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कीड़ा-जड़ी के विक्रय के लिए देनी होगी रॉयल्टी
प्रमोद सेमवाल / अमर उजाला, गोपेश्वर
Updated Sun, 08 May 2016 01:17 PM IST
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उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पनपने वाला ताकत का कीड़ा यारसागंबू (कीड़ा-जड़ी) को अब ग्रामीण कभी भी कहीं भी विक्रय कर सकेंगे।
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इसके लिए ग्रामीणों को बदरीनाथ वन प्रभाग में रॉयल्टी के तौर पर दस हजार रुपये की रसीद कटानी होगी। वन प्रभाग ने ग्रामीणों के अलावा नेपाली मूल व मैदानी क्षेत्र के लोगों पर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जाने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है।
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चमोली जनपद के जोशीमठ, निजमुला, घाट और देवाल ब्लॉक के बुग्याल क्षेत्रों में तीन से चार हजार मीटर की ऊंचाई पर कीड़ा जड़ी की खोजबीन होती है। अप्रैल माह के अंत तक इन जगहों से बर्फ पिघल जाने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों के युवा, बुजुर्ग और महिलाएं कीड़ा जड़ी की खोज में लग जाते हैं।
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बुग्यालों में भटकने के बाद एक व्यक्ति सौ ग्राम से एक किलो तक कीड़ा जड़ी ढूंढ लेता है। स्थानीय स्तर पर प्रति सौ ग्राम कीड़ा-जड़ी पर स्थानीय युवा को करीब तीस हजार रुपये मिलते हैं। जबकि इसका अंतरराष्ट्रीय मूल्य करीब छह लाख रुपये प्रति किलो ग्राम है।
ग्रामीणों को कीड़ा जड़ी ग्राम पंचायत, वन विभाग और जिला भेषज संघ के मार्फत बेचनी है, लेकिन कम दाम मिलने के चलते ग्रामीण अवैध रुप से कीड़ा जड़ी को बेचने के लिए देहरादून सहित अन्य मैदानी क्षेत्रों में चले जाते हैं, जहां वे पुलिस व वन विभाग की गिरफ्त में आ जाते हैं। अब वन विभाग ने ग्रामीणों को राहत दी है।
बदरीनाथ वन प्रभाग के उप प्रभागीय वनाधिकारी एनएन पांडेय का कहना है कि ग्रामीणों को कीड़ा जड़ी बेचने से पहले वन विभाग को दस हजार रुपये रॉयल्टी के रुप में जमा करनी होगी। इसके बाद वे कहीं भी जड़ी का विक्रय कर सकते हैं।
सुदूर पाणा-ईराणी गांव के मोहन सिंह और दिनेश सिंह का कहना है कि कीड़ा जड़ी के दोहन के लिए ठोस नीति बननी चाहिए जिससे स्थानीय लोगों को मजबूत रोजगार मिल सके। यह नीति क्षेत्र से हो रहे पलायन को रोकने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
क्या है कीड़ा-जड़ी
कीड़ा-जड़ी का वानस्पतिक नाम यारसागंबू है। यह शक्तिवर्धन जड़ी होती है। यहां इसका अवैध दोहन प्रतिबंधित है। चीन में यारसागंबू से शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा पैदा करने के लिए शक्तिवर्द्घक दवाईयां बनाई जाती हैं। यह हिमाच्छादित क्षेत्रों में बहुतायात मात्रा में पाई जाती है। भारत में इसके दोहन की कोई नीति निर्धारित नहीं है।