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नहर के बाद नाले और गड्ढों में भरा जहरीला पानी
अमर उजाला ब्यूरो सितारगंज
Updated Wed, 12 Oct 2016 11:19 PM IST
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सिडकुल में उद्योगों के जहरीले पानी की समस्या नासूर बनती जा रही है। अपर बैगुल नहर के अलावा नाले और गड्ढों में भी जहरीला पानी भरा हुआ है। इससे सिडकुल क्षेत्र व आसपास के गांव प्रभावित हो रहे हैं। जानवरों की मौत के साथ ही पक्षियों को भी खतरा बना हुआ है। फसल और पौधों को भारी क्षति हो रही है। इससे ग्रामीणों में सिडकुल व प्रशासन के खिलाफ आक्रोश है।
सिडकुल में पिछले दो सालों से फैक्ट्रियों का केमिकल युक्त जहरीला पानी कैलाश नदी और अपर बैगुल नहर में प्रवाहित हो रहा है। गत वर्ष सितंबर में बैगुल नहर के जहरीली होने से बरुआबाग, सिसौना, कल्याणपुर व बमनपुरी आदि गांव के लोग संक्रामक रोगों की जद में आए थे। उद्योगपतियों की कई दौर की वार्ता के बाद सभी फैक्ट्रियों ने कंपनी के ईटीपी (इंफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) से पानी ट्रीट कर सीईटीपी को देने पर सहमति जताई थी। इसके बाद दिसंबर में जिंदल कंपनी द्वारा ट्रीटमेंट प्लांट चालू किया गया। सीईटीपी के अधिकारियों के मुताबिक वर्तमान में ये कंपनियां चार एमएलडी पानी देने के बजाय 2.3 एमएलडी पानी दे रही हैं। ईटीपी द्वारा जहरीले पानी को पूरी तरह से ट्रीट न कर आसपास खाली मैदान में छोड़ा जाता है। इससे वातावरण दूषित हो रहा है।
इसके अलावा कई अन्य कंपनियां कैलाश नदी और नालों में पाइप लाइन डालकर गंदा पानी छोड़ रही हैं। नाले का पानी पुलिया से होकर सिडकुल फेज टू के खाली प्लाट में जमा हो रहा है। यहां से ये पानी अपर बैगुल नहर में समाहित हो जाता है। इससे नहर दूषित हो गई है और फेज टू में चरने आने वाले मवेशी इस पानी को पीकर बीमार हो जाते हैं या फिर उनकी मौत हो जाती है। प्रशासन द्वारा नाले में पड़े गंदे पानी के पाइपों की रोकथाम न करने से आसपास के ग्रामीणों में रोष है।
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सिडकुल के नाले से बह रहे जहरीले पानी का सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने निरीक्षण किया और गंदे पानी के सैंपल लिए। इसकी पंतनगर विवि और रुद्रपुर जलसंस्थान में जांच कराई जाएगी। सिंचाई ईई ने कई बार पीसीबी को पत्र लिखा। लेकिन, पीसीबी ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की।
बुधवार को सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता संजय राज के निर्देश पर सहायक अभियंता विजय पाल ने सिडकुल पहुंचकर नाले का निरीक्षण किया। ईई राज ने बताया कि सिडकुल के उद्योगों से निकलने वाला पानी अपर बैगुल नहर में समाहित किया जाता है। इससे नहर दूषित हो रही है। बताया कि नाले से आ रहे गंदे पानी का सैंपल लिया है। इसकी जांच रुद्रपुर जलसंस्थान की लैब और पंतनगर विश्वविद्यालय से कराएंगे। उन्होंने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जहरीला पानी नहर में आने से रुकवाने और मामले में कार्रवाई के लिए कई बार पत्र लिखे। लेकिन, पीसीबी के अधिकारियों ने अभी तक कोई कार्रवाई की नहीं की। ब्यूरो
पूर्वी उकरौली निवासी राम प्रवेश ने कहा कि वे फैक्ट्रियों का विरोध नहीं कर रहे हैं। सिर्फ जहरीला पानी बंद होना चाहिए। इससे गांव के जानवर मरने के साथ ही लोग बीमार पड़ रहे हैं।
अनिल कुमार ने कहा कि हमारे तीन मवेशी चरने आए थे। उन्होंने जहरीला पानी पी लिया। इससे वह बीमार हो गए। इसमें एक की मौत हो गई। इसके अलावा पिछले दिनों साधूनगर में भी चार मवेशी मरे हैं। जहरीले पानी की समस्या का स्थायी समाधान किया जाना चाहिए।
आरती देवी ने कहा कि फैक्ट्रियों के जहरीले पानी से पूर्वी उकरौली गांव में संक्रामक रोग फैल रहे हैं। गांव के छट्टू प्रसाद को टीबी, कमलावती और विकास व अन्य कई बच्चों को पीलिया रोग हो गया। इसके अलावा दाद, खाज, खुजली होना तो आम बात हो गई है। जहरीले पानी की समस्या से तत्काल मुक्ति दिलाई जाए।
