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टिनशेडवासियों को नहीं मिला मालिकाना हक
Updated Sun, 11 Nov 2018 09:21 PM IST
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नई टिहरी। नगर क्षेत्र के निर्बल वर्ग और टीनशेड में रहने वाले बांध विस्थापितों का केवल चुनाव में ही उपयोग होता रहा है। नगर पालिका से लेकर विधानसभा चुनाव में हर प्रत्याशी दोनों बस्ती में निवासरत करीब चार सौ परिवारों को मालिकाना हक दिलाने का वायदा कर वोट हासिल कर लेते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद मालिकाना हक दिलाना तो दूर, बस्ती के तरफ देखते तक नहीं है।
टिहरी बांध की झील बनने के दौरान पुरानी टिहरी में निवासरत गरीब, बेसहरा, निर्धन करीब चार सौ परिवारों को मानवीय तौर नई टिहरी के मोलधार में बनाए गए निर्बल आवास और केमसारी के टिनशेड में 2004-05 में शिफ्ट किया था। यह परिवार पुरानी टिहरी में छोटा मोटा काम कर आजीविका चलाते थे, लेकिन पुनर्वास की श्रेणी में नहीं आए थे। दोनों बस्ती निवासरत परिवार 12 सालों से मालिकाना हक दिलाए जाने की मांग कर रहे हैं। बावजूद उनकी महत्वपूर्ण मांग पूरी नही हो पाई है। नगर निकाय से लेकर विधानसभा चुनाव में हर उम्मीदवार की नजर गरीब परिवारों के वोट पर टिकी रहती है। चुनाव के दौरान प्रत्याशी अपने एजेंडे में मालिकाना हक की बात प्रमुखता से रखकर वोट झटक लेते हैं। बावजूद चुनाव जीतने के बाद समस्या का निराकरण तो दूर, बस्ती की ओर रुख तक नही करते हैं। इन बस्तियों में करीब 12 सौ मतदाता निवास करते हैं। वर्तमान में हो रहे चुनाव में भी प्रत्याशी घर-घर दस्तक देकर मालिकाना हक दिलाने का भरोसा दे रहे हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि इस बार के चुनाव में प्रत्याशी वोट हासिल कर उनकी समस्या का निराकरण करवा पाएंगे। स्थानीय निवासी अरविंद, सोहन, रमेश, तोफिक, चंदन, सुनीता, कृष्णा आदि का कहना है कि चुनाव के दौरान हर उम्मीदवार वायदे तो करते हैं, लेकिन जीतने के बाद समस्या का निराकरण नहीं करते हैं। मालिकाना हक न मिलने से बैंक से ऋण, बिजली, पानी का कनेक्शन, आय प्रमाण, जाति प्रमाणपत्र, राशन कार्ड नही बनते हैं, जिसके चलते उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ रहा है।
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टिहरी बांध की झील बनने के दौरान पुरानी टिहरी में निवासरत गरीब, बेसहरा, निर्धन करीब चार सौ परिवारों को मानवीय तौर नई टिहरी के मोलधार में बनाए गए निर्बल आवास और केमसारी के टिनशेड में 2004-05 में शिफ्ट किया था। यह परिवार पुरानी टिहरी में छोटा मोटा काम कर आजीविका चलाते थे, लेकिन पुनर्वास की श्रेणी में नहीं आए थे। दोनों बस्ती निवासरत परिवार 12 सालों से मालिकाना हक दिलाए जाने की मांग कर रहे हैं। बावजूद उनकी महत्वपूर्ण मांग पूरी नही हो पाई है। नगर निकाय से लेकर विधानसभा चुनाव में हर उम्मीदवार की नजर गरीब परिवारों के वोट पर टिकी रहती है। चुनाव के दौरान प्रत्याशी अपने एजेंडे में मालिकाना हक की बात प्रमुखता से रखकर वोट झटक लेते हैं। बावजूद चुनाव जीतने के बाद समस्या का निराकरण तो दूर, बस्ती की ओर रुख तक नही करते हैं। इन बस्तियों में करीब 12 सौ मतदाता निवास करते हैं। वर्तमान में हो रहे चुनाव में भी प्रत्याशी घर-घर दस्तक देकर मालिकाना हक दिलाने का भरोसा दे रहे हैं। ऐसे में अब देखना होगा कि इस बार के चुनाव में प्रत्याशी वोट हासिल कर उनकी समस्या का निराकरण करवा पाएंगे। स्थानीय निवासी अरविंद, सोहन, रमेश, तोफिक, चंदन, सुनीता, कृष्णा आदि का कहना है कि चुनाव के दौरान हर उम्मीदवार वायदे तो करते हैं, लेकिन जीतने के बाद समस्या का निराकरण नहीं करते हैं। मालिकाना हक न मिलने से बैंक से ऋण, बिजली, पानी का कनेक्शन, आय प्रमाण, जाति प्रमाणपत्र, राशन कार्ड नही बनते हैं, जिसके चलते उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ रहा है।
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