ट्री लाइन शुरू होती है, जहां छोटी झाड़ियां और उसके बाद पेड़ उगते हैं। स्नो लाइन ग्लेशियरों के पोषण के लिए बहुत जरूरी होती है।