रामकुमार ने कहा कि उद्योगों से निकलने वाले जहरीले पानी के कारण उपजाऊ जमीन बर्बाद हो रही है। गांव के नलों का पानी भी दूषित हो चुका है। सरकारी हैंडपंप खराब हैं। ऐसे में गांव के लोग नलों का गंदा पानी पीने को विवश हैं या फिर पानी खरीदना पड़ता है।
सिडकुल में पिछले दो सालों से फैक्ट्रियों का केमिकल युक्त जहरीला पानी कैलाश नदी और अपर बैगुल नहर में प्रवाहित हो रहा है। गत वर्ष सितंबर में बैगुल नहर के जहरीली होने से बरुआबाग, सिसौना, कल्याणपुर व बमनपुरी आदि गांव के लोग संक्रामक रोगों की जद में आए थे। उद्योगपतियों की कई दौर की वार्ता के बाद सभी फैक्ट्रियों ने कंपनी के ईटीपी (इंफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) से पानी ट्रीट कर सीईटीपी को देने पर सहमति जताई थी। इसके बाद दिसंबर में जिंदल कंपनी द्वारा ट्रीटमेंट प्लांट चालू किया गया। सीईटीपी के अधिकारियों के मुताबिक वर्तमान में ये कंपनियां चार एमएलडी पानी देने के बजाय 2.3 एमएलडी पानी दे रही हैं। ईटीपी द्वारा जहरीले पानी को पूरी तरह से ट्रीट न कर आसपास खाली मैदान में छोड़ा जाता है। इससे वातावरण दूषित हो रहा है।
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इसके अलावा कई अन्य कंपनियां कैलाश नदी और नालों में पाइप लाइन डालकर गंदा पानी छोड़ रही हैं। नाले का पानी पुलिया से होकर सिडकुल फेज टू के खाली प्लाट में जमा हो रहा है। यहां से ये पानी अपर बैगुल नहर में समाहित हो जाता है। इससे नहर दूषित हो गई है और फेज टू में चरने आने वाले मवेशी इस पानी को पीकर बीमार हो जाते हैं या फिर उनकी मौत हो जाती है। प्रशासन द्वारा नाले में पड़े गंदे पानी के पाइपों की रोकथाम न करने से आसपास के ग्रामीणों में रोष है।
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सिडकुल के नाले से बह रहे जहरीले पानी का सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने निरीक्षण किया और गंदे पानी के सैंपल लिए। इसकी पंतनगर विवि और रुद्रपुर जलसंस्थान में जांच कराई जाएगी। सिंचाई ईई ने कई बार पीसीबी को पत्र लिखा। लेकिन, पीसीबी ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की।
बुधवार को सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता संजय राज के निर्देश पर सहायक अभियंता विजय पाल ने सिडकुल पहुंचकर नाले का निरीक्षण किया। ईई राज ने बताया कि सिडकुल के उद्योगों से निकलने वाला पानी अपर बैगुल नहर में समाहित किया जाता है। इससे नहर दूषित हो रही है। बताया कि नाले से आ रहे गंदे पानी का सैंपल लिया है। इसकी जांच रुद्रपुर जलसंस्थान की लैब और पंतनगर विश्वविद्यालय से कराएंगे। उन्होंने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जहरीला पानी नहर में आने से रुकवाने और मामले में कार्रवाई के लिए कई बार पत्र लिखे। लेकिन, पीसीबी के अधिकारियों ने अभी तक कोई कार्रवाई की नहीं की। ब्यूरो
पूर्वी उकरौली निवासी राम प्रवेश ने कहा कि वे फैक्ट्रियों का विरोध नहीं कर रहे हैं। सिर्फ जहरीला पानी बंद होना चाहिए। इससे गांव के जानवर मरने के साथ ही लोग बीमार पड़ रहे हैं।
अनिल कुमार ने कहा कि हमारे तीन मवेशी चरने आए थे। उन्होंने जहरीला पानी पी लिया। इससे वह बीमार हो गए। इसमें एक की मौत हो गई। इसके अलावा पिछले दिनों साधूनगर में भी चार मवेशी मरे हैं। जहरीले पानी की समस्या का स्थायी समाधान किया जाना चाहिए।
आरती देवी ने कहा कि फैक्ट्रियों के जहरीले पानी से पूर्वी उकरौली गांव में संक्रामक रोग फैल रहे हैं। गांव के छट्टू प्रसाद को टीबी, कमलावती और विकास व अन्य कई बच्चों को पीलिया रोग हो गया। इसके अलावा दाद, खाज, खुजली होना तो आम बात हो गई है। जहरीले पानी की समस्या से तत्काल मुक्ति दिलाई जाए।
रामकुमार ने कहा कि उद्योगों से निकलने वाले जहरीले पानी के कारण उपजाऊ जमीन बर्बाद हो रही है। गांव के नलों का पानी भी दूषित हो चुका है। सरकारी हैंडपंप खराब हैं। ऐसे में गांव के लोग नलों का गंदा पानी पीने को विवश हैं या फिर पानी खरीदना पड़ता है।