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नोटबंदी के कारण दिहाड़ी मजदूर पलायन के लिए मजबूर
अमर उजाला ब्यूरो, रुद्रपुर
Updated Fri, 18 Nov 2016 11:21 PM IST
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पांच और हजार के नोट बंद होने का असर सिर्फ बड़े कारोबारियों पर ही नहीं पड़ रहा। नोटबंदी का असर मेहनतकश दिहाड़ी मजदूूरों पर भी पड़ रहा है। हालात यह हैं कि सिडकुल स्थापित होने के लगभग दस साल बाद गरीब मजदूर नोट बंद होने से पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं।
नोट बंद होने का असर सिर्फ क्षेत्र के मजदूरों पर ही नहीं पड़ रहा है। सबसे ज्यादा फैसले की मार अन्य राज्यों से आकर सिडकुल में दिहाड़ी कर रहे मजदूरों पर पड़ा है। शहर के गांधी पार्क के बाहर नोट बंदी के फैसले से पहले मजदूरों की भारी भीड़ देखी जाती थी, लेकिन अब बहुत कम संख्या में ही मजदूर गांधी पार्क के बाहर खड़े नजर आते हैं।
तीन वर्ष पहले राजस्थान से आए प्रकाश सिडकुल क्षेत्र में दिहाड़ी पर मजदूरी करता है। कम उम्र में ही अपना घर छोड़ मजदूरी के लिए आए प्रकाश से बात करने पर मालूम हुआ कि वह मजदूरी अच्छी मिलने के कारण पिछले तीन सालों में सिर्फ एक बार घर गया था, लेकिन सरकार के नोटबंदी के फैैसले के बाद प्रकाश को मजदूरी मिलना ही बंद हो गई। इस कारण से वह अब वापस घर जाने की तैयारी कर रहा है।
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वहीं बिहार के समस्तीपुर से आए मनोज यादव को भी नोट बंद होने का बहुत मलाल है। मनोज से बात करने पर पता चला कि फैसले से पहले सबकुछ बहुत ठीक चल रहा था। दिहाड़ी अच्छी मिल रही थी तो घर लेने की भी योजना बनाई जा रही थी, लेकिन आठ तारीख के बाद से तो खाने के लाले पड़ गए हैं। गुस्से में जेब से पांच सौ के नोट निकालकर दिखाते हुए मनोज ने बताया कि अब यह नोट उनके लिए कचरे के सामान है।
क्योंकि न तो उनका यहां बैंक अकाउंट हैं और न ही अन्य कागज। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि वापस घर जाने के लिए भी पैसे पूरे नहीं पड़ रहे। मजदूूरों से बात करने पर पता चला कि सुबह सात बजे वह काम की तलाश में गांधी पार्क के बाहर खड़े हो जाते हैं, लेकिन ग्यारह बजे के बाद तक वह काम की उम्मीद में खड़े रहते हैं। इंतजार के बाद काम नहीं मिलने पर उन्हें मायूस होकर खाली हाथ घर लौटना पड़ता है। वहीं ठेकेदार नाजिम ने बताया कि निर्माण कार्यों पर पहले की तुलना में असर पड़ा है।
रुद्रपुर। बैंकों में बड़े नोट बदलने के लिए भी पहचान पत्र और अन्य कागजों का होना जरूरी है, लेकिन मजदूरों के लिए भी यहां कोई राहत नहीं है। क्योंकि ज्यादातर अन्य राज्यों के मजदूूरों से बात करने पर पता चला कि या तो उनके पास पहचान पत्र नहीं है या फिर उनके पहचान पत्र घर हैं। इस कारण से उनके पास रखे पांच सौ और हजार के नोट बदल नहीं पा रहे हैं। इसके चलते उनका सब्जी और अन्य जरूरत की वस्तुएं खरीदना मुश्किल हो गया है।
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नोट बंद होने का असर सिर्फ क्षेत्र के मजदूरों पर ही नहीं पड़ रहा है। सबसे ज्यादा फैसले की मार अन्य राज्यों से आकर सिडकुल में दिहाड़ी कर रहे मजदूरों पर पड़ा है। शहर के गांधी पार्क के बाहर नोट बंदी के फैसले से पहले मजदूरों की भारी भीड़ देखी जाती थी, लेकिन अब बहुत कम संख्या में ही मजदूर गांधी पार्क के बाहर खड़े नजर आते हैं।
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तीन वर्ष पहले राजस्थान से आए प्रकाश सिडकुल क्षेत्र में दिहाड़ी पर मजदूरी करता है। कम उम्र में ही अपना घर छोड़ मजदूरी के लिए आए प्रकाश से बात करने पर मालूम हुआ कि वह मजदूरी अच्छी मिलने के कारण पिछले तीन सालों में सिर्फ एक बार घर गया था, लेकिन सरकार के नोटबंदी के फैैसले के बाद प्रकाश को मजदूरी मिलना ही बंद हो गई। इस कारण से वह अब वापस घर जाने की तैयारी कर रहा है।
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वहीं बिहार के समस्तीपुर से आए मनोज यादव को भी नोट बंद होने का बहुत मलाल है। मनोज से बात करने पर पता चला कि फैसले से पहले सबकुछ बहुत ठीक चल रहा था। दिहाड़ी अच्छी मिल रही थी तो घर लेने की भी योजना बनाई जा रही थी, लेकिन आठ तारीख के बाद से तो खाने के लाले पड़ गए हैं। गुस्से में जेब से पांच सौ के नोट निकालकर दिखाते हुए मनोज ने बताया कि अब यह नोट उनके लिए कचरे के सामान है।
क्योंकि न तो उनका यहां बैंक अकाउंट हैं और न ही अन्य कागज। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि वापस घर जाने के लिए भी पैसे पूरे नहीं पड़ रहे। मजदूूरों से बात करने पर पता चला कि सुबह सात बजे वह काम की तलाश में गांधी पार्क के बाहर खड़े हो जाते हैं, लेकिन ग्यारह बजे के बाद तक वह काम की उम्मीद में खड़े रहते हैं। इंतजार के बाद काम नहीं मिलने पर उन्हें मायूस होकर खाली हाथ घर लौटना पड़ता है। वहीं ठेकेदार नाजिम ने बताया कि निर्माण कार्यों पर पहले की तुलना में असर पड़ा है।
रुद्रपुर। बैंकों में बड़े नोट बदलने के लिए भी पहचान पत्र और अन्य कागजों का होना जरूरी है, लेकिन मजदूरों के लिए भी यहां कोई राहत नहीं है। क्योंकि ज्यादातर अन्य राज्यों के मजदूूरों से बात करने पर पता चला कि या तो उनके पास पहचान पत्र नहीं है या फिर उनके पहचान पत्र घर हैं। इस कारण से उनके पास रखे पांच सौ और हजार के नोट बदल नहीं पा रहे हैं। इसके चलते उनका सब्जी और अन्य जरूरत की वस्तुएं खरीदना मुश्किल हो गया है।