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छोटे-छोटे कदमों से CM की चुनावी मैराथन जीतने की कोशिश
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 12 Mar 2016 11:12 AM IST
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हरीश रावत
- फोटो : file photo
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मुख्यमंत्री हरीश रावत की पसंदीदा घोषणा है बौनों, तीर्थ पुरोहितों और समाज के अन्य वर्गों के लिए पेंशन। लीक से अलग हटकर की गई इस घोषणा के निहितार्थ मारक हैं। हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा।
बौनों के लिए की गई पेंशन की योजना तुरंत ध्यान खींचती है और इसमें सरकार का खास पैसा भी नहीं लगता। शुक्रवार को सदन के पटल पर रखे गए बजट का हाल भी करीब-करीब यही है।
छोटी-छोटी तमाम घोषणाएं मतदाताओं का तुरंत ध्यान खींचती हैं और इसमें राज्य सरकार को अलग से बड़े संसाधन जुटाने के लिए ज्यादा जोर भी नहीं लगाना पड़ता।
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तात्कालिक तौर पर बजट छोटे कदमों से चुनावी मैराथन को जीतने की कोशिश नजर आती है। हालांकि मुख्यमंत्री कहते रहे हैं कि यही छोटी कोशिशें कामयाब होंगी।
सातवें वेतन आयोग के लिए चाहिए 11 हजार करोड़:
प्रदेश सरकार ने इस बजट में योजनाओं के लिए 15 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था की है। दूसरी तरफ, सातवें वेतन आयोग के लिए ही राज्य सरकार को करीब 11 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी पड़ी है।
वेतन, पेंशन और ब्याज पर प्रदेश सरकार को करीब 18 हजार करोड़ रुपये खर्च करना पड़ रहा है। जाहिर है कि योजनाओं के लिए पैसा सरकार के पास बहुत ज्यादा नहीं हैं।
इतना होने पर भी गांव, गरीब, गलगल, गृहथ, गुरुजी का यह बजट बनाया गया है। सड़क, पुल, संचार प्रदेश की सबसे बड़ी जरूरत हैं। राज्यपाल के अभिभाषण में सरकार ने माना था कि करीब चार हजार गांवों को बिजली दी जानी हैं। बजट में अवस्थापना विकास के लिए बहुत अधिक जोर दिखाई नहीं देता।
बजट में नहीं महत्वकांक्षी योजना का जिक्र:
इस मोरचे पर विभागों की अपनी कोशिश पर ही सरकार ने भरोसा किया है। बजट में किसी महत्वकांक्षी योजना का सरकार ने जिक्र नहीं किया है।
गैर आबाद गांवों को आबाद करने की बात की गई है पर इसके लिए गांवों में लघु उद्योगों को स्थापित, विशेषज्ञ समूह गठित करने पर ही सरकार के कदम ठिठक गए।
गैर आबाद गांवों को आबाद करने के लिए प्रवासियों को लुभाने की बात सरकार करती रही है। बजट में प्रवासी शब्द ही नहीं है। बेरोजगारी प्रदेश के लिए बड़ा मुद्दा है। गांवों से पलायन की वजह बेरोजगारी भी मानी जाती है। बेरोजगारी भत्ता प्रदेश में शुरू किया गया। यह करीब दो हजार युवाओं को दिया जा रहा है।
नियोजन सरकार के लिए चुनौती:
सेवायोजन केंद्रों में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या ही पांच लाख है। गांवों से खेती चौपट हो रही है। जाहिर है कि गांवों के युवाओं के लिए रोजगार एक जरूरी कदम होता।
बजट में इस दिशा में पहल होती नहीं दिख रही है। नीति आयोग के बाद के दौर में अपने स्तर पर नियोजन सरकार के लिए चुनौती है।
अपनी आय में 17 प्रतिशत इजाफे का जिक्र किया गया है। वस्तुओं और अन्य सेवाओं पर टैक्स 97 करोड़ रुपये से बढ़कर 397 करोड़ रुपये कैसे हो जाएगा, यह बजट में नहीं दिखता। यह तब है जबकि सरकार ने बजट में कोई नया कर प्रस्तावित नहीं किया है।
