{"_id":"2838aa58-dcd6-11e2-8462-d4ae52bc57c2","slug":"uttarakhand-flood-heavy-rain-disaster","type":"story","status":"publish","title_hn":"अपनों को खोकर भी हौसला नहीं हारे","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अपनों को खोकर भी हौसला नहीं हारे
देहरादून/आफताब अजमत
Updated Mon, 24 Jun 2013 07:28 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
साहब हमारे परिवार के दो लोग गायब हैं और गांव के तमाम परिवारों के कमाई करने वाले आपदा में मारे गए। बावजूद आपदा से पीड़ित रोते श्रद्धालुओं को देखा नहीं जाता है। भूख, प्यास से तड़पते लोग हाथ फैलाते हैं तो अपना दर्द भुलाकर बरबस ही उनकी सहायता के लिए हाथ बढ़ चलता है।
विज्ञापन
नौ दिनों से लगातार गांव के हर घर से पीड़ितों के लिए खाना पकाया गया लेकिन अब खुद मोहताज हो रहे हैं। हजारों लोगों को खाना खिलाकर हमारा सालभर का अनाज का कोटा खत्म हो गया है। यह व्यथा है केदारघाटी के जाल चौमासी गांव के ग्रामीणों की।
विज्ञापन
'उत्तराखंड में कहर' अपडेट के लिए क्लिक करें
विज्ञापन
ग्रामीण अशोक सिंह पंवार ने बताया कि लवारा, ऊछौला बांगर, बडासू सहित कई गांव ऐसे हैं, जिनमें तबाही सबसे करीब रही है। यहां के बचे हुए लोगों ने जब भूख-प्यास से बिलबिलाते श्रद्धालुओं को देखा तो मदद को सामने आ गए।
सालभर के कोटे का अनाज पीड़ितों की मदद में लगा दिया। नौ दिनों तक लंगर जैसी परिस्थितियों में ग्रामीणों ने घर से रोटी-रोटी जुटाकर पीड़ितों की सेवा तो कर ली लेकिन अब उनके लिए अनाज का संकट हो गया है। राहत सामग्री भी सही तरीके से नहीं पहुंच पा रही है।
कई गांवों के लोग तो एक बार फिर अपनी रोजी-रोटी के लिए मेहनत मजदूरी में जुट गए हैं। आपदा में स्थानीय निवासियों ने भी अपना बहुत कुछ खोया है, परिवार में कमाने वालों को खोने के साथ आजीविका के साधन तबाह हो चुके हैं, जिनका अभी कोई जिक्र नहीं है।
भारत ज्ञान समिति रुद्रप्रयाग की जिला सचिव उमा भट्ट ने फोन पर बताया कि व्यापार समिति तिलवाड़ा के मान सिंह जगवाण, चंद्रापुरी में जगमोहन, विजय नगर में नरेंद्र सेमवाल, उमेश कांडपाल, मुकेश भंडारी, तिल्ली में बीजीवीएस के गजेंद्र रौतेला, गुप्तकाशी के लखपत सिंह राणा, विद्यापीठ मेडिकल कालेज के प्रबंधक, फ ाटा के राजेंद्र सेमवाल, डिढोली गांव, सोनप्रयाग, गोरी गांव के ग्रामवासी दिन-रात यात्रियों की हरसंभव सहायता कर रहे हैं। लेकिन अब उनके लिए भी मुश्किल हालात पैदा होने लगे हैं।
खेत मलबे में तब्दील
तमाम ऐसे भी गांव हैं, जिनमें मौजूद ग्रामीणों की रोजी-रोटी के साधन खेत मलबे में तब्दील हो गए हैं। कोसी गांव में आपदा से 22 लोगों की जान गई है। खेतों का जबर्दस्त नुकसान हुआ है। अब न तो वह कुछ बो पाएंगे और न ही खा पाएंगे। स्थानीय ग्रामीणों को भी अब मदद की दरकार है।
केदार बाबा की शरण में मिलती थी रोजी
ग्रामीणों का कहना है कि ज्यादातर युवा केदारघाटी से निकलकर बाबा केदार की शरण में रोजगार के लिए जाते हैं। कोई गेस्ट हाउस में नौकरी कर अपना गुजारा करता है तो कोई छोटी दुकान लगाकर पेट पालता है। आपदा की वजह से सबकुछ खत्म हो गया। अब रोजगार का कोई साधन नजर नहीं आ रहा है।
60 से ज्यादा गांवों का संपर्क कटा
आपदा के चलते केदारघाटी के 60 से ज्यादा गांवों का संपर्क पूरी तरह से कटा हुआ है। ऊछौला बांगर गांव के पूर्व प्रधान ईश्वर सिंह पंवार ने बताया कि फिलहाल प्रशासन का ध्यान भी केवल जिंदा बचे और जंगल में फंसे हुए लोगों को बचाने पर है। गांवों में नौ दिनों से बिजली और संचार व्यवस्था भी ठप है। उन्होंने बताया कि गौरीगांव में मृतकों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसके अलावा लवारा, लमगौंड़ी, भाणियूं, बरासूं, जालचौमासी, तीलोंग, साल्या, तुलंगा सहित तमाम ऐसे गांव हैं जो तबाही का सबसे ज्यादा शिकार हुए हैं।