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नमाज और रोजे की तरह जकात भी है फर्ज

Sat, 24 Apr 2021 11:14 PM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Sat, 24 Apr 2021 11:14 PM IST
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Zakat is also a duty like Namaz and Roja
रमजान का दूसरा असरा मगफिरत का चल रहा है। रमजान माह में रोजे रखने की तरह जकात को भी फर्ज बनाया है। जकात का मतलब हैं दान देना। अपनी आय के एक हिस्से को गरीबों में बांटने को ही जकात कहा जाता है। नमाज और रोजे की तरह जकात को भी मुसलमानों पर फर्ज किया हैं।
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कलियर मुकर्रबपुर बड़ी मस्जिद के इमाम हाफिज दिलशाद ने बताया कि साढ़े बावन तोला चांदी या फिर साढ़े सात तोला सोना होना या इनके बराबर की रकम (पैसा ) जिस मुसलमान के पास हैं उस पर जकात फर्ज हो जाती हैं। एक साल का समय बीत जाने के बाद जकात दी जाती है। हर साल जकात देना फर्ज होता हैं। जकात को पूरे साल भर में कभी भी दिया जा सकता है, लेकिन अधिकतर जकात को रमजान माह में दिया जाता है। इस माह में जकात देने से ज्यादा सवाब (पुण्य) मिलता है। जकात का सबसे पहला फर्ज अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों पर है। आपके रिश्तेदारों में कोई गरीब है तो उसको जकात दिया जा सकता है। पड़ोस में रहने वाले गरीब, यतीम, विधवा महिलाओं को जकात दी जा सकती है। इसके अलावा मदरसों जहां पर बाहर के और यतीम बच्चे पढ़ते हो, वहां पर भी जकात को दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि गरीब और बेसहारा लोगों को जकात देनी चाहिए। ऐसे लोगों को जकात देना बहुत बड़ा सवाब (पुण्य) का काम है। लोग जरूरत से ज्यादा खर्च न करें और गरीब बेसहारा लोगों की मदद करते रहें।
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जकात के नियम
जकात के लिए शरीयत में नियम बनाए हैं। अपनी कुल आय का ढाई प्रतिशत हिस्सा जकात में दिया जाता हैं। जो कर्जदार होता हैं उस पर जकात फर्ज नहीं हैं। हालांकि कर्ज न होने के बावजूद जकात को न देने वाले मुसलमान को फर्ज को छोड़ने की बराबर गुनाह मिलता है। इसलिए जकात को देना बेहद जरूरी है। रमजान माह में इसी तरह से सदकाए फित्र भी देना वाजिब है। सदकाए फित्र हर मालदार पर वाजिब है। जिस पर जकात फर्ज है उस पर सदकाए फित्र भी फर्ज है। सदकाए फित्र अदा करने की वजह यह है ताकि गरीब, यतीम, नादार (कमजोर) लोग भी ईद की खुशियों में शरीक होकर खुशियां मना सकें।
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