समग्र रूप में देखेंगे तो प्रदेश सरकार की छोटी-छोटी घोषणाएं प्रदेश को तेज विकास की ओर ले जाएंगी। इसका परिणाम तुरंत सामने नहीं आएगा पर आने वाले तीन साल के अंदर एक बड़ा बदलाव दिखाई देगा। प्रदेश सरकार क्रिटिकल गैप फंडिंग पर भी ध्यान दे रही है। कमियों को दूर किया जा रहा है।
-मुख्यमंत्री हरीश रावत
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बौनों के लिए की गई पेंशन की योजना तुरंत ध्यान खींचती है और इसमें सरकार का खास पैसा भी नहीं लगता। शुक्रवार को सदन के पटल पर रखे गए बजट का हाल भी करीब-करीब यही है।
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छोटी-छोटी तमाम घोषणाएं मतदाताओं का तुरंत ध्यान खींचती हैं और इसमें राज्य सरकार को अलग से बड़े संसाधन जुटाने के लिए ज्यादा जोर भी नहीं लगाना पड़ता।
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तात्कालिक तौर पर बजट छोटे कदमों से चुनावी मैराथन को जीतने की कोशिश नजर आती है। हालांकि मुख्यमंत्री कहते रहे हैं कि यही छोटी कोशिशें कामयाब होंगी।
सातवें वेतन आयोग के लिए चाहिए 11 हजार करोड़:
प्रदेश सरकार ने इस बजट में योजनाओं के लिए 15 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था की है। दूसरी तरफ, सातवें वेतन आयोग के लिए ही राज्य सरकार को करीब 11 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था करनी पड़ी है।
वेतन, पेंशन और ब्याज पर प्रदेश सरकार को करीब 18 हजार करोड़ रुपये खर्च करना पड़ रहा है। जाहिर है कि योजनाओं के लिए पैसा सरकार के पास बहुत ज्यादा नहीं हैं।
इतना होने पर भी गांव, गरीब, गलगल, गृहथ, गुरुजी का यह बजट बनाया गया है। सड़क, पुल, संचार प्रदेश की सबसे बड़ी जरूरत हैं। राज्यपाल के अभिभाषण में सरकार ने माना था कि करीब चार हजार गांवों को बिजली दी जानी हैं। बजट में अवस्थापना विकास के लिए बहुत अधिक जोर दिखाई नहीं देता।
बजट में नहीं महत्वकांक्षी योजना का जिक्र:
इस मोरचे पर विभागों की अपनी कोशिश पर ही सरकार ने भरोसा किया है। बजट में किसी महत्वकांक्षी योजना का सरकार ने जिक्र नहीं किया है।
गैर आबाद गांवों को आबाद करने की बात की गई है पर इसके लिए गांवों में लघु उद्योगों को स्थापित, विशेषज्ञ समूह गठित करने पर ही सरकार के कदम ठिठक गए।
गैर आबाद गांवों को आबाद करने के लिए प्रवासियों को लुभाने की बात सरकार करती रही है। बजट में प्रवासी शब्द ही नहीं है। बेरोजगारी प्रदेश के लिए बड़ा मुद्दा है। गांवों से पलायन की वजह बेरोजगारी भी मानी जाती है। बेरोजगारी भत्ता प्रदेश में शुरू किया गया। यह करीब दो हजार युवाओं को दिया जा रहा है।
नियोजन सरकार के लिए चुनौती:
सेवायोजन केंद्रों में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या ही पांच लाख है। गांवों से खेती चौपट हो रही है। जाहिर है कि गांवों के युवाओं के लिए रोजगार एक जरूरी कदम होता।
बजट में इस दिशा में पहल होती नहीं दिख रही है। नीति आयोग के बाद के दौर में अपने स्तर पर नियोजन सरकार के लिए चुनौती है।
अपनी आय में 17 प्रतिशत इजाफे का जिक्र किया गया है। वस्तुओं और अन्य सेवाओं पर टैक्स 97 करोड़ रुपये से बढ़कर 397 करोड़ रुपये कैसे हो जाएगा, यह बजट में नहीं दिखता। यह तब है जबकि सरकार ने बजट में कोई नया कर प्रस्तावित नहीं किया है।
समग्र रूप में देखेंगे तो प्रदेश सरकार की छोटी-छोटी घोषणाएं प्रदेश को तेज विकास की ओर ले जाएंगी। इसका परिणाम तुरंत सामने नहीं आएगा पर आने वाले तीन साल के अंदर एक बड़ा बदलाव दिखाई देगा। प्रदेश सरकार क्रिटिकल गैप फंडिंग पर भी ध्यान दे रही है। कमियों को दूर किया जा रहा है।
-मुख्यमंत्री हरीश रावत