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अपनों की खातिर गैरों पर भी करनी पड़ी मेहरबानी
अमर उजाला ब्यूरो रुद्रपुर।
Updated Fri, 21 Sep 2018 12:13 AM IST
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नजूल भूमि पर अवैध कब्जे को लेकर पांच वर्ष से निवर्तमान मेयर सोनी कोली और 16 पार्षदों की सदस्यता रद करने करने को चल रही कवायद पर आखिरकार शासन ने फैसला ले लिया। शासन ने सभी 17 नेताओं पर पांच वर्ष के लिए चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी है।
पहले कांग्रेस और फिर भाजपा सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के बाद जनप्रतिनिधियों की कुर्सी बचाने के लिए मामले को जांच के बहाने से लटकाए रखा था। यह हाल तब था जब दो वर्ष पहले कुमाऊं कमिश्नर की जांच में कब्जे के आरोपों की पुष्टि हो गई थी। नेताओं पर चुनाव लड़ने पर लगी रोक से भाजपा के साथ ही कांग्रेस को भी सियासी नुकसान उठाना पड़ सकता है। भाजपा की निवर्तमान मेयर सहित छह तो कांग्रेस के आठ पूर्व पार्षदों पर रोक लगी है।
दरअसल पूर्व सभासद रामबाबू ने वर्ष 2013 में शासन को तत्कालीन मेयर सोनी कोली सहित 17 नेताओं पर चुनाव आयोग में गलत शपथ पत्र देकर चुनाव लड़ने का आरोप लगाते हुए शिकायत की थी। लेकिन सुनवाई नहीं होने पर रामबाबू ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका डाली। इसमें कहा गया था कि निगम एक्ट और शासनादेश के तहत कोई व्यक्ति नजूल भूमि पर काबिज होने की वजह से चुनाव नहीं लड़ सकता है। कोर्ट ने सभी नेताओं को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
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तत्कालीन सरकार की हीलाहवाली से मामला लंबित होता चला गया। वर्ष 2015 में हाईकोर्ट की फटकार के बाद सरकार ने कमिश्नर को जांच सौंपी और अवैध कब्जे की पुष्टि हुई था। हाईकोर्ट ने नवंबर 2016 को याचिका निस्तारित कर सरकार को तीन महीने में कार्यवाही के आदेश दिए थे। इसके बाद सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार ने नौ सदस्यीय कमेटी गठित कर दी थी। तब रामबाबू ने कोर्ट में अवमानना का वाद दायर किया था। अब शासन ने उक्त सभी के चुनाव लड़ने पर पांच साल की रोक लगाई है।
दिलचस्प बात है कि हाईकोर्ट के आदेश और कमिश्नर की जांच में पुष्टि के बाद भी जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल को पूरा होने दिया गया। चूंकि आरोपों की जद में भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेेता थे, इसलिए दोनों ही सरकारों को अपनों के राजनैतिक भविष्य की खातिर गैरों पर भी मेहरबानी करनी पड़ी। शासन के ताजा आदेश से तत्कालीन मेयर और 16 पार्षदों के चुनाव लड़ने के अरमान पर पानी फिर गया है। निकाय चुनाव को लेकर समीकरण भी गड़बड़ाने के पूरे आसार हैं।
- जिस स्कूल में कब्जे को लेकर पांच वर्ष तक चुुनाव लड़ने पर रोक लगाई गई है, वो मेरे पति की व्यक्तिगत नहीं बल्कि सोसायटी की संपत्ति है। यह गलत निर्णय है। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की जाएगी।
सोनी कोली, पूर्व मेयर।
- पहले कांग्रेस और फिर भाजपा ने जानबूझकर पूरे प्रकरण को लटकाया था। जब कार्यकाल पूरा हो गया और शासन के तीन अफसर अवमानना में फंसे तो शासन ने फैसला दिया है। यह मामला उठाने की वजह से उन्हें भाजपा से बाहर कर दिया गया था। अगर समय से कार्यवाही हो जाती तो जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल में बड़े पैमाने पर घपले नहीं हो पाते। समय पर न्याय नहीं मिलने की वजह से लोग अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते हैं।
रामबाबू, पूर्व सभासद और कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाला।
- नजूल भूमि पर सभी मलिन बस्तियां आती हैं। ऐसे में तो मलिन बस्तियों से कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं हो पाएगा। सीएम यह बताएं कि इस स्थिति में निकाय चुनाव कौन लड़ पाएगा। यह तानाशाही निर्णय है। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जाएगी। लड़ाई लड़ेंगे कि कैसे मलिन बस्तियों के लोगों को निगम में प्रतिनिधित्व का मौका मिले।
