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दो बार बगावत कर चुकीं ऊषा को मेयर का टिकट
आरडी खान काशीपुर।
Updated Sun, 21 Oct 2018 12:37 AM IST
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एक बार पालिकाध्यक्ष और एक बार मेयर चुनी गई ऊषा चौधरी को पहली बार भाजपा ने मेयर पद के लिए प्रत्याशी घोषित किया है। पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ ऊषा दो बार बगावत कर चुकी है। उनकी बगावत के चलते भाजपा को निकाय चुनाव में दो बार करारी हार का मुंह देखना पड़ा है।
निवर्तमान मेयर ऊषा चौधरी के पति ठेकेदार हेमेंद्र चौधरी तीन दशक पूर्व भाजपा और कांग्रेस विरोधी राजनीति के प्रमुख ध्वजवाहक रहे हैं। वर्ष 1989 में जनता दल के नेता के तौर पर वह राजनीति में सक्रिय हुए। शुरुआती दिनों में राजा केसी सिंह बाबा से उनकी खासी घनिष्ठता रही। वर्ष 2003 में ऊषा ने पहली बार नगर पालिका अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा और निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चेयरमैन चुनी गईं।
वर्ष 2008 के चुनाव में ऊषा ने भाजपा के टिकट के लिए आवेदन किया, लेकिन पार्टी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। पार्टी ने तब राम मेहरोत्रा को प्रत्याशी बनाया। पार्टी के इस फैसले के खिलाफ ऊषा ने बगावत कर दी। इस चुनाव में उन्हें जीत तो नहीं मिली, लेकिन भाजपा प्रत्याशी को उन्होंने तीसरे नंबर पर धकेल दिया। इस चुनाव में बसपा प्रत्याशी के सिर जीत का सेहरा सजा।
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काशीपुर नगर निगम घोषित होने के बाद वर्ष 2013 के चुनाव में ऊषा ने फिर भाजपा से मेयर पद के लिए टिकट मांगा, लेकिन पार्टी से बगावत करने के चलते उन्हें टिकट नहीं दिया गया। भाजपा ने तब शिक्षा चौधरी को चुनाव मैदान में उतारा। ऊषा ने इस चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वियों को भारी अंतर से पराजित कर दिया। इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की जमानत तक नहीं बच पाई।
पिछले पांच वर्ष के कार्यकाल में ऊषा ने पार्टी नेतृत्व में एक विश्वास पैदा करने का काम किया। पार्टी में तमाम अंतरविरोधों के बावजूद वह विधायकी के पिछले दो चुनावों में पार्टी प्रत्याशी के साथ पूरी निष्ठा के साथ खड़ी दिखाई दीं। ऊषा के मजबूत जनाधार और पार्टी के प्रति निष्ठा का इनाम उन्हें इस चुनाव में पार्टी के टिकट के रूप में दिया गया।
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निवर्तमान मेयर ऊषा चौधरी के पति ठेकेदार हेमेंद्र चौधरी तीन दशक पूर्व भाजपा और कांग्रेस विरोधी राजनीति के प्रमुख ध्वजवाहक रहे हैं। वर्ष 1989 में जनता दल के नेता के तौर पर वह राजनीति में सक्रिय हुए। शुरुआती दिनों में राजा केसी सिंह बाबा से उनकी खासी घनिष्ठता रही। वर्ष 2003 में ऊषा ने पहली बार नगर पालिका अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा और निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चेयरमैन चुनी गईं।
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वर्ष 2008 के चुनाव में ऊषा ने भाजपा के टिकट के लिए आवेदन किया, लेकिन पार्टी ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। पार्टी ने तब राम मेहरोत्रा को प्रत्याशी बनाया। पार्टी के इस फैसले के खिलाफ ऊषा ने बगावत कर दी। इस चुनाव में उन्हें जीत तो नहीं मिली, लेकिन भाजपा प्रत्याशी को उन्होंने तीसरे नंबर पर धकेल दिया। इस चुनाव में बसपा प्रत्याशी के सिर जीत का सेहरा सजा।
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काशीपुर नगर निगम घोषित होने के बाद वर्ष 2013 के चुनाव में ऊषा ने फिर भाजपा से मेयर पद के लिए टिकट मांगा, लेकिन पार्टी से बगावत करने के चलते उन्हें टिकट नहीं दिया गया। भाजपा ने तब शिक्षा चौधरी को चुनाव मैदान में उतारा। ऊषा ने इस चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वियों को भारी अंतर से पराजित कर दिया। इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की जमानत तक नहीं बच पाई।
पिछले पांच वर्ष के कार्यकाल में ऊषा ने पार्टी नेतृत्व में एक विश्वास पैदा करने का काम किया। पार्टी में तमाम अंतरविरोधों के बावजूद वह विधायकी के पिछले दो चुनावों में पार्टी प्रत्याशी के साथ पूरी निष्ठा के साथ खड़ी दिखाई दीं। ऊषा के मजबूत जनाधार और पार्टी के प्रति निष्ठा का इनाम उन्हें इस चुनाव में पार्टी के टिकट के रूप में दिया गया।