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2500 लीटर पानी से तैयार होता है एक किलो धान
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पंतनगर में कार्यशाला में मौजूद विज्ञानी।
- फोटो : RUDRAPUR
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जीबी पंत कृषि एवं प्रोद्योगिक विश्वविद्यालय, राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद और उत्तराखंड जल संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में प्रदेश के जल स्रोतो की गुणवत्ता व उनकी सुरक्षा पर प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। पंतनगर विवि के कार्यवाहक अधिष्ठाता सीबीएसएच डॉ. एके गौड़ ने कहा कि गुणवत्ता सुधारकर पेयजल जनित बीमारियों पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है। उन्होने जल गुणवत्ता बेहतर बनाने में पेयजल स्रोतों की सुरक्षा करने की जरूरत बताई।
यूकॉस्ट के महानिदेशक डॉ. राजेंद्र डोभाल के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यशाला में पंत विवि के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. एके शर्मा ने कृषि में जल के न्यूनतम उपयोग पर जोर दिया। उन्होने बताया कि एक किग्रा. धान के उत्पादन में लगभग ढाई हजार लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। इसलिए जल के महत्व को समझतेे हुए भविष्य के लिए जल संरक्षित करने की आवश्यकता है।
समन्वयक डीएवी पीजी कॉलेज के सह प्राध्यापक डॉ. प्रशांत सिंह ने कहाकि प्रदेश की 13 उपखंडीय लैबों की एनएबीएल मान्यता प्रक्रिया भी 31 मार्च तक पूरी हो जाएगी। पर्यावरण विज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. आरके श्रीवास्तव ने कहाकि अपशिष्ट जल के शोधन से जल का संरक्षण व सुरक्षा की जानी बेहद जरूरी है। ताकि लोगों को बेहतर गुणवत्ता का जल पीने व घरेलू कार्यो के लिए उपलब्ध हो सके। प्रो. श्रीवास्तव ने बताया कि वैश्विक स्तर पर वाटर क्वालिटी इंडेक्स में 122 देशों में भारत 120वें स्थान पर है। उन्होंने भविष्य में खराब जल गुणवत्ता व जल संकट से होने वाली समस्याओं की जानकारी दी।
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इस दौरान बायोटेक के वैज्ञानिक डॉ. मणिंद्र मोहन शर्मा, डॉ. विकास कंडारी, मोनिका छिमवाल, डॉ. श्वेता सारस्वत, वरिष्ठ प्रोजेक्ट फेलो अर्चित पांडेय, डॉ. श्वेता सारस्वत, डॉ. जेपीएन राय, डॉ. प्रीति चतुर्वेदी, शिओम, सेवियो निखिल, दीक्षा पांडे, जितेंद्र सिंह आदि थे।
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यूकॉस्ट के महानिदेशक डॉ. राजेंद्र डोभाल के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यशाला में पंत विवि के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. एके शर्मा ने कृषि में जल के न्यूनतम उपयोग पर जोर दिया। उन्होने बताया कि एक किग्रा. धान के उत्पादन में लगभग ढाई हजार लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। इसलिए जल के महत्व को समझतेे हुए भविष्य के लिए जल संरक्षित करने की आवश्यकता है।
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समन्वयक डीएवी पीजी कॉलेज के सह प्राध्यापक डॉ. प्रशांत सिंह ने कहाकि प्रदेश की 13 उपखंडीय लैबों की एनएबीएल मान्यता प्रक्रिया भी 31 मार्च तक पूरी हो जाएगी। पर्यावरण विज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. आरके श्रीवास्तव ने कहाकि अपशिष्ट जल के शोधन से जल का संरक्षण व सुरक्षा की जानी बेहद जरूरी है। ताकि लोगों को बेहतर गुणवत्ता का जल पीने व घरेलू कार्यो के लिए उपलब्ध हो सके। प्रो. श्रीवास्तव ने बताया कि वैश्विक स्तर पर वाटर क्वालिटी इंडेक्स में 122 देशों में भारत 120वें स्थान पर है। उन्होंने भविष्य में खराब जल गुणवत्ता व जल संकट से होने वाली समस्याओं की जानकारी दी।
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इस दौरान बायोटेक के वैज्ञानिक डॉ. मणिंद्र मोहन शर्मा, डॉ. विकास कंडारी, मोनिका छिमवाल, डॉ. श्वेता सारस्वत, वरिष्ठ प्रोजेक्ट फेलो अर्चित पांडेय, डॉ. श्वेता सारस्वत, डॉ. जेपीएन राय, डॉ. प्रीति चतुर्वेदी, शिओम, सेवियो निखिल, दीक्षा पांडे, जितेंद्र सिंह आदि थे।