- ललित मिगलानी, पूर्व पार्षद, कांग्रेस।
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पहले कांग्रेस और फिर भाजपा सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के बाद जनप्रतिनिधियों की कुर्सी बचाने के लिए मामले को जांच के बहाने से लटकाए रखा था। यह हाल तब था जब दो वर्ष पहले कुमाऊं कमिश्नर की जांच में कब्जे के आरोपों की पुष्टि हो गई थी। नेताओं पर चुनाव लड़ने पर लगी रोक से भाजपा के साथ ही कांग्रेस को भी सियासी नुकसान उठाना पड़ सकता है। भाजपा की निवर्तमान मेयर सहित छह तो कांग्रेस के आठ पूर्व पार्षदों पर रोक लगी है।
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दरअसल पूर्व सभासद रामबाबू ने वर्ष 2013 में शासन को तत्कालीन मेयर सोनी कोली सहित 17 नेताओं पर चुनाव आयोग में गलत शपथ पत्र देकर चुनाव लड़ने का आरोप लगाते हुए शिकायत की थी। लेकिन सुनवाई नहीं होने पर रामबाबू ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका डाली। इसमें कहा गया था कि निगम एक्ट और शासनादेश के तहत कोई व्यक्ति नजूल भूमि पर काबिज होने की वजह से चुनाव नहीं लड़ सकता है। कोर्ट ने सभी नेताओं को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
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तत्कालीन सरकार की हीलाहवाली से मामला लंबित होता चला गया। वर्ष 2015 में हाईकोर्ट की फटकार के बाद सरकार ने कमिश्नर को जांच सौंपी और अवैध कब्जे की पुष्टि हुई था। हाईकोर्ट ने नवंबर 2016 को याचिका निस्तारित कर सरकार को तीन महीने में कार्यवाही के आदेश दिए थे। इसके बाद सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार ने नौ सदस्यीय कमेटी गठित कर दी थी। तब रामबाबू ने कोर्ट में अवमानना का वाद दायर किया था। अब शासन ने उक्त सभी के चुनाव लड़ने पर पांच साल की रोक लगाई है।
दिलचस्प बात है कि हाईकोर्ट के आदेश और कमिश्नर की जांच में पुष्टि के बाद भी जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल को पूरा होने दिया गया। चूंकि आरोपों की जद में भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेेता थे, इसलिए दोनों ही सरकारों को अपनों के राजनैतिक भविष्य की खातिर गैरों पर भी मेहरबानी करनी पड़ी। शासन के ताजा आदेश से तत्कालीन मेयर और 16 पार्षदों के चुनाव लड़ने के अरमान पर पानी फिर गया है। निकाय चुनाव को लेकर समीकरण भी गड़बड़ाने के पूरे आसार हैं।
- जिस स्कूल में कब्जे को लेकर पांच वर्ष तक चुुनाव लड़ने पर रोक लगाई गई है, वो मेरे पति की व्यक्तिगत नहीं बल्कि सोसायटी की संपत्ति है। यह गलत निर्णय है। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की जाएगी।
सोनी कोली, पूर्व मेयर।
- पहले कांग्रेस और फिर भाजपा ने जानबूझकर पूरे प्रकरण को लटकाया था। जब कार्यकाल पूरा हो गया और शासन के तीन अफसर अवमानना में फंसे तो शासन ने फैसला दिया है। यह मामला उठाने की वजह से उन्हें भाजपा से बाहर कर दिया गया था। अगर समय से कार्यवाही हो जाती तो जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल में बड़े पैमाने पर घपले नहीं हो पाते। समय पर न्याय नहीं मिलने की वजह से लोग अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते हैं।
रामबाबू, पूर्व सभासद और कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाला।
- नजूल भूमि पर सभी मलिन बस्तियां आती हैं। ऐसे में तो मलिन बस्तियों से कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं हो पाएगा। सीएम यह बताएं कि इस स्थिति में निकाय चुनाव कौन लड़ पाएगा। यह तानाशाही निर्णय है। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जाएगी। लड़ाई लड़ेंगे कि कैसे मलिन बस्तियों के लोगों को निगम में प्रतिनिधित्व का मौका मिले।
- ललित मिगलानी, पूर्व पार्षद, कांग्रेस।