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टिहरी बांध की झील में मत्स्य आखेट तोडने लगा दम
Updated Thu, 03 Aug 2017 10:34 PM IST
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नई टिहरी। टिहरी बांध की झील में बिना तैयारी के शुरू हुए मत्स्य आखेट दम तोड़ने लगा है। इसका कारण झील में मछली में पर्याप्त मछलियों का अभाव, मंडी तीन से चार सौ किमी से पहले न होने और बिना शीड डाले ही मत्स्य आखेट का काम शुरू करवाना है। साथ ही मत्स्य पालन अभिकरण ने बाद में जिस प्रजाति के शीड झील में डालें गए हैं, वह पहाड़ी जलाशय में कम मात्रा में तैयार होता है। जिसके चलते डाले गए एक करोड़ शीड में से 40 फीसदी भी नहीं बच पाई है।
वर्ष 2005 में बनी झील में बमुश्किल मत्स्य विकास अभिकरण ने 10 साल बाद मत्स्य आखेट शुरू करवाया था। इसके लिए 2015 में झील में एक करोड़ शीड डाले गए मैजर, क्राप, रौहू, कतला, नैन के शीड का पहाड़ी जलाशय में अधिक उत्पादन नहीं होता है। पहाड़ी जलाशाय में महाशीर, गोल्डन क्राप का शीड से ज्यादा मछलियां तैयार होती है। डाले गए शीड कम से कम दो साल में आखेट लायक हो पाती हैं। टिहरी झील में शीड डालने के साथ ही आखेट का काम भी फर्म वैभव फिशरिज को दिया गया। जिसके चलते वर्तमान में झील में पर्याप्त मात्रा में मछलियां नहीं है। झील की छोटी-छोटी सहायक नदियां में प्राकृतिक रूप से पाई जानी वाली महाशीर, गोल्डन क्राप ही है, जो वर्तमान में बड़ी मात्रा में शिकार के लिए उपलब्ध नहीं है।
तीन साल के लिए दिया मत्स्य आखेट
वर्ष 2015 में तीन बार के नेशनल विड निकालने के बाद केवल वैभव फिशरिज ने ही आवेदन किया था, जिसे सरकार ने तीन साल के लिए 52 लाख में मत्स्य आखेट का काम दिया था। इस फर्म ने प्रत्येक साल 10 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर सरकार को राजस्व देना था। फर्म ने दो साल तक आखेट किया, जिसका सरकार को एक करोड़ नौ लाख राजस्व दिया। अभी एक साल और फर्म का बाकी थी। झील में मछलियां कम होने से वैभव फिशरिज ने मत्स्य आखेट करने से समय से पहले की हाथ खींच लिए हैं। फर्म ने तीसरे साल के अनुबंध करने को तैयार नहीं है।
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दो साल में निकली 15 सौ क्विंटल मछलियां
झील से दो साल में करीब 15 सौ क्विंटल मछलियों का आखेट हो पाया है। मंडी में मछलियां का रेट 80 रुपये प्रति किलो है। 15 सौ क्विंटल से करीब एक करोड़ 20 लाख की मछलियां विक्री हुई। इसमें से एक करोड़ नौ लाख सरकार दिया गया। जबकि मत्स्य आखेट करने वाली फर्म का दो साल में करीब दो करोड़ से अधिक खर्च हो चुका है।
अभिकरण के पास नहीं महाशीर की हैचरी
मत्स्य अभिकरण के पास महाशीर के बीज के लिए राज्यभर में अपनी हैचरी नहीं है, जिससे टिहरी झील में महाशीर का शीड नहीं डाला जा सका। कुछ माह पहले टीएचडीसी ने कोटेश्वर स्थित अपनी महासीर की हैचरी को अभिकरण को देना को तैयार हुआ है, बावजूद उससे अभी शीड नहीं मिल पाया है।
कोट
वैभव फिशरिज को तीन साल के लिए मत्स्य आखेट के लिए दिया गया था। लेकिन फर्म ने समय से पहले ही मत्स्य आखेट करने से इनकार कर दिया है। दो साल में करीक 15 सौ क्विंटल मछलियां झील से निकाली गई है।
-आमोद नौटियाल, निरीक्षक मस्त्य पालन नई टिहरी।
