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वे तीन लोग, जिन्होंने सबसे पहले देखी केदारनाथ की तबाही
संदीप थपलियाल
Updated Thu, 04 Jul 2013 12:18 AM IST
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अगर कैप्टन भूपेंद्र, बृजमोहन बिष्ट और योगेंद्र राणा न होते तो केदारनाथ-गौरीकुंड में आई जलप्रलय का पता देर से मिलता और राहत-बचाव काम में और भी देरी होती।
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बृजमोहन और योगेंद्र पहले सिविलियन हैं जिन्होंने विंचिग डाउन (चॉपर से रस्सी के सहारे उतरना) कर खतरे में पड़े लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। इन जांबाजों ने घाटी में बेहद मुश्किल जगहों पर अपना हेलीकॉप्टर उतारा।
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केदारनाथ के लिए पैदल प्रस्थान बिंदु गौरीकुंड में खच्चर और कंडी वालों की हड़ताल के चलते 14 जून से केदारनाथ के लिए हेलीकॉप्टर सेवाएं बंद हो गई थीं। इस बीच मौसम भी खराब हो गया। 16-17 जून को केदारनाथ में लगातार जबरदस्त बारिश और ऊपर झील फटने से बाढ़ आ गई और सब कुछ तबाह हो गया।
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गौरीकुंड से ऊपर सड़क और संचार कनेक्टिविटी खत्म होने से किसी को भी यह अहसास नहीं हो पाया कि केदारनाथ में इतना व्यापक विनाश हुआ है। रुद्रप्रयाग और देहरादून में बैठे-बैठे सरकारी नुमाइंदे भी बस कयास लगा रहे थे।
पायलट कैप्टन भूपेंद्र, योगेंद्र और बृजमोहन को अंदेशा हुआ कि सब कुछ ठीक नहीं है। 17 जून की शाम लगभग साढ़े पांच बजे बारिश थमने पर तीनों ने चॉपर से केदारनाथ के लिए उड़ान भरी। यहां का दृश्य देखकर उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
यात्रा मार्ग के प्रमुख पड़ाव जंगलचट्टी और रामबाड़ा का नामोनिशान मिट चुका था। रामबाड़ा से आगे घना कोहरा होने के कारण चॉपर केदारनाथ नहीं जा पाया, लेकिन उन्होंने अनुमान लगा लिया कि केदारनाथ में क्या हुआ होगा।
उन्होंने तत्काल इसकी जानकारी जिला और शासन के प्रमुख अफसरों को दी। तब सरकारी मशीनरी हरकत में आई। अगले दिन 18 जून को सेना ने बचाव अभियान शुरू कर दिया।
चॉपर उड़ा रहे कैप्टन भूपेंद्र ने अपने गहन लैंडिंग अनुभव से पानी के टैंक और संकरी जगह चॉपर उतारा तो योगेंद्र और बृजमोहन बिष्ट का नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (एनआईएम) की एडवांस मॉउनटेनिरिंग प्रशिक्षण काम आया। 18 जून को दोनों लोग रामबाड़ा में एयरफोर्स के चॉपर से रस्सों के सहारे नीचे उतरे।
यहां उन्होंने भीड़ को बड़ी मुश्किल से मनाते हुए चॉपर के उतरने लायक स्थान बनाया। हालांकि यहां सिविल एविएशन के चॉपर ही उतर पाए। योगेंद्र ने रामबाड़ा में चार दिन से चट्टान में फंसे पुरुषोत्तम और सुरेखा को विचिंग कर निकाला। तीनों ने दिन में लगातार नौ-नौ घंटे रेस्क्यू किया।
नदारद था रामबाड़ा
समझ में नहीं आ रहा था कि रामबाड़ा कहां गया। सिर्फ बड़े-बड़े पत्थर और नदी दिखाई दे रही थी। इसीलिए मुझे अंदेशा हो गया था कि बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई है। -कैप्टन भूपेंद्र पायलट
लोग बेकाबू हो गए
जब मैं और बृजमोहन रस्सों के सहारे रामबाड़ा में उतरे, तो लोग बेकाबू हो गए। लोगों ने जो देखा उससे वे बदहवास थे। जब उन्हें समझाया गया कि यदि वह शांत रहेंगे, तो सबको निकाल लेंगे। तब लोग माने। -योगेंद्र राणा
पेड़ों पर थे लोग
रास्ते में लोग मदद के लिए हाथ हिलाते हुए दिखाई दे रहे थे। कई लोग चट्टानों और पेड़ों पर थे। बड़ा खौफनाक मंजर था। हमारी कोशिश थी कि जल्द से जल्द लोगों तक मदद पहुंचे। -बृजमोहन बिष्ट
कैप्टन भूपेंद्र की टीम ने बेहतर कार्य किया। पायलट ने ऐसे स्थान पर चॉपर उतार कर लोगों की जान बचाई, जहां किसी सामान्य पायलट के लिए मुश्किल है। -बरिंदर जीत ङ्क्षसह, एसपी रुद्रप्रयाग