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अस्तित्व के लिए जूझ रही रामतीर्थ तपस्थली
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चंबा(टिहरी)। महापुरुष इस संसार में आते हैं और संसार के लिए अपना अमूल्य योगदान देकर लौट जाते हैं, लेकिन उनके जीवन से जुड़ी चीजें धरोहर बनकर हमें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। बावजूद ब्रह्मपुरी में स्थित स्वामी रामतीर्थ की एतिहासिक तपस्थली संरक्षण के अभाव में अस्तित्व खोने के कगार पर है।
विश्वभर में आध्यात्मिक ज्ञान को प्रचारित करने वाले स्वामी रामतीर्थ ने टिहरी में रहकर तप किया, आत्मानुति प्राप्त की और अंत में अपने शरीर को मां गंगा की गोद में समर्पित कर दिया। हिमालय यात्रा के दौरान स्वामी रामतीर्थ ने नरेंद्रनगर के ब्रह्मपुरी में एक गुफा को अपनी तपस्थली बनाया। वर्ष 1898 भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को इसी गुफा में साधना के उच्चतम सौपान में पहुंचने पर स्वामी रामतीर्थ को आत्म साक्षात्कार हुआ। योग के गहन जानकारों की मानें तो ऐसे स्थानों पर साधकों को योग के दौरान ध्यान केंद्रित करने में काफी मदद मिलती है। इसके पीछे पूर्व में की गई तपस्या के फलस्वरूप उस क्षेत्र में बढ़ी हुई चैतन्यता का स्तर माना जाता है। योगाचार्य भास्कर जोशी का कहना है कि हर स्थान की चेतना का स्तर अलग-अलग होता है। बताया कि महापुरुषों की तपस्थली की चेतना का स्तर काफी अधिक होता है। यही कारण है कि जब साधक इन स्थानों में योग-ध्यान का अभ्यास करता है, तो उसे योग के क्षेत्र में आगे बढ़ने में सहायता मिलती है। स्वामी रामतीर्थ आश्रम समिति के डा. प्रभाकर, अनिल असवाल का कहना है कि देवभूमि में विश्वभर से साधक योग-ध्यान करने पहुंचते हैं। ऐसे में गुफा का संरक्षण कर एतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए।
विदेशों में बजा वेदांत का डंका
स्वामी रामतीर्थ ने अपने अलौकिक ज्ञान से अमेरिका, मिस्त्र, जापान सहित कई देशों में सच्चे वेदांत का डंका बजाया। स्वामी रामतीर्थ के दिव्य ज्ञान से अमेरिका इतना प्रभावित हुआ कि उन्हें एक साथ 12 विश्वविद्यालयों ने डॉक्टरेट की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा। भले ही रामतीर्थ महाराज ने इन उपाधियों को लेने से इंकार कर दिया।
विश्वभर में आध्यात्मिक ज्ञान को प्रचारित करने वाले स्वामी रामतीर्थ ने टिहरी में रहकर तप किया, आत्मानुति प्राप्त की और अंत में अपने शरीर को मां गंगा की गोद में समर्पित कर दिया। हिमालय यात्रा के दौरान स्वामी रामतीर्थ ने नरेंद्रनगर के ब्रह्मपुरी में एक गुफा को अपनी तपस्थली बनाया। वर्ष 1898 भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को इसी गुफा में साधना के उच्चतम सौपान में पहुंचने पर स्वामी रामतीर्थ को आत्म साक्षात्कार हुआ। योग के गहन जानकारों की मानें तो ऐसे स्थानों पर साधकों को योग के दौरान ध्यान केंद्रित करने में काफी मदद मिलती है। इसके पीछे पूर्व में की गई तपस्या के फलस्वरूप उस क्षेत्र में बढ़ी हुई चैतन्यता का स्तर माना जाता है। योगाचार्य भास्कर जोशी का कहना है कि हर स्थान की चेतना का स्तर अलग-अलग होता है। बताया कि महापुरुषों की तपस्थली की चेतना का स्तर काफी अधिक होता है। यही कारण है कि जब साधक इन स्थानों में योग-ध्यान का अभ्यास करता है, तो उसे योग के क्षेत्र में आगे बढ़ने में सहायता मिलती है। स्वामी रामतीर्थ आश्रम समिति के डा. प्रभाकर, अनिल असवाल का कहना है कि देवभूमि में विश्वभर से साधक योग-ध्यान करने पहुंचते हैं। ऐसे में गुफा का संरक्षण कर एतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए।
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विदेशों में बजा वेदांत का डंका
स्वामी रामतीर्थ ने अपने अलौकिक ज्ञान से अमेरिका, मिस्त्र, जापान सहित कई देशों में सच्चे वेदांत का डंका बजाया। स्वामी रामतीर्थ के दिव्य ज्ञान से अमेरिका इतना प्रभावित हुआ कि उन्हें एक साथ 12 विश्वविद्यालयों ने डॉक्टरेट की उपाधि देने का प्रस्ताव रखा। भले ही रामतीर्थ महाराज ने इन उपाधियों को लेने से इंकार कर दिया।
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