झील में पर्याप्त मछलियां न होने से दो साल से घाटा उठाना पड़ रहा है। अब तक करीब दो करोड़ 20 लाख से खर्च हो चुका है। राजस्व भी अधिक है, झील में मछलियां पर्याप्त नहीं है। मंडी भी तीन से चार सौ किमी से पहले नहीं है। जिससे दिक्कतें आ रही है। ऐसे में काम करना संभव नहीं है।
-अनिल उपाध्याय, पार्टनर वैभव फिशरिज।
वर्ष 2005 में बनी झील में बमुश्किल मत्स्य विकास अभिकरण ने 10 साल बाद मत्स्य आखेट शुरू करवाया था। इसके लिए 2015 में झील में एक करोड़ शीड डाले गए मैजर, क्राप, रौहू, कतला, नैन के शीड का पहाड़ी जलाशय में अधिक उत्पादन नहीं होता है। पहाड़ी जलाशाय में महाशीर, गोल्डन क्राप का शीड से ज्यादा मछलियां तैयार होती है। डाले गए शीड कम से कम दो साल में आखेट लायक हो पाती हैं। टिहरी झील में शीड डालने के साथ ही आखेट का काम भी फर्म वैभव फिशरिज को दिया गया। जिसके चलते वर्तमान में झील में पर्याप्त मात्रा में मछलियां नहीं है। झील की छोटी-छोटी सहायक नदियां में प्राकृतिक रूप से पाई जानी वाली महाशीर, गोल्डन क्राप ही है, जो वर्तमान में बड़ी मात्रा में शिकार के लिए उपलब्ध नहीं है।
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तीन साल के लिए दिया मत्स्य आखेट
वर्ष 2015 में तीन बार के नेशनल विड निकालने के बाद केवल वैभव फिशरिज ने ही आवेदन किया था, जिसे सरकार ने तीन साल के लिए 52 लाख में मत्स्य आखेट का काम दिया था। इस फर्म ने प्रत्येक साल 10 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर सरकार को राजस्व देना था। फर्म ने दो साल तक आखेट किया, जिसका सरकार को एक करोड़ नौ लाख राजस्व दिया। अभी एक साल और फर्म का बाकी थी। झील में मछलियां कम होने से वैभव फिशरिज ने मत्स्य आखेट करने से समय से पहले की हाथ खींच लिए हैं। फर्म ने तीसरे साल के अनुबंध करने को तैयार नहीं है।
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दो साल में निकली 15 सौ क्विंटल मछलियां
झील से दो साल में करीब 15 सौ क्विंटल मछलियों का आखेट हो पाया है। मंडी में मछलियां का रेट 80 रुपये प्रति किलो है। 15 सौ क्विंटल से करीब एक करोड़ 20 लाख की मछलियां विक्री हुई। इसमें से एक करोड़ नौ लाख सरकार दिया गया। जबकि मत्स्य आखेट करने वाली फर्म का दो साल में करीब दो करोड़ से अधिक खर्च हो चुका है।
अभिकरण के पास नहीं महाशीर की हैचरी
मत्स्य अभिकरण के पास महाशीर के बीज के लिए राज्यभर में अपनी हैचरी नहीं है, जिससे टिहरी झील में महाशीर का शीड नहीं डाला जा सका। कुछ माह पहले टीएचडीसी ने कोटेश्वर स्थित अपनी महासीर की हैचरी को अभिकरण को देना को तैयार हुआ है, बावजूद उससे अभी शीड नहीं मिल पाया है।
कोट
वैभव फिशरिज को तीन साल के लिए मत्स्य आखेट के लिए दिया गया था। लेकिन फर्म ने समय से पहले ही मत्स्य आखेट करने से इनकार कर दिया है। दो साल में करीक 15 सौ क्विंटल मछलियां झील से निकाली गई है।
-आमोद नौटियाल, निरीक्षक मस्त्य पालन नई टिहरी।
झील में पर्याप्त मछलियां न होने से दो साल से घाटा उठाना पड़ रहा है। अब तक करीब दो करोड़ 20 लाख से खर्च हो चुका है। राजस्व भी अधिक है, झील में मछलियां पर्याप्त नहीं है। मंडी भी तीन से चार सौ किमी से पहले नहीं है। जिससे दिक्कतें आ रही है। ऐसे में काम करना संभव नहीं है।
-अनिल उपाध्याय, पार्टनर वैभव फिशरिज।