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आज संक्रांति से शुरू हो जाएगा भगवान शिव का महीना सावन
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महादेव का प्रिय सावन का महीना आज (शुक्रवार) संक्रांति से शुरू हो गया है। इस बार सावन में चार सोमवार आएंगे। छह अगस्त को प्रदोष व्रत रहेगा। वहीं 13 अगस्त नाग पंचमी आएगी। धार्मिक मान्यता है कि सावन के पावन महीने में भगवान शिव की पूजन-अर्चना से भोले बाबा की कृपा बरसती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सावन भगवान शंकर का महीना माना जाता है। शिव का अर्थ कल्याण है। कहा जाता है कि कण-कण में भगवान शिव का वास है। सावन का महीना 16 जुलाई शुक्रवार से शुरू हो रहा है। सावन में सोमवार को भगवान शिव की पूजा फलदायी मानी जाती है। इस बार सावन में कुल चार सोमवार आएंगे। छह अगस्त को प्रदोष व्रत पड़ रहा है। 13 अगस्त को आ रही नाग पंचमी का फल भी शुभदायक है। विद्वत सभा के पूर्व अध्यक्ष पं. उदय शंकर भट्ट ने बताया कि सावन में भगवान शिव का अभिषेक करना अत्यंत फलकारी होता है।
भगवान नटराज के डमरू से निकला व्याकरण शास्त्र
भगवान शिव ने नृत्य करके डमरू बजाया। डमरू के बोल से 14 सूत्र निकले। महर्षि पाणिनी ने भगवान शिव की कृपा से इन्हीं डमरू के बोलों (सूत्रों) से व्याकरण शास्त्र की रचना की। इस प्रकार चौदह सूत्रों से वर्णमाला प्रकट हुई। डमरू को चौदह बार बजाने से 14 सूत्रों के रूप में निकली ध्वनियों से ही व्याकरण का प्राकट्य हुआ। इसलिए व्याकरण सूत्रों के आदि प्रवर्तक भगवान नटराज को कहा जाता है। शिव के सिर पर स्थित चंद्रमा अमृत का द्योतक है। गले में लिपटा सर्प काल का प्रतीक है। इस सर्प अर्थात काल को वश में करने से ही शिव मृत्युंजय कहलाए। उनके हाथों में स्थित त्रिशूल तीन प्रकार के कष्टों दैहिक, दैविक और भौतिक के विनाश का सूचक है। उनके वाहन नंदी धर्म का प्रतीक है। हाथों में डमरू ब्रह्म निनाद का सूचक है।
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सावन भगवान शंकर का महीना माना जाता है। शिव का अर्थ कल्याण है। कहा जाता है कि कण-कण में भगवान शिव का वास है। सावन का महीना 16 जुलाई शुक्रवार से शुरू हो रहा है। सावन में सोमवार को भगवान शिव की पूजा फलदायी मानी जाती है। इस बार सावन में कुल चार सोमवार आएंगे। छह अगस्त को प्रदोष व्रत पड़ रहा है। 13 अगस्त को आ रही नाग पंचमी का फल भी शुभदायक है। विद्वत सभा के पूर्व अध्यक्ष पं. उदय शंकर भट्ट ने बताया कि सावन में भगवान शिव का अभिषेक करना अत्यंत फलकारी होता है।
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भगवान नटराज के डमरू से निकला व्याकरण शास्त्र
भगवान शिव ने नृत्य करके डमरू बजाया। डमरू के बोल से 14 सूत्र निकले। महर्षि पाणिनी ने भगवान शिव की कृपा से इन्हीं डमरू के बोलों (सूत्रों) से व्याकरण शास्त्र की रचना की। इस प्रकार चौदह सूत्रों से वर्णमाला प्रकट हुई। डमरू को चौदह बार बजाने से 14 सूत्रों के रूप में निकली ध्वनियों से ही व्याकरण का प्राकट्य हुआ। इसलिए व्याकरण सूत्रों के आदि प्रवर्तक भगवान नटराज को कहा जाता है। शिव के सिर पर स्थित चंद्रमा अमृत का द्योतक है। गले में लिपटा सर्प काल का प्रतीक है। इस सर्प अर्थात काल को वश में करने से ही शिव मृत्युंजय कहलाए। उनके हाथों में स्थित त्रिशूल तीन प्रकार के कष्टों दैहिक, दैविक और भौतिक के विनाश का सूचक है। उनके वाहन नंदी धर्म का प्रतीक है। हाथों में डमरू ब्रह्म निनाद का सूचक है।
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