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गांव की सरकार में भाजपा की होगी अग्निपरीक्षा
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जिला एवं ग्राम पंचायत चुनाव में भाजपा को कड़ी अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को ग्रामीण क्षेत्रों की पांच सीटें गंवानी पड़ी थी। ऐसे में अब जबकि भाजपा प्रदेश में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में है तो यह देखने वाली बात होगी कि आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भाजपा मजबूती के साथ वापसी कर पाती है या नहीं।
जिले में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारियां जोरशोर से शुरू हो चुकी हैं। परिसीमन के बाद अनंतिम आरक्षण की सूची भी जारी हो चुकी है। अब सोमवार को आपत्तियों के निदान का काम शुरू होग। इसके बाद आरक्षण की अंतिम सूची भी जारी हो जाएगी। दो दिन बाद आरक्षण फाइनल होते ही गांवों में चुनावी घमासान शुरू हो जाएगा। इसके चलते जिले की 300 से अधिक ग्राम पंचायतों में चुनाव की सरगर्मी बेहद तेज हो गई है। इसमें राजनीतिक पार्टियां भी ग्रामीण स्तर पर होने वाले इन चुनावों को मजबूती से लड़कर पैठ बनाने की कोशिश करती हैं।
वैसे तो भाजपा का हरिद्वार जिले में काफी पहले से जनाधार रहा है लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की झोली में ग्रामीण क्षेत्र की एक भी सीट नहीं आ पाई थी। वहीं बसपा ने मंगलौर और लक्सर में दो सीटों पर खाता खोलने में कामयाबी पाई। वहीं, कांग्रेस ने भाजपा से झबरेड़ा और हरिद्वार ग्रामीण की सीटें छीन ली हैं। ऐसे में विधानसभा चुुनाव में बने समीकरण की तुलना करें तो फिलहाल कांग्रेस और बसपा का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। हालांकि, भाजपा को सत्ता में होने का लाभ भी मिल सकता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि भाजपा जिले में ग्राम पंचायत चुनाव के जरिए किस तरह वापसी कर पाती है। इस बाबत भाजपा जिलाध्यक्ष डॉ. जयपाल सिंह चौहान का कहना है कि भाजपा का ग्रामीण क्षेत्रों में बूथ स्तर तक मजबूत मैनेजमेंट है। ऐसे में ग्राम पंचायत चुनाव में भाजपा के सहयोग से एकतरफा जीत मिलेगी।
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.. तो पूर्व विधायक लगाएंगे भाजपा की नैया पार
जिला पंचायत चुनाव की राजनीति में जहां इस बार पूर्व मंत्री स्वामी यतीश्वरानंद मैदान में उतरने को तैयार हैं। वहीं झबरेड़ा से पूर्व विधायक रहे देशराज कर्णवाल ने भी तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि कर्णवाल खुद चुनाव लड़ेंगे या परिवार में से किसी को मैदान में उतारेंगे। वहीं दूसरी ओर, खानपुर के पूर्व विधायक कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन भी अपने समर्थकों को मैदान में उतार सकते हैं क्योंकि इससे पहले उनकी पत्नी रानी देवयानी भी जिला पंचायत सदस्य रह चुकी हैं। ऐसे में पार्टी को उनके अनुभव का भी लाभ मिल सकता है। अब देखना यह है कि विधायकों की जोर आजमाइश कांग्रेस और बसपा के प्रत्याशियों को मात दे पाती है या नहीं।
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जिले में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारियां जोरशोर से शुरू हो चुकी हैं। परिसीमन के बाद अनंतिम आरक्षण की सूची भी जारी हो चुकी है। अब सोमवार को आपत्तियों के निदान का काम शुरू होग। इसके बाद आरक्षण की अंतिम सूची भी जारी हो जाएगी। दो दिन बाद आरक्षण फाइनल होते ही गांवों में चुनावी घमासान शुरू हो जाएगा। इसके चलते जिले की 300 से अधिक ग्राम पंचायतों में चुनाव की सरगर्मी बेहद तेज हो गई है। इसमें राजनीतिक पार्टियां भी ग्रामीण स्तर पर होने वाले इन चुनावों को मजबूती से लड़कर पैठ बनाने की कोशिश करती हैं।
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वैसे तो भाजपा का हरिद्वार जिले में काफी पहले से जनाधार रहा है लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की झोली में ग्रामीण क्षेत्र की एक भी सीट नहीं आ पाई थी। वहीं बसपा ने मंगलौर और लक्सर में दो सीटों पर खाता खोलने में कामयाबी पाई। वहीं, कांग्रेस ने भाजपा से झबरेड़ा और हरिद्वार ग्रामीण की सीटें छीन ली हैं। ऐसे में विधानसभा चुुनाव में बने समीकरण की तुलना करें तो फिलहाल कांग्रेस और बसपा का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। हालांकि, भाजपा को सत्ता में होने का लाभ भी मिल सकता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि भाजपा जिले में ग्राम पंचायत चुनाव के जरिए किस तरह वापसी कर पाती है। इस बाबत भाजपा जिलाध्यक्ष डॉ. जयपाल सिंह चौहान का कहना है कि भाजपा का ग्रामीण क्षेत्रों में बूथ स्तर तक मजबूत मैनेजमेंट है। ऐसे में ग्राम पंचायत चुनाव में भाजपा के सहयोग से एकतरफा जीत मिलेगी।
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.. तो पूर्व विधायक लगाएंगे भाजपा की नैया पार
जिला पंचायत चुनाव की राजनीति में जहां इस बार पूर्व मंत्री स्वामी यतीश्वरानंद मैदान में उतरने को तैयार हैं। वहीं झबरेड़ा से पूर्व विधायक रहे देशराज कर्णवाल ने भी तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि कर्णवाल खुद चुनाव लड़ेंगे या परिवार में से किसी को मैदान में उतारेंगे। वहीं दूसरी ओर, खानपुर के पूर्व विधायक कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन भी अपने समर्थकों को मैदान में उतार सकते हैं क्योंकि इससे पहले उनकी पत्नी रानी देवयानी भी जिला पंचायत सदस्य रह चुकी हैं। ऐसे में पार्टी को उनके अनुभव का भी लाभ मिल सकता है। अब देखना यह है कि विधायकों की जोर आजमाइश कांग्रेस और बसपा के प्रत्याशियों को मात दे पाती है या नहीं।