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Tehri News: जौनपुर में मंगशीर बग्वाल की तैयारी शुरू
Wed, 27 Nov 2024 07:31 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, टिहरी
संवाद न्यूज एजेंसी, टिहरी
Updated Wed, 27 Nov 2024 07:31 PM IST
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थत्यूड़ (टिहरी)। जौनुपर ब्लाॅक में दिवाली के एक माह बाद मनाई जाने वाली बग्वाल की तैयारियां जोरों पर है। बग्वाल के तीसरे दिन मनाए जाने वाले भद्राज के लिए इन दिनों घास की रस्सी (व्रत) बनाने में जुटे हुए हैं। क्षेत्र में तीन दिवसीय बग्वाल 29 नवंबर से मनाई जाएगी।
टिहरी जिले के भिलंगना और उत्तरकाशी के रवांई घाटी की तरह ही जौनपुर ब्लाॅक में भी मंगशीर की बग्वाल बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। ग्रामीण तीन दिन मनाई जाने वाली बग्वाल की तैयारी में जुटे हैं। तीन दिवसीय बग्वाल का पर्व 29 नवंबर से शुरू होगा। पहली और दूसरी बग्वाल पर ग्रामीण अपने गांव और घर के आसपास जमकर भैलो खेलते हैं और एक-दूसरे को पकोड़े, चूड़ा, भैलो भेंट करते हैं।
तीसरे दिन भद्राज मेला मनाया जाता है, जिसमें कई गांव के लोग एक जगह एकत्रित होकर घास से बनाई गई मोटी रस्सी जिसे स्थानीय भाषा में व्रत कहा जाता है। अक्षत और फूल से रस्सी की पूजा-अर्चना करने के बाद रस्सी को एक बड़े मैदान में लाया जाता है। उसके बाद रस्साकशी की तरह ही दो टीमें रस्सी को अपनी तरह खींचते हैं।
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रस्सी टूटने पर स्थानीय लोग रस्सी के घास को काटकर प्रसाद के रूप में अपने घर ले जाते हैं। महिपाल सिंह रावत ने बताया कि यहां भी तिब्बत युद्ध की जीत पर ही यह बग्वाल मनाई जाती है। क्षेत्र के कृपाल सिंह रावत, विजेंद्र सजवाण, रमेश प्रसाद नौटियाल, प्रेम सिंह राणा और विजय सिंह गुसाईं ने बताया कि वे इन दिनों भैला और व्रत बनाने में जुटे हुए हैं।
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टिहरी जिले के भिलंगना और उत्तरकाशी के रवांई घाटी की तरह ही जौनपुर ब्लाॅक में भी मंगशीर की बग्वाल बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। ग्रामीण तीन दिन मनाई जाने वाली बग्वाल की तैयारी में जुटे हैं। तीन दिवसीय बग्वाल का पर्व 29 नवंबर से शुरू होगा। पहली और दूसरी बग्वाल पर ग्रामीण अपने गांव और घर के आसपास जमकर भैलो खेलते हैं और एक-दूसरे को पकोड़े, चूड़ा, भैलो भेंट करते हैं।
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तीसरे दिन भद्राज मेला मनाया जाता है, जिसमें कई गांव के लोग एक जगह एकत्रित होकर घास से बनाई गई मोटी रस्सी जिसे स्थानीय भाषा में व्रत कहा जाता है। अक्षत और फूल से रस्सी की पूजा-अर्चना करने के बाद रस्सी को एक बड़े मैदान में लाया जाता है। उसके बाद रस्साकशी की तरह ही दो टीमें रस्सी को अपनी तरह खींचते हैं।
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रस्सी टूटने पर स्थानीय लोग रस्सी के घास को काटकर प्रसाद के रूप में अपने घर ले जाते हैं। महिपाल सिंह रावत ने बताया कि यहां भी तिब्बत युद्ध की जीत पर ही यह बग्वाल मनाई जाती है। क्षेत्र के कृपाल सिंह रावत, विजेंद्र सजवाण, रमेश प्रसाद नौटियाल, प्रेम सिंह राणा और विजय सिंह गुसाईं ने बताया कि वे इन दिनों भैला और व्रत बनाने में जुटे हुए हैं।