{"_id":"6137c82a8ebc3eb502028c8c","slug":"education-rudrapur-news-hld4371671100","type":"story","status":"publish","title_hn":"मंथन फिल्म ने श्वेत क्रांति से आम जनता को जोड़ा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मंथन फिल्म ने श्वेत क्रांति से आम जनता को जोड़ा
विज्ञापन
रुद्रपुर डिग्री कॉलेज में आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में बोलते प्रोफेसर।
- फोटो : RUDRAPUR
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एसबीएस डिग्री कॉलेज की थिएटर एंड सिनेमा सोसाइटी की ओर से ‘आर्ट ऑफ एडप्टेशन : लिटरेचर, थिएटर एंड सिनेमा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय वेबिनार मंगलवार को संपन्न हो गया। इसमें देशभर के प्रोफेसरों ने वर्चुअल माध्यम से क्षेत्रीय, कला और व्यावसायिक फिल्मों की सार्थकता और समाज पर उनके प्रभाव पर विचार विमर्श किया।
कॉलेज सभागार में दूसरे दिन प्राचार्य डॉ. केके पांडेय ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। हिंदी विभागाध्यक्ष और साहित्यकार डॉ. शंभूदत्त पांडेय शैलेय ने कहा कि कला फिल्मों में मृणाल सेन की खंडहर, बासू चर्टजी की एक रुका हुआ फैसला, गोविंद निहलानी की अर्धसत्य, आक्रोश और द्रोहकाल और श्याम बेनेगल की फिल्म मंथन आदि ने समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ा। वर्ष 1976 में प्रदर्शित मंथन फिल्म ने उस समय श्वेत क्रांति से देशभर के छोटे व मझोले किसानों समेत सभी दुग्ध उत्पादकों को जोड़ा था।
इस फिल्म से आम जनमानस में सहकारिता व सामूहिकता की भावना विकसित हुई। इसके साथ ही व्यावसायिक सिनेमा में ओंकारा, हैदर, मकबूल जैसी कुछ बेहतरीन फिल्में बन रही हैं। वक्ताओं ने कहा कि कला और समानांतर सिनेमा ने हमेशा समाज को नई दिशा दी है, जबकि अधिकांश व्यावसायिक फिल्मों में लोकरंजन की जगह सिर्फ मनोरंजन होता है। वहां पर आयोजक सचिव डॉ. शर्मिला सक्सेना, संयोजक मनोज पांडेय, डॉ. दिशा विश्वकर्मा, ललित बोरा, डॉ. गौरव वार्ष्णेय, डॉ. नरेश कुमार, डॉ. राजेश कुमार, डॉ. नीलोफर अख्तर आदि थे। (संवाद)
विज्ञापन
विज्ञापन
कॉलेज सभागार में दूसरे दिन प्राचार्य डॉ. केके पांडेय ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया। हिंदी विभागाध्यक्ष और साहित्यकार डॉ. शंभूदत्त पांडेय शैलेय ने कहा कि कला फिल्मों में मृणाल सेन की खंडहर, बासू चर्टजी की एक रुका हुआ फैसला, गोविंद निहलानी की अर्धसत्य, आक्रोश और द्रोहकाल और श्याम बेनेगल की फिल्म मंथन आदि ने समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ा। वर्ष 1976 में प्रदर्शित मंथन फिल्म ने उस समय श्वेत क्रांति से देशभर के छोटे व मझोले किसानों समेत सभी दुग्ध उत्पादकों को जोड़ा था।
विज्ञापन
इस फिल्म से आम जनमानस में सहकारिता व सामूहिकता की भावना विकसित हुई। इसके साथ ही व्यावसायिक सिनेमा में ओंकारा, हैदर, मकबूल जैसी कुछ बेहतरीन फिल्में बन रही हैं। वक्ताओं ने कहा कि कला और समानांतर सिनेमा ने हमेशा समाज को नई दिशा दी है, जबकि अधिकांश व्यावसायिक फिल्मों में लोकरंजन की जगह सिर्फ मनोरंजन होता है। वहां पर आयोजक सचिव डॉ. शर्मिला सक्सेना, संयोजक मनोज पांडेय, डॉ. दिशा विश्वकर्मा, ललित बोरा, डॉ. गौरव वार्ष्णेय, डॉ. नरेश कुमार, डॉ. राजेश कुमार, डॉ. नीलोफर अख्तर आदि थे। (संवाद)
विज्ञापन