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जब पहले ही था तबाही का अंदेशा तो ध्यान क्यों नहीं दिया?

Tue, 02 Jul 2013 11:07 AM IST
प्रवेश कुमारी
प्रवेश कुमारी Updated Tue, 02 Jul 2013 11:07 AM IST
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they already had the fear of destruction

केदारघाटी में हुई तबाही पर अपनी ढपली, अपना राग वाली स्थिति है। जितने वैज्ञानिक संस्थान हैं, उतने ही विश्लेषण हैं और इन विश्लेषणों को पुख्ता करने के वैज्ञानिक तर्क भी।

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इनमें से कुछ तो बाकायदा सेटेलाइट चित्रों, वैज्ञानिक रिपोर्ट्स का हवाला दे पहले ही तबाही के बाबत अंदेशे का जिक्र करने में लगे हैं।

आपदा प्रबंधन विभाग क्यों सोया रहा
मौसम विभाग भी मानसून जल्द आने की बात कह भारी भू-स्खलन, बारिश की चेतावनी देने, पहाड़ की यात्रा रद्द करने की सलाह देने की बात कह रहा है, लेकिन सवाल यह कि दूसरे महकमों के साथ-साथ आपदा प्रबंधन विभाग क्यों सोया रहा?
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अगर तबाही का अंदेशा पहले ही था, तो संस्थानों ने इस बाबत पहले ही क्यों नहीं चेताया? क्या संस्थानों में आपसी समन्वय की कमी थी? अगर ऐसा नहीं तो फिर क्या आपदा का इंतजार किया गया? हजारों की जिंदगी तबाह हो गई, इस सवाल का जवाब आखिर कौन देगा।
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हद तो यह है कि समन्वय पर अब भी कोई बात नहीं की जा रही। सारे संस्थान पर कारणों पर गाल बजाकर संतुष्ट हैं।

अलग-अलग संस्थानों के अलग-अलग विश्लेषण-
इंडियन इंस्टीट्यूट आफ रिमोट सेंसिंग
-न कोई बादल फटा, न गांधी सरोवर टूटा। उत्तर-पूर्व में पड़ने वाले कंपेनियन ग्लेशियर की ऊपरी परत पिघलने से इतना पानी फूटा कि गांधी सरोवर को तोड़ते हुए केदारनाथ की ओर बढ़ा, जो तबाही का कारण बना।

वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान
-अत्यधिक वर्षा से गांधी सरोवर की झील छलकी, जो अंतत: इस तबाही की वजह बनी। पानी के साथ आए मलबे से नुकसान अधिक हुआ।

उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र
चोराबाड़ी और कंपेनियन ग्लेशियर में किसी तरह का बदलाव नहीं हुआ है। तेज बारिश की वजह से यह आपदा आई है। सैटेलाइट इमेज में साफ है तबाही का यह मलबा ऊपर से केवल एक ही स्ट्रीम में चला था जो कि बाद में दो नई धाराओं में बंट गया।

नासा
चोराबाड़ी और कंपेनियन ग्लेशियर से अधिक जलस्राव की आशंका थी। नासा ने 25 दिन पहले जारी किए थे चित्र। कच्ची बर्फ पानी बनकर रिसने लगी थी। मानसून जल्द आ जाने से अत्यधिक मात्रा में हुई वर्षा तबाही का कारण बन गई।

एक रिसर्चर का काम रिसर्च करना और रिपोर्ट को जर्नल्स में छपवाना होता है, ताकि विज्ञान बिरादरी उसका फायदा उठा सके। जनहित से जुड़ी सूचना को निश्चित रूप से आम आदमी तक पहुंचना चाहिए, लेकिन यह अन्य विभागों का काम है।
-डा. डीपी डोभाल, ग्लेशियर विशेषज्ञ

उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यू-सैक) स्टेट लेवल एजेंसी है। जो भी संस्थान हमारी मदद चाहें वह कहे। हम लाइन डिपार्टमेंट्स से समन्वय बिठा कर मददगार हो सकते हैं। कई बार समन्वय का सुझाव दे चुके हैं पर अमल नहीं हुआ।
-डा. एमएम किमोठी, निदेशक उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र

वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थानकई विषयों पर शोध करता है। सुझाव देता है। वह अपनी रिपोर्ट विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) को सौंपता है। वहीं से जो निर्देश होता है, उसे माना जाता है। इसमें अन्य संस्थान शामिल नहीं।

-प्रो. अनिल कुमार गुप्ता, निदेशक वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान।

यहां मौसम विभाग की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया। वहीं आंध्र प्रदेश वाले हैं, जिन्होंने ऐसा सिस्टम विकसित किया है कि चेतावनी मिलते ही काम शुरू हो जाता है। आपदा प्रबंधन वहां के विभाग से सीखने की जरूरत है।
-आनंद शर्मा, निदेशक, मौसम विभाग

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