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उत्तराखंडः रास्तों पर रफ्तार सुस्त
गढ़वाल/अमर उजाला नेटवर्क
Updated Sun, 14 Jul 2013 12:58 PM IST
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आपदाग्रस्त क्षेत्रों को राहत की राह बड़ी कठिन दिख रही है। भारी बारिश और सैलाब से लाइफ लाइन कहे जाने वाले रास्ते बह गए हैं और गांव के गांव अलग-थलग पड़े हैं। संपर्क मार्गों के भी निशान नहीं बचे।
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रास्ते बनाने का काम अपेक्षा और जरूरत के मुताबिक नहीं चल रहा है। जहां बारिश का व्यवधान नहीं है, वहां भी काम ढीला चल रहा है।
दुर्गम इलाकों के रास्ते कटे तो प्रशासन की टीमें भी वहां तक राहत पहुंचाने से कट रही हैं। सीधा संदेश है कि गांववालों की गर्ज हो तो मीलों चलकर टीमों के सुगम ठिकानों तक राहत सामग्री लेने आएं।
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उत्तराखंड के नवनिर्माण के नारों के बीच पेश हैं चंद ऐसी ताजा खबरें जिनसे आप बाकी आपदाग्रस्त इलाकों की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं।
बीआरओ का पुतला फूंका
संपर्क मार्ग और सड़के बनाने का काम इतना सुस्त है कि पीड़ितों का गुस्सा फूटने लगा है। नाराजगी शासन-प्रशासन से है तो निर्माणकारी बीआरओ और पीडब्ल्यूडी जैसे एजेंसियों से भी।
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उत्तरकाशी में गंगोत्री राजमार्ग पर यातायात बहाल न होने से नाराज लोगों ने शनिवार को बीआरओ का पुतला फूंककर जाम लगाया। बीते साल अगस्त की बाढ़ के बाद से राजमार्ग बदहाल पड़ा है।
हाल की बाढ़ में राजमार्ग के कई और हिस्से तबाह हो गए। इससे भटवाड़ी प्रखंड के दर्जनों गांव अलग-थलग पड़े हैं। क्षेत्र में खाद्यान्न आदि जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति ठप हो गई है।
रास्ता बंद, महीना बाद आई राहत
आपदा से अलग-थलग पड़े उत्तरकाशी जनपद में भटवाड़ी विकासखंड के दूरस्थ गांव पिलंग में पहली बार राहत आई, वो भी रास्ते से नहीं, हेलीकाप्टर से।
भटवाड़ी से 18 किलोमीटर पैदल चलकर ही इस गांव तक पहुंचा जा सकता है। पैदल जाकर राहत पहुंचाने की जहमत किसी सरकारी नुमाइंदे ने नहीं उठाई। यहां भुखमरी का संकट खड़ा हो गया था।
संपर्क मार्ग ध्वस्त, ग्रामीण परेशान
आपदा से पिंडर घाटी के तीन ब्लाकों के 312 से अधिक गांवों को जोड़ने वाली सड़कें व संपर्क मार्ग टूटने से लोग नमक तेल के लिए 15-30 किमी जान जोखिम में डालकर सफर कर रहे हैं। लोगों के पास राशन नहीं है, जिससे लोगों के सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है।
पालकी में ढो रहे हैं बीमार
पौड़ी जनपद के राठ क्षेत्र में बरसात से अतिवृष्टि हुए बीस दिन बीत गए हैं। इस क्षेत्र में अतिवृष्टि की चपेट में आने से बंद हुई पैठाणी-चुठाणी, पैठाणी मलुंड समेत कई सड़कें अभी खुल पाई है।
उन्हें घर से ब्लाक मुख्यालय तक पहुंचने के लिए कई पांच किलोमीटर पैदल चलना पड़ रहा है। बीमार को घर से सड़क तक पालकी में लाना पड़ रहा है।
03 की जगह 15 किमीचल रहे हैं ग्रामीण
आपदा ने कालीमठ का संपर्क पूरी तरह से काट दिया है। मंदाकिनी, सरस्वती (काली नदी), मधु गंगा, खाम और मनणी नदी के पुल बह चुके हैं।
मोटर मार्ग से गुप्तकाशी-कालीमठ की दूरी मात्र 10 किमी है। मस्ता से कालीमठ की दूरी मात्र तीन किमी है, लेकिन ग्रामीण 15 किमी चल रहे हैं।
45 किमी रपटीली पहाड़ियों पर चले चार बच्चे
गुप्तकाशी में 45 किमी पैदल चल स्कूल को पंहुचे बच्चों के हौसले को हर कोई नमन कर रहा है। मंजिल तक पहुंचने के लिए चार छोटे-छोटे बच्चे बरसाती गदेरे पार करते, एक-दूसरे का हाथ थामे रपटीली खतरनाक पहाड़ियों को लांघते, कंधों पर बस्तों का बोझ लादे केदारघाटी के दूरस्थ गांव चौमासी से पैदल 45 किलोमीटर चलकर गुप्तकाशी पहुंचे।
हाल बीआरओ के मशीन में तेल नहीं
गुप्तकाशी में क्षतिग्रस्त हुए रास्ते खोलने में बीआरओ मजदूरों की कमी और डीजल न होने का रोना रो रहा है। रुद्रप्रयाग-केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग गुप्तकाशी के बाद से अभी तक चलने लायक नहीं बन पाया है।
बडासू में बीआरओ की सड़क बनाने वाली मशीन डीजल न होने से कई दिन से बंद पड़ी है। गौरीकुंड-रामबाड़ा-केदारनाथ पैदल मार्ग पर शुक्रवार तक बहाल करने का पीडब्ल्यूडी का दावा भी हवाई ही साबित हुआ।
पीडब्ल्यूडी को देंगे काम
सड़क बनाने में बीआरओ की सुस्त गति को देखते हुए सड़क मार्गों के रखरखाव का काम पीडब्ल्यूडी को देने की तैयारी की जा रही है।
आपदा ग्रस्त क्षेत्रों में क्षतिग्रस्त सड़क व पुलों के धीमी रफ्तार से निर्माण को लेकर रोड ट्रांसपोर्ट एवं हाईवे मंत्रालय नई संभावनाएं तलाश रहा है।
मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्गों के हस्तांतरण का प्रस्ताव राज्य को भेजा है, जिसके तहत राज्य को धनराशि भी मुहैया करवाई जाएगी।
गांव ने खुद ही बना लिया मार्ग, पुलिया
टिहरी के थौलधार के सुनाली, सेरा और जुकाड़ी गांव के लोगों ने प्रशासन का रास्ता देखने के बजाय खुद ही अपने गांव का मार्ग और पुलिया बना डाली।
प्राथमिक विद्यालय का 300 मीटर रास्ता और गदेरे पर बनी पुलिया आपदा में बह गई थी। सरकार से गुहार लगाने के बजाए स्वयं ही श्रमदान कर स्कूल तक 300 मीटर रास्ता और लकड़ियों का पुल एक हफ्ते में तैयार कर लिया।