Udham Singh Nagar News: दीयों की मांग ने बढ़ाई चाक की रफ्तार, लागत ने कम कर दी मुनाफे की चमक
लोग दीपावली पर मिट्टी के दीये जरूर खरीदते हैं। इस साल बीते वर्षों की अपेक्षा दीयों की मांग अधिक होने से कुम्हारों की चाक ने भी रफ्तार पकड़ ली है। हालांकि लागत बढ़ने से कुम्हारों का मुनाफा घट गया।
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मिट्टी का दीया पांच तत्वों का प्रतीक है। इसी के चलते लोग दीपावली पर मिट्टी के दीये जरूर खरीदते हैं। इस साल बीते वर्षों की अपेक्षा दीयों की मांग अधिक होने से कुम्हारों की चाक ने भी रफ्तार पकड़ ली है। हालांकि लागत बढ़ने से कुम्हारों का मुनाफा घट गया।
राष्ट्रीय प्रजापति महासंघ के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश प्रजापति बताते हैं कि सरकार द्वारा ग्राम बैलजुड़ी क्षेत्र में भूमि अलॉट कर रखी है। कुम्हार स्वयं मिट्टी खोदकर लाते थे और दीये, बर्तन आदि बनाकर बेचते थे। समय गुजरने के साथ वहां मिट्टी कम होने पर अब 400 रुपये बुग्गी मिट्टी खरीदी जाती है। इसके अलावा जो उपला पहले एक रुपये में मिलता था वह अब दो रुपये में मिल रहा है। ऐसे में लागत तो बढ़ गई और मुनाफा कम हो गया है।
नैनीताल तक जाते हैं काशीपुर में बने दीये
मानपुर तिराहा के पास निवासी 62 वर्षीय राम सिंह प्रजापति बताते हैं कि मिट्टी के बर्तन बनाना उनका पुश्तैनी काम है। क्षेत्र में लगभग 50 परिवार इस कारोबार से जुड़े हुए हैं। कुम्हारों ने करीब डेढ़ से दो माह पहले दीये बनाना शुरू कर दिया था। बताया कि कुम्हार एक दिन में 250 से 300 दीये तैयार कर लेते हैं। दीपावली में 20 लाख से अधिक दीयों की बिक्री हो जाती है। काशीपुर में बने दीये रामनगर, नैनीताल, गदरपुर और हल्द्वानी तक जाते है। राम कहते हैं कि चीनी निर्मित बिजली की झालर आने पर दीयों की मांग कम हो गई थी। अब लोगों का रूझान फिर मिट्टी के दीयों की ओर बढ़ा है।
गर्मी में बनाते हैं घड़े और कुल्हड़
राम सिंह बताते हैं उन्हें मिट्टी से बर्तन बनाने का शौक था। इसके चलते उन्होंने पढ़ाई तक नहीं की। वह बताते हैं उनके परिवार की आय का मुख्य स्रोत मिट्टी के बर्तन बनाना है। बताया दिवाली पर दीयों व अन्य मिट्टी के सामान बनाने से फुरसत नहीं मिल पाती है। गर्मी के मौसम में छोटे-बड़े घड़े, कुल्हड़ आदि बनाते हैं। सर्दी और बारिश के मौसम में गर्मी के सीजन में बनाए कुल्हड़ों की बिक्री करके आजीविका कमाते हैं।